मनमोहन सिंह सरकार-2, की असफलता के बीते हुए तीन वर्ष

1947 में जब देश आजाद हुआ था तो लोगों ने स्वराज्य में अपने विकास का नया सपना संजोया था। सोचा था कि अपनी जमीं और अपने आसमां के इस नये दौर में निश्चय ही हमारे लिए तरक्की की मंजिलें बहुत आसान हो जाएंगी। लेकिन समय की रेल विकास की पटरी पर जब चली तो लोगों को सपनों की सच्चाई का पता चलता चला गया। स्वराज्य ही सपना होकर रह गया। कभी 1971-72 में इंदिरा गांधी ने नारा दिया था कि गरीबी हटाओ लेकिन इंदिरा गांधी को गये हुए भी 28 वर्ष हो गये हैं, पर देश की गरीबी नही गयी, बल्कि और भी विकराल रूप में खड़ी है।
बात मनमोहन सरकार की ही करते हैं। वर्ष 2009 की मई में उन्होंने लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री की शपथ ली। चुनाव से पूर्व वह ये सोच भी नहीं रहे थे कि वे दूसरी बार भी शपथ लेंगे। यह देश के पहले प्रधानमंत्री हैं, जिन्हें ईमानदारी से एक दिन भी लोकसभा में बहुमत प्राप्त नहीं रहा। लेकिन फिर भी वह बहुमत प्राप्त गठबंधन के नेता हैं। वह करिश्माई नहीं हैं, पर करिश्मे से ही वह प्रधानमंत्री हैं। अपने दूसरे कार्यकाल में उन्होंने देश की जनता को सर्वाधिक निराश किया है। बात महंगाई की करें तो ज्ञात होता है कि खाद्य पदार्थों में 110.6 प्रतिशत गेंहूं की कीमतों में 82.3 प्रतिशत चावल में लगभग 84 प्रतिशत दूध की कीमतों में 104.6 प्रतिशत, दालों की कीमतों में 111 प्रतिशत, सब्जियां 171.6 प्रतिशत बंद गोभी 540.2 प्रतिशत सभी जिंसों की कीमतों में 63 प्रतिशत की वृद्घि हुई है। उनके कार्यकाल में 2जी स्पैक्ट्रम घोटाला, राष्टï्रमंडल खेल घोटाला, सिविल सोसाइटी घोटाला, लोकपाल की लड़ाई, गठबंधन का संकट, आदर्श सोसाइटी घोटाला कुछ ऐसे विकट घोटाले व संकट रहे हैं, जिन्होंने इतिहास तो बनाया पर भविष्य की पीढिय़ों को वर्तमान के नकारात्मक परिवेश से परीचित कराकर बनाया। नकारापन सरकार का ही नहीं था बल्कि आवाम का भी रहा जिसने एक असमर्थ, असहाय और कमजोर प्रधानमंत्री को ढोया और उसे अपना नेता बनाये रखा। दुनिया आर्थिक मंदी से गुजर रही है, विपरीत हालात हैं, ऐसे में देश के नेतृत्व को चाहिए कि सकारात्मक दिशा में ऊर्जा को व्यय किया जाए, किंतु देश की सारी ऊर्जा नकारात्मक दिशा में व्यय हो रही है। अन्ना स्वयं में कोई नेता नहीं हैं, लेकिन उन्हें नेता बना दिया मनमोहन सिंह की कमजोर नीतियों ने। दिशाविहीन सरकार अपनी ही दिशा तय नहीं कर पायी। अन्ना के जनलोकपाल को लेकर विवाद की आवश्यकता नहीं थी। सरकार को अपनी ईमानदारी जनता जनार्दन में साबित करने के लिए जनलोकपाल से भी बेहतर कानून लाना चाहिए था। जनता संसद से बड़ी तो नहीं है पर वह सरकार की ईमानदारी का सबूत कभी भी मांग सकती है, जिसे सरकार देने के लिए बाध्य है। इसी को लोकतंत्र कहा जाता है। आज देश में निराशावाद की स्थिति है। जिसे सरकार दूर करने में असफल रही है। अन्ना और बाबा रामदेव के साथ बेकार की बहस ने इस निराशा को और भी गहराया है। मनमोहन सरकार नीतिगत फेेसले लेने में भी असफल रही है। कुल मिलाकर कहीं कहीं प्रणव मुखर्जी व्यक्तिगत स्तर पर कुछ बेहतर करते से दिखाई दिये तो कहीं एके एंटोनी अच्छा करते हुए दिखाई दिये। लेकिन रक्षामंत्री के अच्छे प्रयासों के बावजूद भी देश विश्व में परंपरागत हथियारों का सबसे बड़ा आया तक देश बना रहा है। इसे सरकार की अकुशलता तो कहा ही जा सकता है साथ ही कमीशन खोरों की फैलाई गयी बिसात का परिणाम भी कहा जाना चाहिए जो अपने कमीशन की चाह में देश में परंपरागत हथियारों का निर्माण नहंी होने देना चाहते हैं। बात साफ है कि एके एंटोनी सेना की राजनीति में कमीशनखोरों के घरौंदे को तोडऩे में असफल रहे हैं। बावजूद उनकी अच्छी कार्यप्रणाली के देश के चारों ओर हमारे शत्रुओं की चलों में बड़ा गहरा तालमेल और बढ़ा ही है। चीन, पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल कहीं न कहीं किसी एक लड़ी में बंधते जा रहे हैं और भारत के खिलाफ किसी बड़े षडयंत्र की तैयारी सी करते जान पड़ते हैं। नि:संदेह यह स्थिति भारत की कमजोर विदेश नीति का परिणाम है। बात ऐसी भी नहीं है कि हम अमेरिका के निकट चले गये हों। अमरीका एक व्यापारी देश है और वह अपने व्यापार के दृष्टिïकोण से कहीं हमें चाहे साथ लगा ले लेकिन वह हमें हर जगह और हमेशा साथ रखने को तैयार नहीं है। हमारी सरकार अपने शत्रुओं से अपने आप निपटेगी और अमेरिका उसका कभी अड़ी भीड़ में संगी हो जाएगा ऐसा भरोसा लेने में वह अमेरिका से असफल रही है। अमेरिका से हमारे संबंध धुंधलके ही हैं। देश के अंदरूनी हालात भी बहुत अच्छे नहीं हैं। कश्मीर धधक रहा है, और धधकते हुए कश्मीर को अपने हालात पर छोड़ते हुए वहां से सेना वापसी की बातें भी की जा रही हैं। पंजाब की गुरूभूमि की पांचों नदियों में आतंक की बाढ़ आने का खतरा बना हुआ है। पूर्वोत्तर में ईसाईकरण की प्रक्रिया की परिणीति से अलगाववाद की स्थिति दिन प्रतिदिन भयंकर होती जा रही है। महाराष्टï में प्रांतवाद की उग्रता बढ़ रही है, उत्तर प्रदेश में जातिवादी राजनीति अपने चरम पर है, राजस्थान में सामाजिक स्तर पर काफी बेचैनी है, राजनीतिक स्थिति भी अधिक नहीं कही जा सकती है, दक्षिण में भाषावाद हावी है और मध्य भारत में भी स्थिति ज्यादा अच्छी नही है।
ऐसी निराशाजनक परिस्थितियों को पैदा करने वाली मनमोहन सरकार चल रही है और देश को चला रही है, यह निश्चय ही एक आठवां आश्चर्य है। मनमोहन को चाहिए कि वह अपना सुयोग्य उत्तराधिकारी संसद में स्वयं घोषित कर दें बिना किसी मैडम का इंतजार किये और बिना यह सोचे कि नेता का चुनाव पार्टी करेगी या जनप्रतिनिधि करेंगे। पार्टी और जनप्रतिनिधियों ने जब उन्हें ही नहीं चुना तो अब अपने उत्तराधिकारी के लिए ही वह ऐसी आशा क्यों करते हैं? देश के नेता का चुनाव जनता करती है, इस सच्चाई को सोनिया गांधी ने नकारने का असंवैधानिक आचरण किया। जिसका परिणाम देश भुगत रहा है। अब मनमोहन सिंह कोई नई लेकिन संविधान की मूल भावना के अनुरूप परंपरा डालें। सचमुच उनका देश पर भारी एहसान होगा।

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