Categories
मुद्दा

मुर्दाल मनहूसों का साया, हर तरफ अपना-पराया

  • डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

अब तक यही कहा जाता रहा है कि एक मछली सारे तालाब को गन्दा कर देती है पर अब मछली एकमात्र नहीं होती, मछलियों ने संगठन की ताकत को समझ लिया है तभी अब एक ही तालाब में खूब सारी ऐसी समान दुराचार-दुर्व्यहार वाली मछलियाँ गिरोह के रूप में रहने लगी हैं जो न केवल तालाब को ही गंदा कर डालती हैं बल्कि तालाब के तटों और वनस्पतियों तक को खा जाती हैं। यही नहीं तो आस-पास के तालाबों, कूए-बावड़ियों और पोखरों तक में अपनी करतूतों का कमाल दिखाती रहती हैं।

और तो और अब मछलियों ने दूसरे जलीय जीवों को भी जलेबियां दिखा-दिखा कर अपने वश में कर लिया है और उनके सहारे तालाब के समूचे वजूद तक को चुनौती देने लगी हैं। मछलियों ने अपनी ही तरह की मछलियों और माछलों को लेकर नदियों और समन्दर तक में अपनी आतंकवादी गंध को पहुँचा दिया है। सिर्फ मछलियां ही नहीं अब दरियाई घोड़ों, साँपों और घड़ियालों-मगरमच्छों तक को नए जमाने की हवा लग चुकी है।

तभी तो ये सारे के सारे उतर आए हैं अपनी पर। यों भले ही ये एक-दूसरे के धुर विरोधी और गलाकाट स्पर्धा से भरे क्यों न हों, मगर जब कुछ हथियाने और माल उड़ाने से लेकर जमा करते हुए अपना आधिपत्य जमाने की बात आती है तो सारे युगों पुराने वैर को भुलाकर गलबहियां करने लगते हैं और तालाब को अपनी मिश्रित जल क्रीड़ा का हिस्सा बनाकर संगठित होकर धींगामस्ती और धमाल मचाने में पीछे नहीं रहते।

अब अपना कहने को कुछ नहीं रहा, सब मानते हैं कि यह मेरा है। इसी मेरा-तेरा के चक्कर में सारे के सारे लगे हुए हैं। खूब सारे ऐसे हैं तो अपना तो अपना मानते ही हैं, औरों का जो कुछ है उसे दोनों ही साझेदारी का मानते हैं। इनसे भी बढ़कर एक अजीब और अनचाही प्रजाति ऐसी भी है जो औरों का सब कुछ भी अपना ही मानकर उधम मचाती रहती है।

छीना-झपटी और मुफ्तखोरी का धंधा सब तरफ परवान पर है। जब बिना कुछ किए, शातिराना अक्ल लगाकर ही सब कुछ हासिल होता रहे तो कौन होगा जो कुछ काम करना चाहेगा, मेहनत करने की इच्छा करेगा।

हर तरफ बिना पुरुषार्थ के बहुत कुछ, सब कुछ मुफ्त में पा जाने का उतावलापन इस कदर हावी है कि हर कहीं लगता है कि जैसे एक-दूसरे के हाथ और कब्जे से छीनने की कोई वैश्विक प्रतिस्पर्धा ही हो रही हो। जमाने का चलन भी कुछ इसी प्रकार के ढर्रे पर चल पड़ा है। न लहरों में तैरने का आनंद कोई चाहता है, न हवाओं का संगीत सुनने को जी मचलता है। न दुनिया को जानने और ज्ञान पाने का माद्दा दिखता है, न और कुछ।

सिक्कों की खनक, स्वर्णाभूषणों से लवरेज जिस्म, ताजातरीन बेशकीमती इलेक्ट्रॉनिक फैशनी उपकरण और बैंक लॉकरों के सिवा अब किसी को कुछ नहीं दिखाई देता। इस तृष्णा के मारे मृग मरीचिका में भटके और अटके हुए सारे के सारे स्वयंभू हो चले हैं। सब को लगता है कि वही राजा या राजकुमार, रानी, पटरानी या महारानी हैं। और उनके अलावा जो भी हैं वे सारे हमारे दास-दासी या अनुचर।

सामाजिक बदलाव के इस भयानक दौर में कोई ही कोना शायद ऐसा बचा होगा जिसमें मातृभूमि की सेवा का कोई प्रगाढ़ भाव निहित हो। अन्यथा सब तरफ अपने ही घर को मातृभूमि मानकर भरने का जो सिलसिला चल पड़ा है उसने हमें कहीं का नहीं रहने दिया है।

और तो और हम अब हमारे भी अपने नहीं रहे, पराये हो चले हैं। बहुत सारे हैं जिनकी आत्मा ही मर चुकी है। इनके लिए संसाधन, जमीन-जायदाद, तरह-तरह की सम्पदा और पात्रताहीन प्रतिष्ठा पाना ही जीवन का परम ध्येय होकर रह गया है।

कुछ लोग तो अपने पूर्वजों तक के नहीं रहे। इन्हें पूर्वजों से जुड़ाव और उनका नाम अपने साथ जोड़ने में भी एतराज है। पता नहीं पूर्वजों की प्रजाति, सरनेम और नाम क्या थे और इनके द्वारा अपनाए गए नाम। लगता है कि जैसे एक से दूसरे और दूसरे से तीसरे के पास गोद ही आ गए हों।

यही स्थिति उनके जीवन व्यवहार की है। जैसा देस वैसा भेष के आदी ये लोग हर उस रंग में रंग जाते हैं जो उनकी जिन्दगी में इन्द्रधनुष लाता हुआ दिखता है। इस मायने में इन्होंने बहुरूपियों, मसखरों और खलनायकों तक को काफी पीछे छोड़ दिया है।

इसमें सभी किस्मों के लोग शुमार हैं। व्यक्तिवादी और व्यक्तिपूजक दुमछल्ले भी हैं और राष्ट्र के नाम पर चिल्लपों मचाने वाले भी। परम वैभव की बातें सारे करते हैं लेकिन इकाई-इकाई को वैभवशाली बनाकर परम वैभव का स्वप्न संजोये हुए हैं। मातृभूमि की सेवा और इसके लिए सर्वस्व समर्पण जैसी बातें अब खोखली होने लगी हैं।

जो जैसा है, दिखता है वह वैसा है नहीं। उसका कर्म, व्यवहार और वाणी सब कुछ उलट-पुलट है। केवल दिखाने भर के लिए हम धर्म, सत्य और न्याय की बातें करते हैं, उन पर अमल करने का साहस कितनों में है, यह आज का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण यक्षप्रश्न बना हुआ है।

संस्कारहीनता और स्व के लिए सर्वस्व करने मात्र की संस्कृति ने सभी को जकड़ लिया है। सामाजिक लोक जीवन में भौतिक समृद्धि ही सर्वोपरि हो गई है, सर्वमान्य और लोक प्रतिष्ठ हो चुकी है। और सबसे बड़ा कारण यही है। इस वजह से ही लोग परंपरागत संस्कारों, सेवा और परोपकार के धर्म और पारम्परिक नैतिक मूल्यों की बलि चढ़ाते जा रहे हैं।

इन लोगों को वह कुछ भी नहीं करना पड़ता है, जो उन्हें उच्चता पर प्रतिष्ठित करे। जबकि हमारे पूर्वजों को अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा बनाने और बचाए रखने के लिए बरसों तक कठोर तप, त्याग और कठोरतम परिश्रम करना पड़ता था तब कहीं जाकर सामाजिक मान्यता प्राप्त हो पाती थी।

आज वह सब कुछ करने की जरूरत नहीं है। सिर्फ भौतिक समृद्धि पा लो, कुछ अनुचर पाल लो, पूंजीवाद का दामन थाम लो, बाकी सब कुछ अपने आप मिल जाएगा। अनुचरों की जमात भी मिल जाएगी और परिक्रमा कर जयगान करने वाले नर्तक भी भारी संख्या में तैयार हो जाएंगे।

इसी मानसिकता ने आज समाज-जीवन के विभिन्न क्षेत्रों को इतना अधिक प्रदूषित कर दिया है कि ईमानदार, कर्त्तव्यनिष्ठ और मेहनती लोगों के लिए अपने अस्तित्व और प्रतिष्ठा को बचाए रखने का संकट पैदा हो गया है।

तकरीबन हर बाड़े में मुर्दाल मनहूसों और शातिरों का साया पसरा हुआ है जो अपनी कालिख भरे आभामण्डल से पूरे के पूरे माहौल को इस कदर ढंके रहने में माहिर हैं कि हर तरफ लगता है कि जैसे ये ही कर्मयोगी हैं जिनके सहारे सब कुछ चल रहा है, दूसरे लोगों की तो केवल उपस्थिति मात्र है।

फिर अंधेरों से अंधेरों की कड़ी से कड़ी हर कहीं मिली होती है इसलिए अंधेरों की सियासत करने वाले लोग उल्लूओं और चमगादड़ों की तरह हर तरफ मकड़ीछाप डेरा डाले बैठे हैं। मजाल है कि रोशनी का कोई छोटा सा कतरा उनके बाड़ों और गलियारों में झाँक भी ले।

दुनिया में सभी अच्छे लोग किसी से दुःखी और आप्त हैं तो और किसी घटना-दुर्घटना या अभावों से नहीं, बल्कि उन मूर्ख और पराश्रित परजीवी लोगों से परेशान हैं जो अपने नम्बर बढ़ाने, अपनी चवन्नियाँ चलाने और खुद की वाहवाही कराते हुए अपने लाभों और स्वार्थों को पूरा करने के लिए मेहनतकश, पुरुषार्थी, निष्ठावान और ईमानदार लोगों को परेशान करने, असहयोग करने और नीचा दिखाने के लिए हर क्षण प्रयत्नशील रहते हैं।

आजकल हर तरफ मनहूस और शातिरों का बाहुल्य है। इन्हें कोई भी दिल से कभी पसंद नहीं करता किन्तु छोटे-छोटे स्वार्थ के चक्कर में लोग इनसे ऊपरी तौर पर नाता जोड़े रखते हैं और समझदार लोग दुर्जनों से दूर रहने की खातिर इनसे दूरी बनाए रखते हुए सामान्य से अधिक संपर्क रखने से हमेशा परहेज रखते हैं।

इस किस्म के मनहूस, शांतिर और विघ्नसंतोषी लोगों का मूलमंत्र यही होता है कि अपने उल्लू सीधे करने हों, उल्टे-सीधे काम करते रहना हो तो सज्जनों को किसी न किसी प्रकार उलझाये रखो और खुद मस्त रहो। ताकि शेष सारे लोग दूसरे कामों, विवादों और प्रत्युत्तर में उलझें रहें और ये लोग अपने घृणित, निन्दित और नापाक इरादों में बेरोकटोक जुटे रहकर सफलता पाते रहें, न कोई देखने वाला हो न कोई रोकने-टोकने वाला।

समाज की इस भयावह और विद्रुपताओं से भरी दुरावस्था में सभी ऐहतियातों से बढ़कर यही है कि ऐसे मनहूस और शातिर लोगों से सतर्क रहें, इनके झाँसे में न आएं और अपने काम करते चलें। स्वकर्म के प्रति निष्ठावान भी रहें और गीता के कर्मयोग को अपना कर अधर्मियों के संहार में भी पीछे नहीं रहें। हम सभी का आज का पहला फर्ज यही है कि दुष्टों को ठिकाने लगाएं और सज्जनों के हितों की रक्षा करें।

—000—

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
casinolevant giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti mobil giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
betgaranti güncel giriş
Kolaybet Giriş
bettilt giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
bettilt giriş
Betgaranti
betgaranti
betgaranti giriş
kolaybet
onwin
onwin
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
betkanyon
Betgaranti Giriş
holiganbet
holiganbet
sahabet
Kolaybet Giriş
Kolaybet Giriş
Kolaybet giriş
sahabet
sahabet
onwin
onwin
sahabet
sahabet
onwin giriş
onwin giriş
betgaranti giriş
holiganbet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
bettilt giriş
perabet giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
onwin giriş
sahabet giriş
bettilt giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt giriş
onwin giriş
sahabet giriş
betnano giriş
Kolaybet
kolaybet giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
bettilt giriş
kolaybet giriş