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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

‘एक देश एक चुनाव’ समय की आवश्यकता

'एक देश एक चुनाव' के विचार की आवश्यकता बहुत देर से अनुभव की जा रही थी। यदि प्रशासनिक स्तर पर दृष्टिपात किया जाए तो पता चलता है कि हर छठे महीने कोई ना कोई चुनाव देश में होता रहता है। इससे सरकारी तंत्र का दुरुपयोग होता है। धन भी अधिक खर्च होता है । इसके अतिरिक्त पूरा प्रशासनिक तंत्र चुनाव के कार्यों में लगे रहने के कारण चुनावी तंत्र बनकर रह जाता है। जिला मुख्यालय और तहसील स्तर पर  किसान लोग अपने आवश्यक कामों के लिए भटकते रहते हैं और प्रशासन किसी न किसी चुनाव की तैयारी में लगा रहता है।  इससे राजस्व विभाग में लंबित वाद लटके रह जाते हैं और किसानों को तथा वादकारियों के लिए सस्ता और सुलभ न्याय एक दिवास्वप्न बनकर रह गया है । ऐसे में 'एक देश एक चुनाव' समय की आवश्यकता है।
पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के नेतृत्व में 'एक देश एक चुनाव' पर विचार हेतु केंद्र सरकार ने एक समिति बनाई है। पूर्व राष्ट्पति अपनी न्याय संगत कार्य शैली के लिए जाने जाते हैं।  इस समय देश को एकाग्रचित होकर अपने भविष्य पर ध्यान केंद्रित कर आगे बढ़ने की आवश्यकता है। यह ठीक है कि लोकतंत्र में कई प्रकार के विरोधाभास होते हैं और कई विरोधी बातों के लिए स्थान खाली बना रहता है। लोकतंत्र की इस दुर्बलता को हथियार बनाकर केवल यह राग अलापा जाता रहना कि हमको तो विरोध ही करना है, किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं कहा जा सकता। 

यदि हम देश में आधार कार्ड एक सा बना सकते हैं ,’एक देश एक टैक्स’ की व्यवस्था को सफलतापूर्वक लागू कर सकते हैं तो ऐसे ही सुधारों के दृष्टिकोण से ‘ एक देश एक चुनाव’ के विचार को देखना चाहिए। हम सभी यह भी भली- भांति जानते हैं कि देश में ‘एक नेशन एक राशन’ की व्यवस्था को भी देश के कई राज्यों ने अपना कर सही ढंग से लागू कर दिया है। इससे जन सामान्य को काफी सुविधा अनुभव हुई है। वैसे भी हमारा अंतिम लक्ष्य जनसाधारण को सुविधा संपन्न करना ही होता है। लोकतंत्र तो सुविधा देने के लिए ही जाना जाता है।
देश की एकता और अखंडता को बनाए रखकर देश के सामाजिक परिवेश में समरूपता स्थापित करने के लिए सारे देश के बुद्धिजीवी लोग समान नागरिक संहिता को भी लागू करने पर अपना गंभीर विचार व्यक्त कर रहे हैं। हमारे देश के संविधान निर्माताओं ने तो संविधान निर्माण के समय ही इसका संकल्प ले लिया था। सरकार को आज इस पर भी गंभीरता दिखानी चाहिए और आगामी लोकसभा चुनावों से पहले देश में समान नागरिक संहिता लागू की जानी चाहिए।
देश में हजारों करोड़ रूपया आम चुनावों पर खर्च होता है। इसके अतिरिक्त जब-जब किसी प्रदेश के चुनाव आते हैं तो प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री तथा अन्य प्रमुख नेताओं को उन चुनावों में अपनी अपनी पार्टी को जिताने के लिए हवाई यात्राएं करनी पड़ती हैं । जिसके लिए मोटा पैसा खर्च किया जाता है। अंतिम रूप से इन सब का प्रभाव देश के विकास कार्यों पर पड़ता है। ‘एक देश एक चुनाव’ से हम इस झंझट से मुक्ति पा सकते हैं और वर्तमान में चल रही महंगी चुनावी प्रक्रिया के दृष्टिगत बहुत कम खर्चे में सारे देश के चुनाव एक साथ हो सकते हैं।
यदि इस बात पर विचार किया जाए कि देश का विपक्ष देश में ‘एक देश एक चुनाव’ के विचार से सहमत क्यों नहीं है ? तो इसका उत्तर यह है कि वह जिस प्रकार अब ‘इंडिया’ नाम के गठबंधन को तैयार कर रहा है, ‘एक देश एक चुनाव’ की स्थिति लागू होते ही इस गठबंधन के टूटने की प्रबल संभावनाएं बन जाएंगी। क्योंकि राज्य स्तरीय राजनीतिक दल किसी भी कीमत पर अपनी पार्टी की मुख्यमंत्री पद की दावेदारी को किसी गठबंधन के नाम पर बलि नहीं चढ़ाएंगे। यदि बात उत्तर प्रदेश की करें तो यहां अखिलेश यादव अपने आप को भावी मुख्यमंत्री के रूप में देख रहे हैं। वे यह कदापि नहीं चाहेंगे कि अपने गढ़ में किसी गठबंधन के नाम पर कांग्रेस या किसी भी राजनीतिक दल को वे लाभ पहुंचा दें। ऐसा ही प्रत्येक प्रांत में है। तब इन सब ‘इंडिया’ वालों के सामने सरकार के प्रयास की आलोचना करने के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प नहीं है।
माना कि अपने चुनावी घोषणा पत्रों में देर से ‘एक देश एक चुनाव’ की प्रक्रिया की वकालत कर रही भाजपा ‘एक देश एक चुनाव’ के विचार से तात्कालिक लाभ ले सकती है, पर हम आप जैसे लोगों को किसी भी राजनीतिक गुणा भाग में पड़े बिना देश के हित पर विचार करना चाहिए। हमारा मानना है कि इस समय देश का हित इसी में है कि ‘एक देश एक चुनाव’ की प्रक्रिया को यथाशीघ्र पूर्ण कर इसे सही ढंग से लागू कर दिया जाए। इस प्रकार की प्रक्रिया को लागू करने का एक लाभ यह भी होगा कि अधिक से अधिक लोग चुनाव में भाग ले सकेंगे। क्योंकि जितना छोटा चुनाव होता है, उतना ही अधिक लोग चुनाव में भाग लेने के लिए बाहर निकलते हैं। लोकसभा चुनाव में लोगों की बढ़ती उदासीनता का एक कारण यह है कि उसमें खड़े होने वाले प्रत्याशियों में लोगों की रुचि घटती जा रही है। उनसे अधिक रुचि लोगों को अपने विधायक पद के उम्मीदवार में होती है और उससे भी अधिक रुचि ग्राम प्रधान के चुनाव में खड़े होने वाले अपने प्रत्याशी के लिए होती है। यदि यह सब चुनाव एक साथ होंगे तो अपनी-अपनी रुचि के लोगों को वोट देने के बहाने मतदान केंद्र पर लोगों का जाना अनिवार्य सा हो जाएगा।
2023 के इस वर्ष में राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, जम्मू–कश्मीर, त्रिपुरा, मेघालय, नागालैंड और मिजोरम समेत देश के दस राज्यों में विधानसभा चुनाव या तो संपन्न हो चुके हैं या अभी होने हैं। इस प्रकार के चुनावों का देश के समय ,धन ,ऊर्जा ,स्वास्थ्य और व्यवस्था सभी पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इस संदर्भ में हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि देश के पहले आम चुनावों से लेकर अगले पंद्रह सालों तक, 1952, 1957, 1962, 1967 में चार बार लोकसभा चुनाव हुए और हर बार राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव भी इनके साथ-साथ ही संपन्न हुए। 1968 से यह प्रक्रिया परिवर्तित होने लगी। 1971 में जब लोकसभा के चुनाव उसके निर्धारित कार्यकाल 1972 से पहले कराए गए तो उस समय भी यह एक देश एक चुनाव की प्रक्रिया बाधित हुई। अब पिछले 25 वर्ष से देश में इस बात को लेकर फिर गहरा चिंतन चल रहा है कि एक देश एक चुनाव की प्रक्रिया को यथाशीघ्र लागू किया जाए। यदि ‘एक देश एक चुनाव’ की प्रक्रिया 1952 के चुनावों की भांति देश में मजबूती के साथ स्थापित रहती तो बहुत संभव था कि देश में क्षेत्रीय दलों का अस्तित्व नहीं होता। माना कि लोकतंत्र में अनेक दलों को चुनावों के समय अपना भाग्य आजमाइश करने का अवसर मिलता है जो उनका संवैधानिक अधिकार भी है, पर छोटे-छोटे राजनीतिक दलों से देश की एकता और अखंडता को भी खतरा पैदा होता है । क्योंकि इस प्रकार के राजनीतिक दल अपनी संकीर्ण मानसिकता का परिचय देते हुए क्षेत्रवाद को प्रोत्साहित करते हैं।

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