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हमारे क्रांतिकारी / महापुरुष

शिक्षक का जीवन राष्ट्र के लिए अतुलनीय पाथेय

डॉ. वंदना सेन

व्यक्ति जीवन भर शिक्षा ग्रहण करता है, तब भी शिक्षा का कोई न कोई अध्याय अधूरा ही रह जाता है। लेकिन भारत के राष्ट्र निर्माता कहे जाने वाले शिक्षक अपने शिष्य में अपनी छवि का दर्शन देखना चाहते हैं। शिक्षक वही है, जो अपने अनुसार देश का चरित्र निर्माण कर सके। अपने देश के संस्कारों को देश की भावी पीढ़ी में उतार सके। शिक्षा वही सार्थक होती है, जो अपने देश के लिए चरित्रवान समाज और सकारात्मक सोच का निर्माण कर सके। भारत में अभी तक जो शिक्षा दी जा रही थी, उसमें भारत के मानबिन्दुओं का उपहास उड़ाया गया और विदेशियों का गुणगान किया गया। इसमें ऐसे भी विदेशी शामिल किए गए, जिन्होंने भारतीयता को नष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ऐसे चरित्रों के पठन पाठन से ही आज की पीढ़ी भारत के संस्कारों से दूर होती जा रही है। लेकिन हमारे देश के शिक्षकों को भी यह समझना चाहिए कि छात्रों को क्या शिक्षा दी जाए।
हमारे देश में शिक्षाविद डॉ. राधाकृष्णन के जन्म दिवस को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है, लेकिन आज के विद्यार्थियों को यह भी नहीं पता होगा कि डॉ. राधाकृष्णन जी के जीवन शिक्षकों के लिए एक आदर्श है, एक पाथेय है। जिस पर चलकर हम शिक्षक की वास्तविक भूमिका का सही ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। उनके जीवन पर एक नजर डालते हैं। सन 1962 में जब डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारत के राष्ट्रपति बने, तब उनके कुछ विद्यार्थी उनके पास उनका जन्मदिन मनाने की स्वीकृति लेने गए। उस समय राधाकृष्णन जी ने कहा मेरा जन्मदिन मनाने के बजाय 5 सितंबर शिक्षक दिवस के रुप में मनाया जाए तो मुझे अति प्रसन्नता एवं गर्व महसूस होगा। डॉ. राधाकृष्णन का शिक्षकों के बारे में मत था कि शिक्षक वह नहीं जो छात्र के दिमाग में तथ्यों को जबरन ठूंसे। वास्तविक शिक्षक तो वह है जो छात्र को आने वाले कल की चुनौतियों के लिए तैयार करे।
आज की शिक्षा चुनौतियों को ध्यान में रखकर नहीं, बल्कि जीवन में पैसे कैसे कमाए जाते हैं, इसे ही ध्यान में रखकर दी जा रही है। कहा जा सकता कि जो शिक्षा दे रहे हैं, वे इसे व्यवसाय मान रहे है और जो ग्रहण कर रहे वे इसे आय प्राप्त करने का साधन। ऐसी शिक्षा चरित्र का निर्माण नहीं कर सकती। इसलिए शिक्षकों को चाहिए कि वे छात्रों को ऐसी शिक्षा भी दें, जो उनके जीवन को संवार सके। क्योंकि जिस शिक्षा से संस्कारों का निर्माण होता है, वही जीवन के काम आती है। शिक्षा वही सार्थक होती है, जो जीवन में नैतिक मूल्यों का विकास करे, इसके साथ ही सामाजिक और राष्ट्रीय दायित्वों के प्रति कर्तव्य पालन का बोध कराए। राष्ट्रीय दायित्व का बोध केवल इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों के अध्ययन और अध्यापन से ही हो सकता है। वर्तमान में यह देखने में आ रहा है कि हम शिक्षा तो ग्रहण कर रहे हैं, लेकिन पिछले पाठों को भूलते जा रहे हैं। इसका एक मूल कारण हमारे देश की शिक्षा नीति भी रही है। आज से 75 वर्ष पूर्व जब हमारा देश स्वतंत्र हुआ, तब हमारी शिक्षा नीति को भारतीय बनाने पर जितना जोर दिया जाना चाहिए, उतना नहीं दिया गया। शिक्षा के क्षेत्र में हम पूरी तरह से भटक गए। इसलिए आज की पीढ़ी में न तो भारतीय संस्कारों का बोध है और न ही नैतिकता के जीवन मूल्य ही हैं।
हम भली भांति जानते हैं कि पुरातन काल में भारतीय गुरुकुलों में जो शिक्षा प्रदान की जाती थी, वह निश्चित रूप से बच्चों का समग्र विकास करने वाली ही थी। इतना ही नहीं वह शिक्षा विश्व स्तरीय ज्ञान का द्योतक भी थी, इसलिए विश्व के कई देश भारत के शिक्षालयों में ज्ञान और विज्ञान की उच्च स्तरीय शिक्षा ग्रहण करने आते थे। हमें अब उसी शिक्षा पद्धति की ओर कदम बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। अभी भारत सरकार ने इस दिशा में सार्थक कदम बढ़ाया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति इंडिया को भारत बनाने में सकारात्मक सिद्ध होगी, यह संकेत दिखाई देने लगे हैं। शिक्षको को भी चाहिए कि वह इस नीति को आत्मसात कर बच्चों के भविष्य को वह दिशा प्रदान करें जो विश्व के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है।
जिनकी याद में हम शिक्षक दिवस मनाते हैं, वे चाहते थे कि शिक्षा विद्यार्थियों को सही और गलत का बोध कराने वाली होना चाहिए। वास्तव में डॉ. राधाकृष्णन जी भारतीय संस्कृति के संवाहक थे। उन्होंने अपने लेखों और प्रबोधन के माध्यम से भारतीय संस्कृति की सुगंध को हमेशा ही प्रवाहित किया। एक बार शिकागो विश्वविद्यालय में उनको धर्म शास्त्रों पर व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया। जहां उन्होंने भारत के ज्ञान के बारे में प्रेरणास्पद उद्बोधन दिया। इस उद्बोधन के बाद डॉक्टर राधाकृष्णन जी की ख्याति वैश्विक धरातल पर और भी बढ़ती चली गई और इसी कारण उन्हें भारत एवं अन्य देशों की प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया। उसके बाद विश्व में भारत का गौरव गान होने लगा। उनके भाषणों में सिर्फ भारत ही होता था। वह जब बोलते थे तब ऐसा लगता था कि यही भारत की वाणी है। वह वास्तव में भारत रत्न थे। इसलिए भारत सरकार ने सन 1954 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया।
शिक्षा अत्यंत ही अनमोल एवं मूल्यवान है। जिससे विद्यार्थी अपने स्वयं के ज्ञान का विस्तार तो करता ही है, साथ ही देश को भी मजबूत करता है। डॉ. राधाकृष्णन ने अपनी पुस्तक आधुनिक भारत के राजनीतिक विचारक में भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में शिक्षकों और शिक्षा के महत्व को बताया है। डॉक्टर राधाकृष्णन के अनुसार शिक्षक देश के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और इसी वजह से हुए अधिक सम्मान के योग्य होते हैं। भारत में सनातन काल से गुरु और शिष्य का संबंध समर्पण की भावना से परिपूर्ण रहा है। गुरु देश के भविष्य को संवारता है। वर्तमान पीढ़ी देश का भविष्य है। गुरु जैसे संस्कार युवा पीढ़ी को देंगे वैसा ही देश का चरित्र बनेगा।

(लेखिका हिंदी की सहायक प्राध्यापक है)

डॉ. वंदना सेन, सहायक प्राध्यापक
पीजीवी महाविद्यालय (जीवाजी विश्वविद्यालय ग्वालियर)
पीजीवी महाविद्यालय, जीवाजीगंज, लश्कर ग्वालियर (मध्यप्रदेश)

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