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भारतीय संस्कृति

स्वामीनारायण छपिया मंदिर परिसर के बाहर के प्रसादी स्थल

8.कल्याण सागर,नारेचा छपिया

कल्याण सागर तालाब छपिया मंदिर से एक किमी दूर नरेचा गांव के पश्चिम दिशा में स्थित है। यहाँ पर प्रसादी की छतरी स्थित है।

इस कल्याण सागर के जल में घन श्याम महराज के वचनामृत से मृत शरीर को तैरते छोड़ देने पर जीवन दान मिला था।

प्राचीन समय में राजा नरेचा के राजा सनमान सिंह के पुत्र की शादी थी।राज महल में आनन्द के गीत गाए जा रहे थे। सरोवर के किनारे राजा के आदमी आतिश बाजी और बंदूक की हर्ष फायरिंग कर रहे थे। इस माहौल को देख कर अगल बगल लोग भीड़ लगा कर आनन्द ले रहे थे। यहां पर उसी समय घनश्याम महराज अपने मित्रों के साथ आए हुए थे। एक सिपाही की बंदूक से गोली छूटते ही दो व्यक्ति की मृत्यु हो गई थी। यह समाचार जब राज महल में गया तो आनन्द की जगह पूरे राज महल में शोक छा गया।

  राजा को याद आया कि घन श्याम महराज को सभी लोग भगवान कहते हैं। मैं उनके पास जाकर बिनती करता हूं। वे महाराज जी के पास जाकर दोनों हाथ जोड़ कर बोले, “हे प्रभु! आप सर्व नियंता हैं। इन दोनों की मृत्यु के कारण शोक व्याप्त हो गया है। इन दोनों को जीवन दान दे दें तो अच्छा रहेगा।”

घनश्याम महराज बोले,” एकदम आदमी मृत्यु को नहीं प्राप्त होता है। आपके महल के आगे जो सरोवर है। उसमें दोनों मृतक शरीर को लिटा दें। पानी के स्पर्श से दोनों लोग जीवित हो जाएंगे।”

विश्वास रखकर राजा ने ऐसा ही किया। घनश्याम महाराज पत्थर पर खड़े होकर बोले, दोनों का नाम पुकारे। “हे गदाधर! हे

पृथ्वीपाल!आप लोग पानी में क्यों सो रहे हो? पानी से बाहर आओ।” इतना सुनते ही दोनों लोग आलस छोड़ कर उठ खड़े हो गए।

दोनों लोग घनश्याम महराज के पास आकर प्रार्थना करने लगे, “हे भगवान! हम लोग इस सरोवर के जल से आप के धाम को प्राप्त हो गए थे। इतने में आप आदेश दे दिए कि हम इस देह में ही वापस आ गए।”

यह सुनकर सनमान सिंह को यह विश्वास हो गया। बाद में राजा ने घनश्याम और उनके मित्रों को राज महल में स्वागत किया। उन्हें एक अच्छे आसन पर बैठाया गया था। राजा रानी ने मोती के थाल से, चन्दन पुष्प से पूजन किए थे। उन्हें दूध शक्कर और चीउरा इत्यादि खिलाए। घनश्याम महराज की विदाई करते समय रानी ने सुन्दर वचनों से प्रार्थना की, “हे प्रभु! आप काल के भी काल हैं। दीन दयाल हैं। आज आपने हमारी इज्ज़त रख ली। आप हमें परलोक में भी काल, कर्म और माया से रक्षा करना।”

 प्रभु ने इस प्रकार अपना आशीर्वाद भी दिया। “इस सरोवर ने दो मानव का कल्याण किया है। इस कारण से यह सरोवर कल्याण सरोवर के नाम से प्रसिद्ध होगा।”

9.हनुमान जी का मंदिर नरेचा छपिया

नरेचा गांव के कल्याण सागर नामक तालाब के सामने हनुमान जी का यह मन्दिर प्रतिष्ठित है। बालप्रभु के जन्म के छ्ठी के दिन कालीदत्त राक्षस ने बाल प्रभु को मां से छीन कर गायब कर दिया था तब हनुमान जी ने प्रभु की रक्षा की थी।

आषाढ़ संवत 1837 चैत सुदी चौदस दिनांक 8 अप्रैल 1781को छठी के अवसर पर धर्म भक्ति भवन छपिया में बाल प्रभु घनश्याम को गायब करने की घटना घटी हुई थी।

माता भक्ति बालक के जन्म के छठे दिन अपने कर्तव्यों में इतनी व्यस्त थीं कि वे अपने बच्चे को खुद के गोद में नहीं ले सकीं थीं । यद्यपि वह उनके लिए उनकी आत्मा से भी अधिक प्रिय था। उन्होंने अन्य छोटे बच्चों को अपने बच्चे की देखभाल करने के लिए दिया था तथा अतिथि महिलाओं की यथायोग्य सेवा में लग गई थी ।

 इस शुभ घड़ी में भीड़- भाड़ को देख कर कालीदत्त राक्षस ने अपने मंत्र से अभिमंत्रित पुतरियों को उत्पन्न किया था जो बालक को उठा कर आकाश मार्ग से चलने लगी थी। मां भक्ति देवी ने क्रंदन किया तो परिवार के सब लोग जग गए। बाल प्रभु ने अपना भार बढ़ा दिया तो पुतरियों ने बालक को जमीन पर रख वहां से भागने लगीं । 

उसी समय प्रभु की इच्छा से हनुमान जी ने पुतरियों को ताड़ित करना शुरू कर दिया था। वे प्रभु की शक्ति समझ हनुमान जी से प्राण दान मांगी। कालीदत्त को उन

पुतरियो ने बहुत फटकारा। जो अपनी जान बचाकर जंगल में छिप गया था। हनुमान जी ने बाल प्रभु को उठाकर मां की गोद में सुरक्षित लौटा दिया था।

तभी से यह मंदिर यहा प्रतिष्ठित किया गया है। श्री घनश्याम जी महराज के माता भक्तिमाता पिता धर्मदेव हमेशा हनुमान जी पूजा किया करते थे।

10.खापा तलावड़ी (पेड़ के ठूठ से जख्म) तेंदुवा रानीपुर, छपिया

खम्पा तलवाडी एक तालाब /पोखर है जहाँ घनश्याम (स्वामीनारायण) स्नान करते थे और पास की कुटिया में एक संत से रामायण की कहानियाँ सुनते थे। पोखर के पास एक इमली का पेड़ हुआ करता था। इसी पर चढ़ कर एक बार खेलते समय वे घायल हो गए थे, जिससे उनके शरीर पर निशान पड़ गया था।

यह छपैया के उतर की ओर तरगांव के नैरित्य कोण पर स्थित है।इस तालाब के तट हरिदास जी की परम कुटी में राम कथा होती थी। धनश्याम और उनके मित्र वहां जाकर कथा सुनते तालाब में स्नान करते और तरह – तरह की लीला करते रहते थे। वे गोपालों को बाल कृष्ण जैसे दर्शन और लीला दिखाते थे।

इस छोटी झील है जिसे अब खापा तलावड़ी (झील) के नाम से जाना जाता है। यह पूरे साल पानी से भरी रहती है। झील के आस-पास के क्षेत्र में कई पेड़- पौधे और खूबसूरत फूल हैं और यहाँ हमेशा ताजे फूलों की खुशबू आती रहती है। इस वजह से यह सभी स्थानीय बच्चों के खेलने-कूदने की पसंदीदा जगह बन गई है।

 झील के किनारे एक छोटी सी झोपड़ी थी, जिसमें हरिदासजी नाम के एक बाबा रहते थे। उनके रामायण के पाठ इलाके में बहुत मशहूर थे और अक्सर कई लोग उनके पाठ के लिए इकट्ठा होते थे।

 एक दिन घनश्याम और उसके दोस्त वेणीराम, प्रागजी, सुखनंदन और दूसरे लोग यहां खेलने और मौज-मस्ती करने आए। घनश्याम ने बाबा जी को कथा करते देखा और अपने दोस्तों को पहले कथा सुनने के लिए राजी किया। सभी बच्चों की तरह उन्होंने कुछ देर तक कथा सुनी और फिर झील में तैरने के लिए उठ गए। तैरते समय उन्हें फूलों की मीठी सुगंध आई और उन्होंने पूछा कि यह सुगंध कहां से आ रही है। सुखनंदन ने कहा कि यह चमेली के फूल की सुगंध है, इसलिए कुछ फूल तोड़कर बच्चों ने एक माला बनाई और उसे घनश्याम के सिर पर रख दिया।

साधु बाबा इस दर्शन को पाकर अपने को धन्य माना। संयोग से उसी  समय, गायों का एक झुंड, जो वहां से गुजर रहा था। घन श्याम प्रभु ने उसे बुलाया तो गाय का झुंड वहां रुक गया और घनश्याम के दर्शन के लिए उनके चारों ओर इकट्ठा हो गया। ग्वाले ने गायों को आगे बढ़ाने की कोशिश की लेकिन वे घनश्याम के पास से हिली नहीं। 

घनश्याम ने कुछ देर तक झुंड को धीरे से सहलाया और इमली के पेड़ पर चढ़ कर लम्बा हाथ करके दूसरी ध्वनि निकाल कर गायों से  कहा, "अब तुम जा सकते हो"। गायों ने उसकी आज्ञा का पालन किया और ग्वाले के साथ चली गईं।

बच्चों ने फिर से अपना खेल जारी रखा और घनश्याम आषाढी सम्वत 1845 के दिन जामुन के वृक्ष पर चढ़ गए थे। (कहीं कहीं इमली के पेड़ पर चढ़ने का उल्लेख आता है।) वह कुछ देर तक वहाँ खेलता रहा। जब घनश्याम पेड़ से उतर रहा था, तो उसका पैर फिसला ।

गिरते समय पेड़ से एक ठूठ उसकी दाहिनी जाँघ में लगा और वह धड़ाम से ज़मीन पर गिरा। जांघ से खून की धारा निकल पड़ी ,जो रुकने का नाम नहीं ले रही थी।

दूसरे बच्चों ने देखा कि घाव से खून बह रहा है और वे बहुत डर गए, इसलिए उनमें से एक भागकर घर गया और घनश्याम के पिता धर्मदेव को बुलाया। 

जब वह गया हुआ था, तो अचानक एक तेज़ रोशनी चमकी और भगवान के वैद्य अश्विनीकुमार घाव का इलाज करने के लिए देवलोक से नीचे आए। उन्होंने घाव पर दिव्य औषधि लगाई और उस पर एक सूती पट्टी बाँधी। सूती कपड़ा वेणीराम ने दिया था, क्योंकि देवलोक में केवल रेशम ही होता है।

धर्मदेव और रामप्रताप जल्दी से देखने आए कि क्या हुआ था और धर्मदेव ने पूछा कि दवा किसने लगाई और पट्टी किसने बाँधी। 

घनश्याम ने जवाब दिया कि कुछ लोगों ने घाव का इलाज किया था और धर्मदेव से कहा कि वह शोर न मचाए, क्योंकि वह ठीक है। 

धर्मदेव और रामप्रताप फिर घनश्याम को घर ले गए, घनश्याम ने जोर देकर कहा कि वह पैदल घर जा सकता है।

घर पर भक्तिमाता और सुवाशिनी भाभी चिंतित थीं और घनश्याम के आने का इंतज़ार कर रही थीं। जब वे पहुँचे तो भक्तिमाता ने घनश्याम को गले लगाया और पूछा कि क्या हुआ है।

घनश्याम ने कहा, “दुखी मत हो क्योंकि मुझे कोई चोट नहीं लगी है”। उसने पट्टी हटाई और भक्तिमाता ने देखा कि उसकी जांघ पर सिर्फ़ एक छोटा सा निशान था – घाव ठीक हो गया था। यह अश्विनीकुमार द्वारा लगाई गई दिव्य औषधि के कारण था। भक्तिमाता और सुवाशिनी भाभी अब खुश थीं।

खपड़े यानी खापो वाली इस घटना के बाद से ही इस झील को खापा तलावड़ी के नाम से जाना जाता है।

 आज यहां कोई झोपड़ी नहीं है, कोई बाबा नहीं है और न ही जामुन/इमली का पेड़ है, लेकिन इस घटना की याद दिलाने के लिए एक छोटी सी छतरी' जरूर है।

इस दिव्य चरित की विशेष महिमा है। इस चरित्र का वर्णन खुद प्रभु ने अपने 37वें वचनामृत में किया है।

11.श्रवण पाकड़ तलावड़ी(तालाब )

अयोध्या से करीब 35 किमी. की दूरी पर, श्रवणपाकर एक पौराणिक ऐतिहासिक स्थल है। यहां त्रेता युग में राजा दशहरा के दिन बाण से घायल होकर श्रवण कुमार ने अपना प्राण त्याग दिया था। पौराणिक मान्यता के अनुसार त्रेता युग में भ्रमण के दौरान श्रवण कुमार इसी स्थान पर माता पिता के साथ विश्राम के लिए रुके थे। श्रवण कुमार ने यहां पाकड़ की दातुन करके फेंक दिया था। बाद में यहां पाकड़ का एक विशाल पेड़ तैयार हो गया।

  कथाओं के अनुसार इस जगह पर वह माता-पिता को बैठा कर उनकी प्यास बुझाने के लिए पानी लेने निकले थे।जहां सरोवर पर उन्हें अयोध्या के राजा दशरथ का शब्दभेदी बाण लगा था। तभी से इस क्षेत्र का नाम श्रवण पाकड़ हो गया। यहां पर प्रति वर्ष माघ महीने में विशाल मेला लगता है। 

  श्रवण तलावड़ी नामक इस तालाब में साल में एक बार मेला लगा था। इस मेले में तालाब में स्नान करना महत्वपूर्ण माना जाता था। इसलिए धर्मदेव और अन्य लोग मेले में आए। युवा घनश्याम भी उनके साथ गया।

  एक भिक्षुक (तपस्वी) संत उस तालाब के किनारे विशिष्ट मुद्रा में बैठे थे। उनके साथ कुछ अंधे व्यक्ति बैठे थे और उनसे विनती कर रहे थे: "हे भिक्षुक, हमें दृष्टि दीजिए।"  भिक्षुक ने कहा, "मुझे पैसे दीजिए और मैं अपने मुंह से एक फूंक मारकर आपको दृष्टि दूंगा।"

“हे भले आदमी, हम आपको पैसे कैसे दे सकते हैं? हमारे पास पैसे नहीं हैं। हम भीख मांगकर अपना गुजारा करते हैं। फिर भी हमें एक दिन में एक बार खाना मिलता है और चार बार भूखे मरते हैं। हम पैसे कहां से लाएँ?” भिक्षुक ने कहा, “तो फिर चले जाओ।”

घनश्याम ने यह देखा। उसे यह बहुत बुरा लगा। उसने उन अंधों को रोका जो निराश होकर जा रहे थे। उसने उनसे कहा: “हे भक्तों, निराश मत हो। भगवान दयालु हैं।”

अंधे ने कहा, “जब आप ऐसा कहते हैं, तो हमें लगता है कि भगवान सचमुच दयालु हैं। हम उनकी एक झलक पाने के लिए प्रतीक्षा कर रहे हैं।”

घनश्याम ने उनकी आँखों को अपने कोमल हाथ से सहलाया और कहा: “क्या आप कुछ देख सकते हैं?”

अंधे ने खुशी से चिल्लाया, “हाँ, हम देख सकते हैं, हाँ, हम इसे टिमटिमाते हुए देखते हैं। हम युवा कन्हैया को देखते हैं। वह अपने पैरों को मोड़कर खड़ा है, और वह बांसुरी बजा रहा है। ओह, क्या अद्भुत बांसुरी बजा रहा है!” “आज से आप हमेशा कन्हैया को देख सकेंगे और उसकी बांसुरी सुन सकेंगे। मुझे बताओ, क्या आप कुछ और देखना चाहते हैं?” घनश्याम ने कहा। “नहीं,” अंधे ने कहा, “सब कुछ इसी में है।” भगवान में दृढ़ विश्वास (भरोसा) सभी परेशानियों का इलाज है।

गुजरात, महाराष्ट्र सहित अन्य प्रांतों से आने वाले स्वामीनारायण संप्रदाय के हरिभक्त छपिया मंदिर में दर्शन करने के बाद यहां आकर दर्शन करते हैं।

हर साल अयोध्या में माघ मास में आयोजित मेले में हजारों की संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं और यही लोग अयोध्या से श्रवणपाकर में भी आयोजित मेले में दर्शन के लिए आते हैं।

स्वामीनारायण ट्रस्ट द्वारा जीर्णोद्धार

इस स्थान पर स्थित श्रवण मंदिर एवम पोखरे का जीर्णोद्धार स्वामी नारायण ट्रस्ट के द्वारा स्थापित किया गया है। इस पवित्र स्थली पर दूर-दराज से लोग अंत्येष्टि क्रिया के दर्शन करने आते हैं। उतर प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा पर्यटन संवर्धन योजना के तहत मंदिर व पोखरे के जीर्णोद्धार के लिए 50 लाख रुपये की स्वीकृति प्रदान करते हुए करीब 23 लाख रुपये का बजट जारी कर दिया है।

  1. राम सागर ,नरेचा भेटिया ,छपिया

यह स्थान छपिया से भेटियां गांव की झाड़ियों में है। इस गांव में छोटे मंदिर में छोटे हनुमान जी की मूर्ति है। यहां पर घन श्याम ने अपने पैर के अंगूठे से दबाया तो पानी पाताल में चला गया था।

  एक समय की बात है वर्षा ऋतु में घनश्याम के मामा मोती ने इस तालाब में धान की लगाई थी। कुछ दिन बाद अधिक वर्षा से धान डूब गया। उनके मामा चिंतित रहने लगे। एक बार कोई जरूरी काम होने के कारण धर्म देव मोती मामा और घनश्याम महाराज उस तालाब के पास से जा रहे थे। धर्म देव ने रोपी हुई धान के बारे में पूछा तो मामा बोले कि यह फसल बरबाद होकर सड़ जाएगा। वे उदास हो गए। घन श्याम महराज ने पुछा मामा कितना धान पैदा होगा?

 मामा ने उत्तर दिया अब कुछ भी नहीं पैदा होगा। जो कुछ भी होगा वह अब सब तुम्हारा है।

घनश्याम महराज जहां धान लगाया गया था वहां जाकर अपने दाहिने पैर के अंगूठे से धक्का दिए। धारती मां में तीव्र आवाज आई। जमीन में दरार पड़ गई। चारो तरफ के गांव वाले आ गए। वह ऊपर का सारा पानी दरार के रास्ते अन्दर चला गया। धान बाहर दिखाई देने लगा। 

एसा होने से तालाब के जीव जन्तु तथा मछ्ली विना पानी के परेशान हो गए। यह देखकर घनश्याम प्रभु को दया आ गई और उन्होने उन जीवों की मुक्ति का संकल्प लिया।

इंद्र देवता ने उन जीवों को लेने के लिए कई विमान भेज दिए। सभी जीव जो मर गए थे । घनश्याम महाराज की स्तुति करते हुए स्वर्ग को चले गए। सभी लोग घन श्याम भगवान को श्री रामचन्द्र भगवान समझ कर हाथ जोड़कर प्रणाम करने लगे।

इस घटना के बाद इस तालाब को राम सागर या धर्म तालाब के नाम से जाना जाता है। यहां पर छतरी भी बनी हुई है।

वर्ष 2019 में केन्द्र सरकार द्वारा हृदय- अमृत योजना की राशि से लाखों खर्च कर इस सरोवर का जीर्णोद्धार व जल भंडारण के लिए सौर ऊर्जा से चालित तीन बोिरंग कराया गया था।

तालाब के चारों ओर पाइप बिछा यहां लगाए गए पेड़-पौधों के लिए पटवन की भी सुविधा मुहैया करायी गई थी। जो देखरेख के अभाव में तालाब में लगाए गए सारे बोरिंग, मोटर पंप और फैंसी लाइट पुरी तरह से बंद हो गए है।

  रामसागर तालाब के चारों ओर लगे फैंसी लाइटों के मरम्मत करने व बंद पड़ी लाइटों को शुरू कराया जाना चाहिए। यह तालाब नगर वासियों के साथ-साथ देश के विभिन्न प्रांतों से श्राद्ध कर्मकांड के लिए आने वाले तीर्थयात्रियों को भी शुद्ध आवोहवा का एक प्रमुख केन्द्र बन गया है। तालाब को हरित पटरी पर लाने के लिए हर संभव प्रयास किया गया है।
  1. लोह गंजारी जंगलेश्वर महादेव मंदिर

लोह गंजारी गांव में जंगलेश्वर महादेव जी का मंदिर है। यहां पर धर्मदेव के मित्र संध्यागिरि साधु रहते थे। घनश्याम महराज को लेकर धर्मदेव पिता अक्सर यहां आया करते थे। यहां पर घनश्याम महराज कई आश्चर्य चकित करने वाले कृत्य किए हैं

धर्मदेव के मित्र संध्यागिरि साधु प्रतिदिन

जंगलेश्वर महादेव जी के मंदिर की सेवा पूजा किया करते थे।

 मंदिर के चारो तरफ बड़ा बगीचा था। उसमे बड़े बड़े नाग निवास करते थे। इस कारण से कई बार शंकर जी की पूजा में दिक्कतें आ जाती थी। 

साधु ने एक बार घनश्याम महराज से प्रार्थना किया कि हे भगवान! हमारा ये कष्ट दूर करें।

घनश्याम महराज हंसते हंसते हुए गरुण महाराज को याद किया।तुरन्त गरुण जी महाराज नमस्कार मुद्रा में सामने उपस्थित हो गए। गरुण जी को देखते ही सारे नाग पाताल लोक में चले गए। यह स्थान एकदम निर्भय बन गया।

 एक बार लखनऊ के नबाब ने लोह गंजरी गांव पर सैनिक भेजे थे। तब साधु की प्रार्थना पर घन श्याम महराज ने अपना प्रताप दिखाया था कि गांव के अन्दर से अरबी सेना बाहर आ रही है। नबाब के सैनिक को पता चला। इस कारण हथियार गोले बारूद छोड़ कर भाग गए ।

मंदिर  के पिछले भाग में साधु ने कुम्हड़ा लगाया था। कुम्हड़े बहुत बड़े बड़े थे। बड़ा भाई अकेले उसे उठा नहीं सकते थे। छपिया के घन श्याम महराज ने उसे एक हाथ से ही उठा दिया था। यहां पर कई आश्चर्य जनक कार्य घन श्याम महराज ने किया है। यह एक प्रसादी का स्थल है। यहां भी एक छतरी बनी रहती है।
  1. महादेव शिव मंदिर पतिजिया बुजुर्ग दरियापुर छपिया

छपिया रेलवे स्टेशन से पूरब पतिजिया गांव स्थित है। यहां शंकर जी अति प्रसादी वाला मंदिर है। यहां धर्म पिता सपरिवार घनश्याम महाराज के साथ आते थे। उसी समय एक बार मंदिर के शिव लिंग से भोले नाथ प्रकट होकर घनश्याम महाराज

से मिले और दोनों भगवान एक दूसरे को भेंटे भी थे।

यहां शिवरात्रि का बड़ा मेला लगता है।

एक बार धर्म पिता सपरिवार घनश्याम महाराज के साथ यहां आये थे। उसी समय शंकर और पार्वती जी भी आपस में विचार करते हैं। हम लोगों के दर्शन हेतु साक्षात भगवान आए हैं। इसलिए हम लोग भी सामने से उनसे जाकर मिलते हैं। यह विचार कर वे महाराज जी सामने आए। अंतर्यामी महाप्रभु भोले नाथ को पहचान गए। दोनों भगवान घन श्याम और भोले नाथ एक दूसरे से गले मिले।

भोले नाथ बोलने लगे, “ आप हमारे दर्शन के लिए आए थे। आपका प्रेम देखकर हम भी आपके दर्शन करने के लिए आ गए।

घनश्याम महाराज धर्म कुल तथा श्री शंकर पार्वती जी सभी लोग चलते हुए पतीलिया तक आ गए।पतीलिया में शंकर पार्वती जी दोनों अदृश्य हो गए।

इसके बाद धर्म भक्ति और रिश्तेदार तथा घनश्याम के मित्र सभी ने मंदिर में जाकर दर्शन किए। मेला देख कर सब लोग छपिया वापस आ गए। इस महत्त्व वाला यह प्रसादी स्थल है। यहां दोनों के मिलन के प्रतीक चिन्ह के रुप में एक छतरी का निर्माण किया गया है। इसे ही प्रसादी स्थल कहा जाता है। इस शिव मंदिर को स्थानीय जनता बाबा पाटेश्वर नाथ के नाम से भी जनता है।
  1. गौ घाट,गौरा चौकी मार्ग, छपिया

गौ घाट भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के गोंडा जिले के छपिया ब्लॉक में एक गांव है। यह विश्वामित्री नदी के तट पर स्थित है। नदी के तट पर सीढ़िया बनी हुई है।

यह जंगल का क्षेत्र है। नदी में जल ना होने से घन श्याम महराज ने अपने पैर के अंगूठे से दबाया तो अखण्ड जल की धारा निकल पड़ी थी। यह जिला मुख्यालय गोंडा से 54 किमी पूर्व में स्थित है। छपिया से 5 किमी दूर स्थित है । राज्य की राजधानी लखनऊ से 170 किमी दूर स्थित है ।

एक बार यहां सुखा पड़ा था। गाएं पानी के अभाव में मर रही थी। घनश्याम प्रभु ने अपने पैर के अंगूठे को यहां दबाया तो जल की स्रोत निकल पड़ी। गायों ने अपनी प्यास बुझाई थी। इसलिए इसे गौ घाट नाम मिला है। तबसे यह घाट कभी नहीं सूखता है।

गौरी गाय की दास्तान

एक बार गौरी गाय शाम को घर नहीं आई। उसकी खोज बीन शुरू हुई। राम प्रताप भाई और मंगल अहीर इसे खोजने के लिए निकल पड़े। इन्हें गाय नहीं मिली।

 इस बार धर्मपिता राम प्रताप भाई और घनश्याम महाराज के साथ गाय खोजने निकले। फिरोज पुर होकर नरेचा गांव वहां से लोह मंजरी गए। वहां भी गाय नहीं मिली। इसके बाद वे लोग गौ घाट पर आए। 

वहां पर एक अहीर के द्वारा ज्ञात हुआ कि नदी के उस किनारे पर गाय ने बछड़े को जन्म दिया है। यह जान कर धर्म पिता और दोनों भाई उसे लेने के लिए पहुंचे। घनघोर रात का समय था नदी में थोड़ा ही जल था। प्रभु ने कहा , पिता जी और भाई आप गाय और बछड़े को लेकर हमारे पीछे पीछे आइए। इतने में सिंह की आवाज सुनाई दी। धर्म पिता सोचने लगे यह सिंह हम तीनो के साथ गाय और बछड़े को मार देगा।

 पिता जी को उदास देखकर घनश्याम महराज सिंह के सामने अमी दृष्टि से देखे। सिंह को पूर्व जन्म का ज्ञान आ गया ।

घनश्याम महराज साक्षात भगवान हैं। सिंह पांच प्रदक्षिणा करके हाथ जोड़ कर चला गया। एसा चमत्कार घनश्याम महाराज ने गौ घाट तीर्थ में दिखाया था।

जहां घनश्याम महराज ने पैर के अंगूठे से जमीन को दबाया था। वहां आज भी पानी बहता रहता है। यह स्थान सीढ़ी से उतरते ही दिखाई देता है। इस प्रकार का यह प्रसादी स्थल है।

  1. मखौड़ा: राम और घनश्याम दोनों से जुडा आख्यान

मनोरमा नदी का प्राकट्य

राजा दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ से पहले मखौड़ा में कोई नदी नहीं थी। शृंगी ऋषि ने सरस्वती का आह्वान मनोरामा के नाम से किया था। नचिकेता पुराण में कहा गया है कि,

‘अन्य क्षेत्रे कृतं पापं, काशी क्षेत्रे विनश्यति।

काशी क्षेत्रे कृतं पापं, प्रयाग क्षेत्रे विनश्यति।

प्रयाग क्षेत्रे कृतं पापं, मनोरमा विनश्यति।

मनोरमा कृतं पापं, ब्रजलेपो भविष्यति।।’

अर्थात, किसी भी क्षेत्र में किया गया पाप काशी स्नान से नष्ट हो जाता है। काशी में किया पाप प्रयागराज में गंगा स्नान से नष्ट हो जाता है। प्रयाग में किया पाप मनोरामा में स्नान से नष्ट हो जाता है । मनोरमा में किया पाप बज्र के समान घातक होता है। पुराणों में इस नदी को सरस्वती कीसातवीं धारा भी कहा गया है।

राम जन्म का आधार

मखौडा धाम बस्ती जिले में हर्रैया तहसील के सबसे प्राचीन स्थानों में से एक है जहां राजा दशरथ ने महर्षि वशिष्ठ की सलाह पर ऋषिश्रिंग की मदद से पुत्रकामेक्षी यज्ञ किया था। यज्ञकुंड से बाहर खीर का वर्तन निकला और ऋषिश्रिंग ने दशरथ को खीर का बर्तन दिया, जिससे वह उसे अपनी रानियों के बीच वितरित करने की सलाह दी। कौशल्या ने आधा खीर खा लिया, सुमित्रा ने इसका एक चौथाई खा लिया। कैकेयी ने कुछ खीर खा लिया और शेष को सुमित्रा को वापस भेज दिया जिसने खीर को दूसरी बार खाया। इस प्रकार खीर की खपत के बाद राजकुमारों की कल्पना की गई। चूंकि कौशल्या ने राम को जन्म देने वाले सबसे बड़े हिस्से का उपभोग किया था। कैकेयी ने भरत को जन्म दिया। सुमित्रा ने लक्ष्मण और शत्रुघ्न को जन्म दिया।उसके बाद से प्रतिवर्ष वैशाख महीने में अक्षय तृतीया से जानकी नवमी तक पुत्रेष्टि यज्ञ की परंपरा आज भी जारी है। यहां दशरथ महल तथा हनुमान गढ़ी अयोध्या के दिव्य मंदिर है। जहां भारी संख्या में सन्त महात्मा रहते हैं और भारी संख्या में श्रद्धालु दर्शन करने आते रहते हैं।

    यहां राम सीता लक्ष्मण हनुमान तथा शिव परिवार की सुन्दर मूर्तियां अनायास मन को मोह लेती है।

इस मखौड़ा तीर्थ में जब से राजा दशरथ ने पुत्रेष्टि यज्ञ किया था तब से आज तक चैत मास की पूर्णिमा का मेला लगता है। इसमें हजारों लाखों श्रद्धालु आते हैं। इस दिन यहां लिट्टी चोखा खाने का महत्त्व है।

 धर्म पिता यहां सबको खाना खिलाए थे। इस मेले में पृथ्वी का भार स्वरुप कुछ आसुरी शक्तियां भी आती हैं और पहले स्नान करने के होड़ में आपस में लड़ कर अपना अस्तित्व समाप्त तक कर देते हैं।

सिद्ध क्षेत्र मखौड़ा घनश्याम से अछूता नहीं

राम नवमी के दिन अवतारित और कृष्ण लीला को अपना अभीष्ट मानने वाले बाल प्रभु घनश्याम महाराजा मखौड़ा की महिमा से अछूते नहीं थे। विश्व स्तरीय संस्कृति और पावन तीर्थ के प्रेरणा स्त्रोत इस स्थल पर घन श्याम अपने माता पिता और परिवार के साथ अनेक बार पदार्पण कर अपनी लीला दिखाए हैं।आज भी स्वामी नारायण पंथ के अनुयाई भारी संख्या में इस प्रसादी स्थल का दर्शन करने आते रहते हैं। यह स्थान घनश्याम महाराज

की जन्म भूमि छपिया से कुछ ही किमी की दूरी पर ही स्थित है।

एक बार नदी के किनारे दबी हुई सोने की तोप मिली थी। अयोध्या के तत्कालीन राजा दर्शन सिंह ने इस तोप को अयोध्या नगरी में लाने का आदेश दिए थे। उन्होने यह भी आदेश दिया था कि तोप ना लाने पर मृत्यु दंड दिया गया जायेगा। सिपाही लोग बहुत प्रयत्न किए कि तोप उठ जाए। वे लोग अपने साथ बड़ी लोहे की गाड़ी और दस जोड़ी बैल भी लेकर आए थे। पचास व्यक्ति उसे उठाने का उद्यम कर रहे थे। 

 इसे देखकर घनश्याम ने अपने भाई से पूछा,”भाई साहब ये लोग मिल कर क्या काम कर रहे हैं?”बड़े भाई ने सिपाहियों से पूछा। सिपाहियों ने उत्तर दिया,”हमे अयोध्या के राजा ने तोप लाने के लिए भेजा है। तोप ले जानें पर एक क्या दण्ड मिलेगा यह भी सिपाहियों ने बताया।

इस बात को सुन कर घनश्याम महाराज को दया और आ गई।घनश्याम महाराज ने सिप

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