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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

गुटनिरपेक्ष शिखर सम्मेलन को जब यासर अराफात बीच में छोड़कर लौटने लगे थे अपने देश

बात 1983 की है। जब गुटनिरपेक्ष आंदोलन का सातवां शिखर सम्मेलन भारत में आयोजित किया गया था। नई दिल्ली को उस समय दुल्हन की तरह सजाया गया था। उस समय देश का नेतृत्व एक सक्षम और मजबूत प्रधानमंत्री के रूप में श्रीमती इंदिरा गांधी कर रही थीं। उनके समय में कई ऐसे महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए जिनसे देश का विश्व स्तर पर सम्मान बड़ा था। गुटनिरपेक्ष आंदोलन के सातवें शिखर सम्मेलन का भारत में आयोजन किया जाना उनके इसी प्रकार के निर्णयों में से एक था।
आज जब नई दिल्ली में ‘भारत मंडपम’ में जी-20 के 18 वें शिखर सम्मेलन का आयोजन हो रहा है तो 1983 के गुटनिरपेक्ष आंदोलन के सातवें शिखर सम्मेलन की याद आना स्वाभाविक है। जिस प्रकार आज केंद्र सरकार जी-20 शिखर सम्मेलन को सफल बनाने का प्रयास करती हुई दिखाई दी है उसी प्रकार गुटनिरपेक्ष आंदोलन शिखर सम्मेलन को भी सफलतापूर्वक संपन्न करने में तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार तत्पर दिखाई दी थी।
उस समय नई दिल्ली में गुटनिरपेक्ष देशों के शिखर सम्मेलन को 7 से 12 मार्च 1983 तक आयोजित किया गया था। इंदिरा गांधी के लिए शिखर सम्मेलन की सफलता प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गई थी। उन्होंने अपने पूर्ण विश्वसनीय कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नटवर सिंह को शिखर सम्मेलन का महासचिव बनाया था। नटवर सिंह विदेश नीति के मर्मज्ञ माने जाते थे। उस समय भारत में 4000 विदेशी मेहमान एक साथ आए थे। ‘अतिथि देवो भव:’ की परंपरा में विश्वास रखने वाले भारतवर्ष ने उस समय अपने अतिथियों की भरपूर सेवा की थी। यही कारण था कि सम्मेलन में उपस्थित रहे विदेशी राष्ट्राध्यक्षों /शासनाध्यक्षों ने अपने-अपने देशों को लौटने के पश्चात भारत के अतिथि के सत्कार की खुले दिल से प्रशंसा की थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने दिल्ली को उस समय दुल्हन की तरह सजाया था। दिल्ली की साफ सफाई का पूरा ध्यान रखा गया था और दिल्ली का कायाकल्प करने में किसी प्रकार की कमी नहीं छोड़ी गई थी।
नई दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में उस कार्यक्रम का आयोजन किया गया था । इस भवन को भी पूरी भव्यता के साथ सजाया गया था। कभी इस भवन को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने यूनेस्को कांफ्रेंस के लिए 1956 में बनवाया था। उस समय भारत के पास ऐसे भवनों की कमी थी , जिनमें बड़े-बड़े शानदार कार्यक्रम आयोजित किये जा सकें।
नटवर सिंह ने उस कार्यक्रम को सफल बनाने में बड़ी मेहनत की थी। पर जब इतना बड़ा कार्यक्रम होता है तो कहीं ना कहीं कोई ना कोई ऐसी कमी रह जाती है जो किसी न किसी अतिथि को अखर जाती है। उस समय फिलिस्तीन के नेता यासर अराफात को यह बात अखर गई थी कि उनसे पहले जॉर्डन के शासक को बोलने का मौका दे दिया गया था। इस छोटी सी बात को यासर अराफात ने अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था। उनको यह बात इतनी अधिक चुभ गई थी कि उन्होंने शिखर सम्मेलन को बीच में ही छोड़कर अपने देश लौट जाने का निर्णय ले लिया था। नटवर सिंह की देखरेख में उस समय सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था पर अचानक आए इस प्रकार के गतिरोध की जानकारी जब उन्हें हुई तो उन्होंने आनन फानन में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लिए फोन किया।
कुंवर नटवर सिंह ने प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को वस्तु स्थिति से अवगत कराया। जब इंदिरा गांधी को नटवर सिंह के माध्यम से यह जानकारी मिली कि यासर अराफात दिल्ली छोड़कर अपने देश लौटने वाले हैं तो वह भी विज्ञान भवन की ओर दौड़ी दौड़ी चली आईं । वह नहीं चाहती थीं कि किसी भी प्रकार की असहज स्थिति सम्मेलन में उत्पन्न हो और भारत विरोधियों को यह कहने का अवसर प्राप्त हो कि भारत सफलतापूर्वक आंदोलन की मेजबानी नहीं कर पाया और उसने अपने घर बुलाकर जानबूझकर यासर अराफात जैसे लोगों की बेइज्जती कराई है।
प्रधानमंत्री श्रीमती गांधी ने अपनी जिम्मेदारी को समझा। नटवर सिंह के समझाने पर श्रीमती इंदिरा गांधी ने फिदेल कास्त्रो को विज्ञान भवन में आने के लिए कहा। इंदिरा गांधी ने उस समय अपने मेहमान फिदेल कास्त्रो को फोन पर सारी वस्तु स्थिति से अवगत कराया और उन्हें बताया कि किस प्रकार यासर अराफात छोटी सी बात का बुरा मान गए हैं और वह सम्मेलन को बीच में ही छोड़कर स्वदेश लौट जाने की तैयारी कर रहे हैं। उनके आग्रह पर वे तुरंत विज्ञान भवन पहुंच गए।
फिदेल कास्त्रो ने उस समय स्वयं यासर अराफात को फोन लगाकर उनसे बातचीत की। बातचीत में उन्होंने श्री अराफात को विज्ञान भवन आने का आमंत्रण दिया। श्री फिदेल कास्त्रो के इस विनम्र अनुरोध पूर्ण आमंत्रण को यासर अराफात ने सहज रूप में स्वीकार कर लिया और वह स्वयं भी विज्ञान भवन पहुंच गए।
अपने अनुभवों को साझा करते हुए इस संबंध में नटवर सिंह ने स्वयं जानकारी दी थी कि कास्त्रो के फोन करने के कुछ ही देर बाद अराफात विज्ञान भवन पहुंच गए। क्यूबा के राष्ट्रपति ने उनसे पूछा कि क्या आप इंदिरा गांधी को अपना मित्र नहीं मानते? अराफात ने तुरंत कहा कि- “आप मित्र होने की बात कह रहे हैं, मैं तो श्रीमती इंदिरा गांधी को अपनी बड़ी बहन मानता हूं। इतना ही नहीं, मैं अपनी बड़ी बहन के लिए कुछ भी कर सकता हूं।” कास्त्रो को समझो कि यासर अराफात के मुंह से वही शब्द सुनने को मिल गए थे, जिनकी वह अपेक्षा कर रहे थे। उन्होंने सही समय पर गर्म लोहे पर चोट मारी और यासर अराफात से ऐसी बात कह दी जिसको सुनने के पश्चात उनके पास दिल्ली के गुटनिरपेक्ष आंदोलन में रुके रहने के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं रह गया था। कास्त्रो ने अपने स्वर को कुछ कठोर करते हुए यासर अराफात से कहा कि “यदि आप श्रीमती इंदिरा गांधी को अपनी बड़ी बहन मानते हो तो स्वयं छोटे भाई के रूप में अपने आपको पेश कीजिए और शिखर सम्मेलन के शेष सत्रों में शांत भाव से सम्मिलित होते रहिए।”
अब यासिर अराफात के पास शिखर सम्मेलन के सभी सत्रों में उपस्थित रहने के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं था।
जिस प्रकार आज रूस और यूक्रेन युद्ध ग्रस्त हैं इस प्रकार 1983 में गुटनिरपेक्ष आंदोलन के शिखर सम्मेलन के समय इराक और ईरान के बीच संघर्ष चल रहा था। भारत के पड़ोस में चलने वाले इस युद्ध से उपमहाद्वीप के लिए भी खतरा था। विदेशी शक्तियां उस समय भारत के इर्द-गिर्द के क्षेत्र में युद्ध का अखाड़ा बनाने की योजनाओं पर काम कर रही थीं। तब इंदिरा गांधी ने शिखर सम्मेलन में गुटनिरपेक्ष आंदोलन के नेता के रूप में बोलते हुए कहा था कि इराक और ईरान को इस दु:खद युद्ध को समाप्त करने पर अपनी सहमति देनी चाहिए। इंदिरा गांधी के इस नैतिक साहस की उस समय विश्व नेताओं ने भी प्रशंसा की थी।
उस समय पड़ोसी देश पाकिस्तान के राष्ट्रपति जिया उल हक ने हमारे प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को पत्र लिखकर उनकी मेजबानी की खुले शब्दों में प्रशंसा की थी। आज भारतवर्ष फिर एक बड़े आंदोलन का नेता बन रहा है। प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी से भी दो कदम आगे जाकर प्रधानमंत्री श्री मोदी देश का सम्मान ऊंचा कर रहे हैं। इस समय सारी राजनीति ,कूटनीति और रणनीति शिखर सम्मेलन को सफलतापूर्वक संपन्न करने की बनी हुई है। भारत को नई दौर में नई सोच और नई ऊंचाई की ओर बढ़ाने के लिए अपने संकोच आगे आना होगा।

डॉ राकेश कुमार आर्य
( सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं।)

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