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विशेष संपादकीय

यह बात जंचती नही है संगमा जी!

राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी पी.ए. संगमा ने अपने प्रतियोगी और संप्रग  प्रत्याशी प्रणव मुखर्जी को खुली बहस की चुनौती देते हुए भारत में राष्ट्रपति के चुनाव को अमेरिकी पैटर्न पर लडऩे का नया अंदाज देने का प्रयास किया है। दूसरे उन्होंने स्वयं को आदिवासी नेता होने के नाते सांसदों एवं मतदाताओं से अपना मत देने की अपील भी की है।
भारत में राष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया और गरिमा दोनों ही पी.ए. संगमा की उपरोक्त दोनों बातों को छोटा सिद्घ करती हैं। यहां राष्ट्रपति शासनाध्यक्ष ना होकर राष्ट्राध्यक्ष होता है। वह संवैधानिक प्रमुख है, और इससे बढक़र कुछ नहीं। संवैधानिक प्रमुख के चुनाव को आप बहस का मुद्दा नहीं बना सकते। विशेषत: तब जबकि वह सरकार का नीति नियामक ना हो, और केवल दूसरे की नीतियों को अपनी नीति कहने के लिए बाध्य हो। हमें याद रखना होगा, 1979 के उस घटनाक्रम को जब मोरारजी भाई प्रधानमंत्री थे और उनकी सरकार को कांग्रेस ने चौ. चरण सिंह के माध्यम से गिरवाया था। तब नीलम संजीवा रेड्डी राष्ट्रपति थे। उनका और इंदिरा गांधी का छत्तीस का आंकड़ा था। यह उनकी संवैधानिक बाध्यता ही थी कि वह ना चाहते हुए भी नये प्रधानमंत्री को शपथ दिला रहे थे और फिर उसकी सरकार को भी अपनी सरकार कह रहे थे। चौधरी चरण सिंह तक बात सीमित रहती तो भी गनीमत थी, पर बात वही तक नहीं रह सकी, नीलम संजीवा रेड्डी को अपने कार्यकाल में ही उसी इंदिरा गांधी को पुन: प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलानी पड़ी थी, जिसने उनके सामने कांग्रेस में रहते हुए ही वी.वी. गिरि को अपना प्रत्याशी बनाया था और उन्हें जीत दिलायी थी। हमारे राष्ट्रपति को तब इंदिरा सरकार को भी अपनी सरकार कहकर संबोधित करना पड़ा था। यही स्थिति उल्लेखनीय रूप से राष्ट्रपति आर.वेंकटरमण के कार्यकाल में भी उत्पन्न हुई थी। जब उन्होंने राजीव गांधी, वी.पी. सिंह, चंद्रशेखर और नरसिंम्हाराव जैसे विभिन्न गुण, कर्म और स्वभाव के व्यक्तित्वों की सरकार को अलग-अलग समय पर अपनी सरकार कहा। यदि राष्ट्रपति नीति नियामक होता तो ऐसी स्थिति में वह निश्चय ही कुछ दूसरा रूप धर सकता था। लेकिन हमारा राष्ट्रपति संविधान की चादर को गरिमामयी ढंग से ओढक़र बैठता है, और उसकी उपस्थिति मात्र से ऐसा लगता है कि मानो कोई है जो संविधान और संवैधानिक तंत्र का संरक्षक है। इसलिए सरकार से खफा हुए विपक्ष ने कितनी ही बार अपने गुस्से को अपने संवैधानिक प्रमुख के सामने जाकर रायसीना हिल्स में उसी प्रकार उगला है, जिस प्रकार कोई बच्चा अपने सहपाठियों की शिकायत प्रिंसीपल से करता है। इसलिए पी.ए. संगमा को प्रणव के सामने यह चुनौती पेश नहीं करनी चाहिए कि वह खुली बहस के लिए सामने आयें। अब दूसरी बात पर आते हैं। संगमा स्वयं को आदिवासी नेता कह रहे हैं और इस आधार पर अपने लिये वोट मांग रहे हैं। यह बात भी सिरे से ही गलत है। राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी दलित या आदिवासी नहीं हो सकता। वह प्रत्याशी है और सारा राष्ट्र उसमें आने वाले कल के गौरव और स्वाभिमान की तस्वीर देखता है। जाति, सम्प्रदाय, क्षेत्र, भाषा और प्रांत में उसके व्यक्तित्व को घसीटना गलत होता है। विशेषत: उसके खुद के द्वारा ऐसा किया जाना तो कतई गलत है। यदि किसी छोटे कद के प्रत्याशी को पार्टियां इस पद का प्रत्याशी केवल दलगत भावना से या अपने किसी निहित स्वार्थ के कारण, या किसी वर्ग विशेष के तुष्टिकरण के लिए बनाती है, तो ऐसी पार्टियों के निर्णयों की तो आलोचना हो सकती है, लेकिन ऐसे राष्ट्रपति की आलोचना नहीं हो सकती और ना ही प्रत्याशी की। हम गरिमाहीन आचरण के निष्पादन से बचने का सदैव प्रयास करें, तभी अच्छाई है। इसलिए संगमा जी भी एक गरिमा का पालन करें। वह स्वेच्छा से मैदान में खड़े हैं, सारा देश उनका सम्मान करता है, सारा देश उन्हें आदिवासी नेता न मानकर अपने संवैधानिक प्रमुख के पद का प्रत्याशी मान रहा है और वह स्वयं को आदिवासी मान रहे हैं। यह बात जंचती नही है। राष्ट्रपति का चुनाव देश में लोकतंत्र में गणतंत्र का एक गरिमामयी खेल होता है। यह खेल देश के लिए गौरवमयी होता है। इसलिए इस खेल में खिलाड़ी के हर दांव पर और गतिविधि पर हर व्यक्ति कड़ी नजर रखता है। बेहतर हो कि संगमा इस खेल की गरिमा का ध्यान रखें। वैसे भी इस समय उनके साथ जो पार्टियां आकर खड़ी हुईं हैं उनकी नजर में 2014 का लोकसभा चुनाव है। उसी के दृष्टिïगत संगमा को समर्थन मिल रहा है। राष्ट्रपति चुनाव मानो 2014 के लोकसभा चुनावों का सेमीफाइनल है। इस सेमीफाइनल में संगमा प्रणव को चुनौती दे रहे हैं। यह उनके लिए गौरव की बात है।

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