राजग की दरकती दीवारें

मगन देव नारायण सिंह

जनता दल (यू.) और भाजपा नेताओं के वाक्युद्ध से राजग अर्थात राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की दीवारें दरकने लगीं है। राजनीतिक विश्लेषकों को अब यह विश्वास हो गया है कि राजग के देदिप्यमान भवन के ध्वस्त होने में अब देर नहीं है। वैसे राजनीति के पंडितों का यह भी कहना है कि राजग की दिवारों का दरकना कोई आज की बात नहीं है। झारखण्ड विधान-सभा चुनाव और अभी हालिया उत्तर-प्रदेश विधान सभा चुनाव में ही जदयू ने अपनी डफली अपना राग गाकर स्पष्ट संकेत दे दिया था कि वे अपने निहित स्वार्थ में कभी भी भाजपा का दामन झटक सकते हैं। बिहार में सुशील मोदी जी के बदौलत जदयू अपनी शत्र्तो पर भाजपा को जदयू की चाकरी करने पर मजबूर करती रही है। यही वजह है कि जब-जब बिहार के मुख्यमंत्री और जदयू के आलाकमान नीतीश कुमार की कार्यशैली से भाजपा में अकुलाहट बढ़ी तो सुशील जी दिल्ली के अपने आकाओं की बदौलत नीतीश जी की आकांक्षाओं की पूर्ति के लिये सक्रिय हो गये। इस बार भी जब हंसुया के बियाह में खुरपी के गीत की तरह राष्ट्रपति चुनाव के तानाबाना के समय प्रधानमंत्री चुनाव का राग छेडऩे पर फौरन सुशील जी आगे आये और वक्तव्य दे मारा कि प्रधानमंत्री के पद पर अटलजी जैसा व्यक्तित्व होना चाहिये। भारत की जनता यह जानना चाहती है कि अटलजी जैसा व्यक्तित्व भाजपा में कोई है । धर्मनिरपेक्षता की राग अलाप कर राष्ट्रपति चुनाव के मुद्दे से देश का ध्यान बांटने की साजिश करने वाले नीतीश जी की मंशा क्या है? धर्मनिरपेक्षता का राग शुरू से कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों द्वारा आलापा जाता रहा है। अचानक नीतीश जी धर्मनिरपेक्षता की शहनाई क्यों बजाने लगे ? राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद और लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान जी का यह कथन शत-प्रतिशत जनता सही मानती है कि जब अटलजी के मंत्रिमंडल में नीतीश कुमार रेलमंत्री की कुर्सी का आनन्द लूट रहे थे तभी 2002 में गुजरात में दंगें हुये। तब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ही थे। कांग्रेस ने एक स्वर से नरेन्द्र मोदी को सांप्रदायिक कहा था। तब तो नीतीश जी ने नरेन्द्र मोदी का समर्थन किया था। उस समय यदि उनके दिल में रामविलास जी की तरह अकुलाहट होती तो नीतीश जी भी रामविलास जी की तरह मंत्री पद और राजग से इस्तीफा देकर अलग हो गये होते। आज 2012 में 2014 की सोचकर उनके अन्दर धर्मनिरपेक्षता की बांसुरी क्यों बजने लगी ? इस बात पर चर्चा की जरूरत है कि निरपेक्ष का अर्थ क्या है ? यदि, यह साफ हो जाय तो धर्मनिरपेक्षता का अर्थ भी स्पष्ट हो जायगा। विद्वानों की राय में निरपेक्ष का अर्थ होता है – उदासीन। अर्थात् जो किसी के साथ संलिप्त नहीं हो। यदि, ऐसा है तो धर्मनिरपेक्ष का अर्थ यही होगा कि जो किसी भी धर्म के प्रति अपनी संलिप्तता या अतिशय प्रेम को नहीं दर्शाये। इस परिभाषा के अनुसार भारत में कोई धर्मनिरपेक्ष हो ही नहीं सकता। सभी का किसी न किसी धर्म के साथ जुड़ाव, लगाव और प्रेम है। नीतीश जी भी उससे पड़े नहीं हैं। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सर संघचालक माननीय मोहन राव भागवत जी के कथन कि – हिंदुवादी प्रधानमंत्री क्यों नहीं ? पर भी चर्चा होनी चाहिये। राष्ट्र को इसका स्पष्ट उत्तर चाहिये। वैसे राजनीति के पंडितों का कहना है कि समाजवादी विचार धारा का दम्भ भरने वाले लम्बे समय तक एक साथ रह ही नहीं सकते। टूटना-बिखडऩा और जुडऩा उनकी फितरत है। इनके इतिहास पर नजर डालिये। सोसलिस्ट पार्टी का गठन हुआ तो समाजवादी विचारधारा के पुरोधा राम मनोहर लोहिया, आचार्य नरेन्द्र देव, आचार्य कृपालानी, जयप्रकाश नारायण, राजनारायण, मधुलिमये, दण्डवते, जार्ज फर्नाडिस और कर्पूरी ठाकुर सरीखे नेता कुछ ही वर्षो में तितर-वितर हो गये। एक धारा प्रजा सोसलिस्ट पार्टी बनाकर अलग हो गयी। एक वटवृक्ष के चिन्ह पर और दूसरा झोपडी़ छाप पर चुनाव लडऩे लगा। किन्तु, चन्द वर्षो में ही अपने को प्रभावहीन होता देख वे फिर एकजुट हो गये और पार्टी का नाम संयुक्त सोसलिस्ट पार्टी रखा। इस फितरत को देखकर ही जयप्रकाश नारायण ने राजनीति से सन्यास लेकर सर्वोदय और बिनोवाजी के भू-दान आन्दोलन में सक्रिय हो गये।

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