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जोड़-तोड़ ही जीवन है*

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लेखक आर्य सागर खारी 🖋️

वर्ष 2021 का रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार बेजामिन लिस्ट(Benjamin List) तथा डेविड मैकमिलन(David W.C. MacMillan) को दिया गया है। इनमें एक जर्मन तो दूसरे अमेरिकी रसायन शास्त्री है । कोई भी वैज्ञानिक जब प्रयोगशाला में अनुसंधान परिश्रम मेहनत करता है तो उसकी मेहनत कार्य की जानकारी वैज्ञानिक बिरादरी को ही नहीं आमजन को भी होनी चाहिए। सन् 2000 के आसपास किए गए इन दोनों वैज्ञानिकों शोध कार्य के लिए उन्हें दो दशक बाद यह नोबेल आज मिला है।

2021 के नोबेल पुरस्कार के विषय इन वैज्ञानिकों के शोध कार्य को समझने के लिए आपको वैज्ञानिक या केमिस्ट्री की ऊंची जानकारी होने की आवश्यकता नहीं है। आपने नौवीं क्लास में जिस रसायन शास्त्र का अध्ययन किया है उसी से भलीभांति काम चल जाएगा हम सभी जानते हैं हमारा शरीर रक्त मांस हड्डि हमारा भोजन हमारे सुख सुविधा के सभी पदार्थ अणु से मिलकर बने हैं चाहे इनवर्टर की बैटरी हमारे जूते का तला या हमारी कार में इस्तेमाल होने वाला ईंधन या हमारे द्वारा बीमारी की हालत में खाए जाने वाली दवाइयां सभी अणु है। शरीर की खरबो कोशिकाओं को चलाने वाले 20 अमीनो एसिड जो हमारे शरीर में पाए जाते हैं वह सब अणु अर्थात मॉलिक्यूल ही है भौतिक जगत पर यदि हम दृष्टिपात करें तो ऑक्सीजन नामक तत्व के दो परमाणु मिलकर प्राणवायु O2 बन गए वही इन दो परमाणुओं के साथ जब हाइड्रोजन जैसे तत्व का एक परमाणु मिल गया तो जल (H2O) का निर्माण हो गया ।असंख्य अनगिनत पदार्थों रसायनों का निर्माण ऐसे ही होता चला गया यह काम किसने किया विज्ञान का यह कार्य क्षेत्र नहीं यह कार्यक्षेत्र आध्यात्मिक जनों का है निसंदेह ईश्वर का ही यह कार्य है। वही सबसे बड़ा वास्तुशिल्पी है वैज्ञानिक इसे कुदरत का नाम देते हैं कुछ वैज्ञानिक ही ऐसा कहते हैं सभी इसके लिए कुदरत को जिम्मेदार नहीं ठहराते है। हजारों साल पहले इसी पुण्य भूमि भारत वर्ष में महर्षि कणाद हुए जिन्होंने वैशेषिक दर्शन ग्रंथ की रचना की।

उन्होंने कहा द्रव्य का संयोग ,वियोग गुण ही द्रव्य की सत्ता उसके गुण धर्म को परिभाषित निर्धारित करता है। रसायन शास्त्र की भाषा में इसे समझाएं तो यह ठीक ऐसे ही हैं जहां एटम मिलकर मॉलिक्यूल बनाते हैं मॉलिक्यूल मिलकर लार्ज मॉलिक्यूल बनाते हैं जिनसे प्लास्टिक, पॉलीमर और हमारे शरीर में प्रोटीन विटामिन हमारे डीएनए का निर्माण होता है। पूरा जीवन ही जोड़-तोड़ पर आधारित है। जीवन के लिए जोड़ भी जरूरी है और तोड़ भी जरूरी है। यदि जोड़-तोड़ ना हो तो हमारा पाचन संस्थान हमारे भोजन को नहीं पचा सकता। जिन लोगों को दूध हजम नहीं होता उनकी आंतों पाचन संस्थान में वह एंजाइम लेक्टिस नहीं बन पाता जो दूध की प्राकृतिक शर्करा लेक्टोज के बड़े मॉलिक्यूल को तोड़ता है । जिससे शरीर ऊर्जा के तौर पर उसे इस्तेमाल कर सकें च वसा अर्थात फैट का पाचन पेप्सीन , आमाइलेज जैसे असंख्य एंजाइमों की की मदद से होता है। जिनका निर्माण हमारे शरीर की चुना भट्टी अर्थात पेनक्रियाज मैं होता है। ऐसे असंख्य अनंत उदाहरण प्रक्रियाएं हैं हमारे शरीर ही नहीं जीव जगत भौतिक जगत में जो छोटे बड़े मॉलिक्यूल के जोड़-तोड़ पर आधारित है लेकिन इन मॉलिक्यूल को भौतिक तौर पर कौन तोड़ता और जोड़ता है। अध्यात्मिक स्तर पर यह जोड़-तोड़ ईश्वर ही करता है लेकिन ईश्वर भी प्रकृति में टूल्स उपकरणों का इस्तेमाल करता है कणाद और गौतम जैसे महर्षियो ने ईश्वर को जगत का निमित्त कारण स्वीकार किया है उपादान कारण नहीं इसका सीधा सा निष्कर्ष यह है जीवन जगत की विभिन्न जैविक भौतिक प्रक्रिया में ईश्वर संलिप्त नहीं होता वह प्राकृतिक पदार्थों वस्तुओं का ही इस्तेमाल करता है उदाहरण के तौर पर कुम्हार मिट्टी से घड़ा बनाता है कुमार घड़े का निमित्त कारण है ना कि उपादान कारण मटके या घड़े का उपादान कारण मिट्टी ही है। प्रकृति में मौजूद छोटे बड़े मॉलिक्यूल को तोड़ने जोड़ने के लिए अर्थात वैज्ञानिकों की उन्नत प्रयोगशालाओं में आज भी मानव के पास यह टूल सीमित है लेकिन प्रकृति में बहुत बेहतरीन औजार उपकरण इसके लिए मौजूद है। हम जीव धारियों के शरीर में यह काम हजारों एंजाइम्स करते हैं और शरीर के बाहर औद्योगिक कारखानों कंपनियों फैक्ट्रियों में सन 2000 तक विभिन्न मेटल कैटालिस्ट करते थे अर्थात धात्विक उत्प्रेरक। अब यहीं से हमें इन दो वैज्ञानिकों के काम के महत्व का बोध होता है।

हमने और आपने नौवीं दसवीं कक्षा की रसायन शास्त्र की पुस्तकों में पढ़ा है ।कुछ ऐसे पदार्थ योगिक या रसायन होते हैं जो किसी रासायनिक अभिक्रिया में भाग लेते हैं तथा रासायनिक अभिक्रिया की गति को तेजी से बढ़ाते हैं। दो छोटे मॉलिक्यूल को जोड़कर नए बड़े मॉलिक्यूल का निर्माण करते हैं या किसी बड़े मॉलिक्यूल को तोड़कर दो छोटे मॉलिक्यूल नवीन पदार्थ की उत्पत्ति करते हैं लेकिन अंतिम उत्पाद में उनकी कोई हिस्सेदारी नहीं होती वह केवल तटस्थ बने रहते हैं।

उदाहरण के तौर पर हाइड्रोजन पराक्साइड जिसे हम लाल दवा कहते हैं जो घाव को साफ करने से लेकर सलून में इस्तेमाल में लाई जाती है उस का रासायनिक फार्मूला इस प्रकार है H2o2 । ऑक्सीजन का एक मॉलिक्यूल हाइड्रोजन जैसी गैस का एक मॉलिक्यूल मिलकर हाइड्रोजन पराक्साइड का निर्माण करते हैं। लेकिन जब हाइड्रोजन पराक्साइड के विलियन में चांदी जोकि एक धातु है जिस का रासायनिक संकेत अक्षर Ag है को डाला जाता है तो चांदी इस हाइड्रोजन पराक्साइड को जल और ऑक्सीजन में बांट देती है मूल पदार्थ से दो अलग ही पदार्थों का निर्माण हो गया इस प्रक्रिया में चांदी उत्प्रेरक अर्थात कैटालिस्ट कह लाएगी इस पूरी प्रक्रिया में ना चांदी घटती है ना बढ़ती है।

हमारे रोजमर्रा के इस्तेमाल की चीजें पेंट पाउडर भोज्य पदार्थ से लेकर गाड़ी का पहिया कुर्सी सभी ऐसे ही उत्प्रेरको के इस्तेमाल से मिलकर बने हैं लेकिन इन दो वैज्ञानिकों ने बेहद अनूठा काम 2000 के दशक में अपने शोध से किया। इन दो वैज्ञानिकों ने अनुभव किया प्रकृति में दो प्रकार के उत्प्रेरक मौजूद हैं पहले मानव शरीर में पाए जाने वाले एंजाइम जो अमीनो एसिड की लंबी श्रंखला से मिलकर बने होते हैं दूसरे धात्विक कैटालिस्ट अर्थात उत्प्रेरक लोहा तांबा सोना चांदी जैसे धात्विक पदार्थ है । प्रयोगशाला में प्रयोग के तौर पर धात्विक उत्प्रेरक को सुविधा पूर्वक इस्तेमाल किया जा सकता है लेकिन इनकी एक कमजोरी है यह हवा और पानी के साथ प्रतिक्रिया करते हैं अतः तेजी से उनका नाश होता है बड़े बड़े औद्योगिक कारखानों में विशेष कठिनाई आती है किसी रासायनिक अभिक्रिया से औद्योगिक उत्पाद पदार्थ को बनाने में उस परिसर को नमी व वायु से मुक्त करने में। दूसरा यह पर्यावरण व आर्थिक दृष्टिकोण से महंगे तथा प्रदूषक होते हैं।

बेंजामिन लिस्ट तथा डेविड मैकमिलन ने कार्बन आधारित इको फ्रेंडली उत्प्रेरक के निर्माण की प्रयोग विधि खोजी इसमें धातुओं का इस्तेमाल ना कर कार्बन नाइट्रोजन ऑक्सीजन जैसे तत्वों का इस्तेमाल किया जाता है रासायनिक अभिक्रिया में। यह अधिक सस्ते व कौशल युक्त उत्प्रेरक है। दूसरा इन्होंने मानव शरीर पाए जाने वाले असंख्य एंजाइम के कुछ खास हिस्से अर्थात अमीनो एसिड्स प्रोलाइन का भी उत्प्रेरक के तौर पर सफलतापूर्वक प्रयोग किया। आश्चर्य पूर्वक दोनों ही वैज्ञानिकों का मानना है हमारा शरीर एक से एक सुंदर उत्प्रेरक बनाता है अपनी जैविक रासायनिक प्रक्रियाओं को चलाने के लिए और ऐसी उपयोगी मॉलिक्यूल बनाता है जिनका शरीर पर कोई दुष्प्रभाव नहीं होता। अर्थात Asemtric ऑर्गेनों मॉलिक्यूल। जितनी भी दवा है सभी मॉलिक्यूल है लेकिन एक समस्या यह है प्रयोगशाला में जो भी मॉलिक्यूल बनते हैं वह दो प्रकार के बनते हैं जो हमरूप होते हैं ठीक हमारे दोनों हाथों की तरह जैसे हमारे हाथों में केवल इतना ही अंतर है एक दाहिना तो एक बाया हाथ है ठीक इन मॉलिक्यूल में अंतर होता है लेकिन इनमें एक मॉलिक्यूल दवाई का काम करता है तो दूसरा जहर का ।प्रकृति में भी ऐसे बहुत से मॉलिक्यूल मिलते हैं उदाहरण के तौर पर संतरा व नींबू में पाए जाने वाला लाइमोनेने मॉलिक्यूल ठीक ऐसा ही है दोनों की संरचना समान है दोनों एक दूसरे के दर्पण प्रतिरूप है लेकिन स्वाद गुण धर्म अलग है ठीक ऐसा ही रासायनिक फार्मूला से औद्योगिक उत्पाद दवाई केमिकल बनाने में होता था बनाना क्या चाहते थे बन कुछ और जाता था गैर उपयोगी। उपयोगी केवल 1% ही बन पाता था । इन दोनों वैज्ञानिकों ने ऐसी पद्धति विकसित की जिससे इनके द्वारा इजाद किए गए ऑर्गेनिक उत्प्रेरक से केवल एक मॉलिक्यूल बने वह भी केवल उपयोगी पूरी तरह प्रभावि कुशल। 1952 में जिस स्ट्रीचचीन नामक रसायन पदार्थ को बनाने में 29 से अधिक अभिक्रिया से गुजरना पड़ता था और अंत में बनते बनते केवल मूल पदार्थ का 0.0009 प्रतिशत हिस्सा ही उत्पाद बन पाता था 99 फ़ीसदी से अधिक पदार्थ उड़नछू हो जाता था 2011 में आज वह पदार्थ 12 से कम अभिक्रिया में बन जाता है और 7000 गुना अधिक कुशल उत्पाद तथा मूल पदार्थ की कम खपत होती है।
बेचैनी की दवा Perakestin,Osletemvir जैसी वायरल जीवन रक्षक दवाइयां बन रही है।

इन वैज्ञानिकों ने अपनी इजाद की गई रासायनिक पद्धति विधि को “असममत्तीय ऑर्गेनोंकैटालिसिस” नाम दिया है।

नोबेल समिति ने इन वैज्ञानिकों को पुरस्कार की घोषणा करते हुए महत्वपूर्ण कथन कहा जो इस प्रकार था।

इन दोनों वैज्ञानिकों की खोज से पूर्व मानव की प्रयोगशाला में हम जो टूल उत्प्रेरक के तौर पर इस्तेमाल करते थे वह खोटे जिनमें रसायनों की काट छांट से उपयोगी पदार्थ का निर्माण बहुत कम हो पाता था लेकिन इन्होंने इनकी खोज ने हमें ऑर्गेनिक कैटालिस्ट के रूप में अधिक कुशल धारदार हथियार प्रदान किए हैं जिनसे मानव जीवन की उपयोगी सामग्री का तेजी से निर्माण संभव हो सका।

सचमुच धैर्य एकाग्रता बड़ी तपस्या से हम असाधारण कार्य कर पाते हैं और ईश्वर सभी के मूल में रहता है” सब सत्य विद्या जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं उन सब का आदि मूल परमेश्वर है” यह नियम महर्षि दयानंद ने आर्य समाज का बनाया है इन वैज्ञानिकों ने भी मानव शरीर में पाए जाने वाले असंख्य एंजाइम को अपनी शोध की विषय वस्तु बनाया ईश्वर की रचना से प्रेरणा लेते हुए अपने अनुसंधान को अंजाम दिया साथ ही 18 वीं शताब्दी से लेकर 19वीं बीसवीं शताब्दी में रसायन विज्ञान के क्षेत्र में हुए उल्लेखनीय कार्य अनेकों वैज्ञानिकों के प्रयोग अनुसंधान की भी इन्होंने मदद ली आखिर परस्पर सहयोग से ही जीवन चलता है और जोड़-तोड़ का ही नाम जीवन है।

बोलो सच्चिदानंद भगवान की जय ।
जय वेद और जय विज्ञान।।

आर्य सागर ✍✍✍

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