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क्या बीज में विभाजन संभव है? हर विवेकशील व्यक्ति इस प्रश्न का उत्तर यही देगा कि नही, बीज में विभाजन संभव नही है। बीज बीज है और यदि उसे तोड़ा गया तो वह टूटते ही व्यर्थ हो जाएगा। इसलिए अच्छाई इसी में है कि बीज को तोड़ा ना जाए बल्कि उसे यथावत रखा जाए जिससे कि अन्य बहुत से बीज उस एक बीज को बोकर प्राप्त किये जा सकें। बीज को न तोड़ने का यह नियम संसार में सर्वमान्य और सर्वग्राहय है।

परंतु दुर्भाग्य है मानव का कि इसने स्वयं अपने साथ ही अपघात किया है। इसने अपने बीज को (मानवता को या मानव वंश को) तोड़ने का प्रयास किया है। इसने मानव को विभिन्न जातियों में, नस्लों में विभाजित किया है। यह समझने में भूल की गयी कि मानव का आदि पूर्वज एक है और मानव को विभिन्न नस्लों में विभक्त नही किया जा सकता।

जैसे एक गांव एक ही पुरूष पूर्वज की संतान होता है, और धीरे धीरे उसके बढ़ने पर उस गांव के विभिन्न मौहल्लों को अलग अलग पट्टियों के उपनाम दे देने से उस गांव के किसी एक ही पुरूष पूर्वज के ना होने की कल्पना करना मूर्खता होती है, उसी प्रकार विभिन्न देशों, प्रांतों क्षेत्रों आदि में निवास करने के कारण मानव को विभिन्न नामों से पुकारा जा सकता है, परंतु इसका अभिप्राय ये नही हो जाता कि विभिन्न नामों से पुकारे जाने के कारण मानव के बीज के एक ही पुरूष पूर्वज में विभाजन हो गया। विभिन्न नामों या उपनामों या जातियों या राष्ट्रीयताओं का नामकरण मानव ने अपनी सुविधा के लिए किया है, ये नामकरण हमारे इतिहास का एक प्रामाणिक सत्य नही है। परंतु अप्रमाणिक सत्यों को इतिहास का गारा ईंट बनाकर मानव ने जो काल्पनिक इतिहास या इतिहास की धारणाएं सृजित की हैं, उन्होंने एक असत्य पर दूसरे असत्य को स्थापित करते करते गुत्थी को उलझाया तो है पर खोला नही है।

मनु महाराज लिखते हैं :-

पौण्ड्रका श्चौण्ड्रद्रविडा: काम्बोजा: यवना:

शका: पारदा:, पहलवाश्चीना: किराता दरदा: खशा:।

शनकैस्तु क्रिया लोपा दिमा: क्षत्रिय जातय: वृषलत्वं गता लोके ब्राह्मïमण दर्शनेन च।।

(मनु. 10 / 43 / 44)

अर्थात ब्राह्मïणों के पास न जाने से क्रिया लुप्त हुई, क्षत्रिय जाति वृषल होकर पौण्ड्र चौण्डू, द्रविड़, काम्बोज, पवन, शक, पारद, पहलव, चीन, किसत, दरद और खुश हो गयी, अर्थात उस उस नाम के देशों में जा बसी और उसी देश के नाम से जाति का भी वही नाम हो गया। बात यहां तक भी नही रूकी, भारत में भीतर घुस कर देखें तो यहां अंग्रेजों ने भारत के मूल निवासी कोल, भील, संथाल नट आदि जाति के लोगों को घोषित किया। इन जातियों से निम्न स्तर के लोग उस समय भारत में नही रहते थे, अन्यथा उन्ही निम्न स्तरीय जातियों के लोगों को यहां का मूल निवासी अंग्रेज बता जाते। क्योंकि उन्हें तो यही सिद्घ करना था कि भारत का अपना अपने पास कुछ नही है, जो भी कुछ इसके पास है, वह विदेशियों की देन है। बस तभी से हम अंग्रेजों की कृपा से ‘झूठों का महल’ बनाने का अतार्किक और अप्रमाणिक कृत्य ही कर रहे हैं।

भाषा के विषय में भी ऐसा ही खेल हो रहा है। भाषा के बीज (संस्कृत) को मारने का राष्ट्रघाती कार्य किया जा रहा है। एक भाषा बीज को मारा गया तो खोज होने लगी विश्व की कुल भाषाओं की। भारत में स्वतंत्रता मिलने के समय कुल 1652 भाषाएं खोजी गयीं। भूल गये सारे अन्वेषक कि ये भाषाएं नही बल्कि भाषा के विकार हैं और विकारों से जन्मी बोलियां हैं। पर अन्वेषण जारी रहा, अब तक ज्ञात हो रहा है कि विश्व में लगभग 6912 भाषाएं बोली जाती हैं। मूल कटा तो शाखाओं को गिनने लगे, शाखाएं कटीं तो उपशाखाओं को गिनने लगे, और उपशाखाएं कटीं तो पत्ते गिनने लगे।

इसलिए भाषा के आधुनिक अन्वेषकों का मानना है कि कई भाषाएं तो ऐसी भी हैं, जिनके बोलने वालों की संख्या विश्व में 10-15 व्यक्तियों की है। क्या मूर्खतापूर्ण आंकलन है? कहीं किसी भाषा के बोलने वालों की इतनी संख्या भी हो सकती है? हो सकती है तो वह भाषा नही अपितु भाषा परिवार की पत्ती मात्र है। लेकिन यहां लड़ाई झूठी पहचानों को समाप्त कर एक पहचान  में विलीन करने के सामूहिक प्रयासों की नही है, अपितु लड़ाई विभिन्न पहचानों को बनाए रखने की है। इसलिए एक बीज को मारने की तैयारी कर ली गयी। यूरोपीय भाषाविदों ने एक कल्पनात्मक सत्य उद्घाटित किया कि संस्कृत, लैटिन एवं ग्रीक भाषा में पर्याप्त भाषायी समानताएं हैं। इस भाषायी समानता के आधार पर सिद्घ किया गया कि ये तीनों भाषाएं एक ही भाषा परिवार की सदस्या हैं। किंतु यहां भी अर्द्घसत्य का सहारा लिया गया है, क्योंकि जब एक भाषा परिवार की मान्यता स्थापित कर दी गयी तो उस भाषा परिवार का कोई मुखिया बीज रूप में खोजा जाना भी अनिवार्य था। परंतु इस बीज रूपी मुखिया से पाठकों को अवगत नही कराया गया।

भौगोलिक आधारों पर भाषा परिवार बीज की उपेक्षा कर विभिन्न शाखाएं गिनी गयी हैं, यथा प्रशांत महासागर एवं आस्ट्रेलिया महाद्वीप की भाषाएं, अमेरिकी महाद्वीप की भाषा, अफ्रीकी महाद्वीप की भाषाएं, यूरोप एवं एशिया के महाद्वीपों की भाषाएं। इन सारी शाखाओं की फिर उपशाखाएं गिनी जाती हैं और अंत में उपशाखाओं के बाद पत्तियों तक हमें ले जाया जाता है। भाषा उत्पत्ति की इस अवैज्ञानिक और अतार्किक अवधारणा और भाषा परिवारों की बेतुकी मान्यता ने विश्व-शांति और वैश्विक एकता की मानव की मूलभूत और अंतिम आवश्यकता को धूलि धूसरित किया है। इससे वैमनस्य भाव बढ़ा है, सभ्य समाज बनाने का संकल्प और प्रयास बाधित हुआ है। बीज की उपेक्षा करने का ही घातक परिणाम है ये।

भारत में हम प्रत्येक व्यक्ति को ‘हिंद’ नही बना पाए। यहां हिंदू का अभिप्राय राष्ट्रीय संदर्भों में लिया जाना अपेक्षित है। हिंदू की पहचान को हमने हिंदू मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, पारसी, जैन, बौद्घ, आर्य समाजी, वैष्णवी, ब्राह्मïण, राजपूत, जाट, गूजर, यादव आदि में विलीन कर दिया और परिणाम स्वरूप सारे भारतीय समाज को परस्पर घृणा के भावों से भर दिया। हम गीत चाहे जो गायें, नारे चाहे जो लगायें, पर वर्तमान भारत का सच यही है-एक पहचान के बीज की हमने हत्या कर दी है। बस, यही स्थिति वैश्विक स्तर पर है-जहां हमने एक पहचान के बीज की हत्या की है और चारों ओर परस्पर वैमनस्य के भावों को प्रोत्साहित कर दिया है। यद्यपि हमें ज्ञात है कि 2001 की जनगणना में हिंदी भाषा भाषी लोगों की संख्या देश में 55 करोड़ थी और 2001 की जनगणना में यह संख्या 75 करोड़ से ऊपर हो गयी। परंतु इसके उपरांत भी देश के उच्च न्यायालयों में तथा सर्वोच्च न्यायालय में अभी तक भी अंग्रेजी का आधिपत्य है। देश की अधिकांश जनता को न्याय भी अपनी भाषा में नही मिलता। लोग अंग्रेजी के आदेशों को आज भी अंग्रेजी शासकों के काल की भांति इधर उधर पढ़वाते घूमते हैं। उन्हें देखकर ऐसा लगता है कि जैसे देश में आज भी अंग्रेजों का ही राज्य हो,  या देश के न्यायालय देश की आम जनता के लिए नही अपितु किसी विशेष वर्ग की सुविधा के लिए स्थापित किये गये हैं। ऐसी मानसिकता को देखकर भारत में अंग्रेजी भाषा के स्कूलों की स्थापना दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। शांत विष की भांति विदेशी संस्कृति हमारे बच्चों के मन मस्तिष्क में परोसी जा रही है और बच्चे हिंदी विरोधी से राष्ट्रविरोधी होते जा रहे हैं। परिणाम क्या होगा-सोचकर भी मन कांपता है।

10-9-10 के ‘जनसत्ता’ में प्रकाशित एक खबर के अनुसार 9 सितंबर 2010 को राजभाषा समिति की बैठक में कार्मिक मंत्रालय (भारत सरकार) ने कुछ दस्तावेज हिंदी की जगह अंग्रेजी में पेश किये।

सदस्यों के विरोध करने पर हिंदी में दस्तावेज उपलब्ध कराने में असमर्थता प्रकट की और कहा कि उनके यहां हिंदी अनुवादकों की कमी है। इस पर सांसदों ने हंगामा किया और कुछ सांसद बहिगर्मन कर गये,गृहमंत्री पी.चिदंबरम् इस समिति के अध्यक्ष हैं उनकी अनुपस्थिति में बैठक की अध्यक्षता कर रहे श्री सत्यव्रत चतुर्वेदी ने टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। बैठक में भाग लेने आये कवि अशोक बाजपेयी ने कहा कि सरकार के अधिकांश दस्तावेज अंग्रेजी में ही होते हैं, हिंदी में दस्तावेज उपलब्ध कराने की आशा करना व्यर्थ है। श्री वाजपेयी के अनुसार हिंदी का सबसे अधिक अहित मंत्रालयों के विभिन्न विभागों में बैठक राजभाषा अधिकारी और हिंदी के अधिकारी ही करते हैं। उन्होंने दुख के साथ कहा कि हिंदी न तो कभी राजभाषा हो पायी है और न कभी होने वाली है।

बीज की हत्या करोगे तो ये ही परिणाम आएंगे। आगे-आगे देखिए होता है क्या?

(मेरा यह लेख पूर्ण प्रकाशित हो चुका है)

डॉ राकेश कुमार आर्य

 

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