आईए समझें-राष्ट्रपति के चुनाव संबंधी आंकड़े

भारत में राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल का कार्यकाल 25 जुलाई 2012 को समाप्त हो गया है। इसी महीने देश के 13वें राष्ट्रपति के रूप में प्रणव मुखर्जी को चुना गया। भारत के राष्ट्रपति का निर्वाचन अप्रत्यक्ष मतदान से होता है। जनता की जगह जनता के चुने हुए प्रतिनिधि राष्ट्रपति को चुनते हैं। राष्ट्रपति का चुनाव एक निर्वाचन मंडल या इलेक्टोरल कॉलेज करता है।इसमें संसद के दोनों सदनों तथा राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य शामिल होते हैं। दो केंद्रशासित प्रदेशों, दिल्ली और पुद्दुचेरी, के विधायक भी चुनाव में हिस्सा लेते हैं जिनकी अपनी विधानसभाएँ है।
चुनाव जिस विधि से होता है उसका नाम है – आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के आधार पर एकल हस्तांतरणीय मत द्वारा ।
राष्ट्रपति चुनाव की वर्तमान व्यवस्था 1974 से चल रही है और ये 2026 तक लागू रहेगी।
इसमें 1971 की जनसंख्या को आधार माना गया है।
वोट का मूल्य
राष्ट्रपति चुनाव में अपनाई जानेवाली आनुपातिक प्रतनिधित्व प्रणाली की विधि के हिसाब से प्रत्येक वोट का अपना मूल्य होता है।
सांसदों के वोट का मूल्य निश्चित है मगर विधायकों के वोट का मूल्य अलग-अलग राज्यों की जनसंख्या पर निर्भर करता है।
निर्वाचन मंडल
सदस्य एक वोट का मूल्य सदस्य संख्या वोट(लगभग 11 लाख)
निर्वाचित सांसद 708 776 लगभग साढ़े पाँच लाख
निर्वाचित विधायक राज्य की जनसंख्या पर निर्भर 4120 लगभग साढ़े पाँच लाख
जैसे देश में सबसे अधिक जनसंख्या वाले राज्य उत्तर प्रदेश के एक विधायक के वोट का मूल्य 208 है तो सबसे कम जनसंख्या वाले प्रदेश सिक्किम के वोट का मूल्य मात्र सात।
प्रत्येक सांसद के वोट का मूल्य 708 है।
भारत में अभी 776 सांसद हैं। 543 लोकसभा सांसद और 233 राज्य सभा सांसद.
776 सांसदों के वोट का कुल मूल्य है – 5,49,408 (लगभग साढ़े पाँच लाख)
भारत में विधायकों की संख्या है 4120।
इन सभी विधायकों का सामूहिक वोट है 5,49,474 (लगभग साढ़े पाँच लाख)
इसप्रकार राष्ट्रपति चुनाव में कुल वोट हैं – 10,98,882 (लगभग 11 लाख)
समीकरण
यूपीए की स्थिति
पार्टी सांसद विधायक वोट(लगभग)
कांग्रेस 277 1177 3,30,000
तृणमूल 28 199 48,000
डीएमके 25 25 22,000
एनसीपी 16 94 24,000
आरजेडी 6 27 9,000
एनसी 5 28 5,500
मुस्लिम लीग 2 20 4,500
जेवीएम 2 11 3,500
एआईएमआईएम 1 7 2,000
बीपीएफ 2 12 3,000
केरल कांग्रेस 1 9 2,000
आरएलडी 6 9 6,000
एलजेपी 1 1 1100
कुल 372 1619 4,60,000
राष्ट्रपति चुनाव में जीत के लिए चाहिए – 5,49,442 वोट (लगभग साढ़े पाँच लाख वोट)
फिलहाल यूपीए के पास उसके सभी सांसदों और सभी विधायकों के वोटों को मिलाकर कुल वोट थीं – 4,60,191
एनडीए के पास सभी सांसदों और विधायकों को मिलाकर कुल वोट थीं – 3,04,785
ऐसी पार्टियाँ, जो ना तो यूपीए में हैं, ना ही एनडीए में, उनके वोट थे – 2,60,000 से ज्यादा।
कुछ अन्य छोटी पार्टियों के पास भी 70,000 से ज़्यादा वोट हैं।
स्पष्ट है कि ना तो यूपीए और ना ही एनडीए अपने दम पर राष्ट्रपति चुन सकते थे।
दोनों ही को दूसरी पार्टियों का सहयोग अपेक्षित था।
इसी कारण इस बार के राष्ट्रपति चुनाव में बड़ी जनसंख्या वाले राज्यों के क्षेत्रीय नेताओं मुलायम सिंह यादव, शरद पवार, ममता बनर्जी, नीतिश कुमार जैसे नेताओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई थी।
क्षेत्रीय दल
चुनाव में सबसे अधिक वोट वाला प्रदेश है उत्तर प्रदेश। वहाँ के विधायक के वोट का मूल्य 208 है।
यूपी की दोनों मुख्य पार्टियाँ, एसपी और बीएसपी, ना तो यूपीए के साथ हैं ना एनडीए के।
दोनों के पास मिलाकर लगभग 1,15,000 वोट हैं।
एनडीए की स्थिति
पार्टी सांसद विधायक वोट (लगभग)
बीजेपी 163 825 2,25,000
जेडी (यू) 30 121 42,000
एसएडी 7 57 11,500
शिवसेना 15 45 18,500
जेएमएम 2 18 4,500
एजीपी 3 10 3,000
एचजेसी 1 1 1000
कुल 221 1,077 3,05,000
वहाँ 27 सांसदों और 230 विधायकों वाली सत्ताधारी समाजवादी पार्टी के पास लगभग 67000 वोट थे।
मायावती की बीएसपी के पास लगभग 46,000 वोट थे।
पश्चिम बंगाल में एक विधायक के वोट का मूल्य 151 हैं।
वहाँ 25 सांसदों और 199 विधायकों वाले सत्ताधारी तृणमूल के पास लगभग 46,000 वोट थे।
इसी तरह महाराष्ट्र में शरद पवार की पार्टी एनसीपी के पास लगभग 23,000 वोट थे।
बिहार में नीतिश कुमार की पार्टी जेडी(यू) के पास लगभग 41,000 वोट थे। ऐसी स्थिति में कांग्रेस के लिए सबसे बेहतर उपाय यही है कि वो आपसी सहमति बनाने की कोशिश करे।
अन्य दल
पार्टी सांसद विधायक वोट (लगभग)
एसपी 30 230 69,000
बीएसपी 36 91 43,000
एआईएडीएमके 14 158 37,000
लेफ़्ट 39 196 52,000
बीजेडी 20 103 30,000
टीडीपी 11 86 20,500
जेडी (एस) 3 30 6,000
पीडीपी 0 22 1,500
टीआरएस 2 12 3,000
कुल 155 928 2,62,000
अन्य छोटे दल 71,500
कांग्रेस और बीजेपी के संबंध बहुत मधुर नहीं हैं, इसलिए इस चुनाव में क्षेत्रीय पार्टियाँ अपनी अहमियत का लाभ उठाने का प्रयास कर सकती थीं।
इसलिए कांग्रेस का भरसक प्रयास रहा कि यूपीए एकजुट रहे और ममता बनर्जी तथा शरद यादव जैसे क्षेत्रीय नेता उसकी पसंद का साथ दें। वहीं समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का झुकाव भी यूपीए की तरफ रहा। ऐसे में यूपीए के लिए स्थितियाँ जटिल अवश्य थीं मगर कठिन नहीं। मगर संख्याबल और मौजूदा राजनीतिक समीकरणों के आधार पर बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए को लिए राह आसान नहीं थीं।
उसके लिए अपनी पसंद के राष्ट्रपति को चुनवाने लायक बहुमत जुटाना अधिक कठिन था।बीजेपी को इसके लिए अपने पूर्व सहयोगियों – बीएसपी, टीएमसी, एआईएडीएमके, बीजेडी, टीडीपी और जेडी (एस) – से सहयोग माँगना पड़ा। और बात इतने से भी नहीं बनी।
उन्हें तब भी समाजवादी पार्टी का सहयोग अपेक्षित था।
ज़ाहिर है बीजेपी के लिए अपने दम पर किसी को राष्ट्रपति बनवा सकना बहुत कठिन था। चुनाव के अंतिम क्षणों में ममता बनर्जी ने पांसा ही पलट दिया। (बी.बी.सी.से प्राप्त तथ्यों के आधार पर)

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