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आज का चिंतन

महिषासुर का रानी दुर्गा द्वारा वध करना* भाग 2

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Dr D K Garg

अन्य कथानक – महिषासुर का रानी दुर्गा द्वारा वध करना

महिषासुर को कुछ झारखंड, पश्चिम बंगाल, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के कुछ आदिवासी इलाकों में पूजा जाता है, इनका कहना है कि देवी दुर्गा ने छल से उसका वध किया था।ये जनजाति महिषासुर को अपना पूर्वज मानती है।इसलिए इस विषय पर पड़ताल जरूरी है।

पड़ताल– महिषासुर के विषय में इतिहास में कोई ज्यादा जानकारी नहीं मिलती है।सिर्फ किवदंती है कि महिषासुर रम्भासुर का पुत्र था। महिषासुर एक राजा था, जिसकी राजधानी वर्तमान का महोबा थी।महिषासुर असीमित शक्तिशाली था,और उसका रंग सांवला था,ज्यादा बुद्धिमान नही था फिर भी उत्तरी आर्यावर्त में महिषासुर की ख्याति थी। इसलिए उसको उपनाम महिषासुर से जाना जाता था।

इस महिशासुर का आतंक बहुत ज्यादा था ।उसी दौर में उत्तरी आर्यावर्त के एक हिस्से में एक रानी दुर्गा आर्य ने शासन संभाला, जो आर्य राजा महिषासुर से हार चुके थे, सबने मिलकर उस रानी से महिषासुर के खिलाफ युद्ध लड़ने की प्रार्थना की। अंततः इसको मारने का कार्य रानी दुर्गा आर्य ने अपने हाथ में लिया। महिषासुर को लगता था कि वो एक रानी से नहीं हार सकता। फिर भी उसने रानी के पास बातचीत के लिए अपने दूत भेजे। रानी ने दूत को बिना बातचीत के वापिस लौटा दिया। लेकिन महिषासुर बार-बार बातचीत का न्यौता देने के लिए अपने दूत भेजता रहा।
रानी ने युद्ध के लिए विभिन्न अस्त्र-शस्त्रों से लैस शक्तिशाली सेना बनाई। परंतु महिषासुर को जब बल से जीता नहीं जा सका तो दुर्गा ने उसके साथ संधि का हाथ बढ़ाया और उसके महल में उसके साथ अतिथि के रूप में काफी दिन तक रही। इसी बीच रानी ने रणनीति तैयार कर ली और एक दिन रानी की विशालकाय सेना के साथ महिषासुर पर आक्रमण कर दिया। महिषासुर के पास भी शक्तिशाली सेना थी। महिषासुर को लग रहा था कि वो जीत जाएगा। देवी दुर्गा ने उससे नौ दिनों तक युद्ध किया ।
इसी दौरान जब रानी को अपने सूत्रों से मालूम हुआ कि महिषासुर शराब के नशे में बेहोश है तो मौका पाकर धोखे से रानी ने महिषासुर के सीने को अपने त्रिशूल से छलनी कर दिया और बची कुछ कसर रानी के पालतू शेर ने पूरी कर दी। रानी के पालतू शेर ने महिषासुर को खत्म कर दिया।
महिषासुर को अपना पूर्वज मानने वाले आदिवासी भी उसकी यही कहानी बताते हैं ।
उपरोक्त घटना सत्य प्रतीत होती है क्योंकि इसमें ईश्वरीय नियम के विरुद्ध कुछ नही है ,मनुष्य की रणनीति,शक्ति और अहंकार के दामन का वर्णन है।

कुछ विशेष तथ्य जिन पर ध्यान देना चाहिए:

1महिषासुर को शुद्र और दलित बताया जाता है जो कि गलत है क्योंकि पहले जाति प्रथा नहीं थी, दलित शब्द भी नहीं था। वर्ण के अनुसार देखे तो वह एक राजा था इसलिए शुद्र भी नही था और धर्म कर्म के अनुसार आंकलन करे तो वह अनार्य था, दस्यु था जिसका प्रजा पर आतंक था। इसने अपनी शक्ति का दुरूपयोग किया और निर्बल लोगों को सताना शुरु कर दिया जिससे जनता त्रस्त होने लगी।

2.दलित कहते है ऐसे व्यक्ति को जो बिलकुल असहाय हो और कुछ भी कार्य करने में सक्षम ना हो जैसे लकवा ग्रस्त व्यक्ति,हाथ पैर से अपंग, दिमाक से अपंग, कोढी , छूत का मरीज आदि ,इसलिए महिषासुर को दलित नही कहना चाहिए।
3. महिषासुर का दमन करने वाली दुर्गा आर्य थी जो एक शक्तिशाली महिला थी,जिसकी बहादुरी के कहानी किस्से पौराणिक चर्चित रहे लेकिन धीरे-धीरे इसको गलत ढंग से दुर्गा की मूर्ति का रूप देकर पूजा जाने लगा परन्तु ये केवल एक आदर्शवादी और साहसी महिला थी, ये उसी तरह से है जैसे झाँसी में झाँसी रानी का मंदिर है और उसको पूजा जाता है।

इस कथानक मे कुछ विशेष शब्द प्रयोग हुए हैं जिनका अर्थ जान लेना जरुरी है –
1.दस्यु 2.असुर

अनार्य अथवा दस्यु के लिए ‘अयज्व’ विशेषण वेदों में (ऋग्वेद १।३३।४) आया है अर्थात् जो शुभ कर्मों और संकल्पों से रहित हो तो ऐसा व्यक्ति पाप कर्म करने वाला अपराधी ही होता है। अतः राजा को प्रजा की रक्षा के लिए ऐसे लोगों का वध करने के लिए कहा गया है। सायण ने इसमें दस्यु का अर्थ चोर किया है। दस्यु का मूल ‘दस‘ धातु है जिसका अर्थ होता है ‘उपक्क्षया‘ अर्थात् जो नाश करे।
यानी जो धर्म के दसों लक्षणों से विहीन हो ।
अतः दस्यु कोई अलग जाति अथवा समूह नहीं है, बल्कि दस्यु का अर्थ विनाशकारी और अपराधी प्रवृत्ति के लोगों से है। इससे सिद्ध होता हैं कि दस्यु गुणों से रहित मनुष्य के लिए प्रयोग किया गया संबोधन हैं ना कि जातिसूचक शब्द हैं।

सुर और असुर में क्या भेद हैं ? यजुर्वेद ४०ध्३ में देव (सुर) और असुर को विद्वान और मूर्ख के रूप में बताया गया हैं और इन दोनों के परस्पर विरोध को देवासुर संग्राम कहते हैं। यहाँ पर भी सुर और असुर में भेद गुणात्मक हैं न कि जातिसूचक हैं।
सारांश : दुर्गा द्वारा महिषासुर का अंत लोक में पौराणिक अच्छाई की बुराई पर जीत का प्रतीकात्मक वर्णन है।

इसे आर्य बनाम अनार्य, ब्राह्मण बनाम शूद्र की संज्ञा देना विकृत मानसिकता का परिचायक है।
२. इस कथानक का नवरात्र और दशहरा पर्व से कोई लेना देना नहीं है। 3.इतिहास में महिषासुर वध का समय नहीं मिलता है। महिषासुर का वध रानी दुर्गा ने किया इसका ये मतलब नहीं निकालना चाहिए कि पाताल लोक से कोई दुर्गा देवी विशेष अवतरित हुई। दशहरा पर्व साल में दो बार ऋतु परिवर्तन के कारण ९ दिन के व्रत द्वारा शरीर की सभी ९ इंद्रियों को शुद्ध करने की प्रक्रिया है। ये एक आयुर्वेदिक पर्व है।दशहरा को दुर्गा से जोड़कर तुक्का लगाया है ऐसा लगता है जबकि दशहरा पर ९ देवियों का अर्थ दूसरा है।
4.उसको रानी द्वारा धोखे से मार देने में कुछ भी गलत नहीं है। ऋग्वेद १।३३।५ में शुभ कर्मों से रहित और शुभ करने वालों के साथ द्वेष रखने वाले को दस्यु (दुष्ट जन ) कहा गया हैं। इसी प्रकार से ऋग्वेद १।३३।७ में जो शुभ कर्मों से युक्त तथा ईश्वर का गुण गाने वाले मनुष्य हैं उनकी रक्षा करने का आदेश राजा को दिया गया हैं इसके विपरीत अशुभ कर्म करने वाले अर्थात् दस्युओं का संहार करने का आदेश हैं।
निवेदन है की मिथ्या और अवैज्ञानिक कथायो से दूर रहकर ,सत्य का अध्ययन करे ।अँध-विश्वास में पड़कर भूखे रह कर काल्पनिक देवी को पूजना धार्मिक अज्ञानता ही है। इससे बाहर निकलना चाहिए।

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