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विशेष संपादकीय

पाकिस्तानी हिंदुओं का पलायन, और बांग्लादेशी घुसपैठ

1947 में देश विभाजन के समय पाकिस्तान में 22 प्रतिशत हिंदू थे, जो आज घटकर मात्र 5 प्रतिशत रह गये हैं। पूरा देश पाकिस्तान के हिंदुओं के प्रति गलत रवैये को लेकर और उन पर हो रहे अत्याचारों को लेकर परेशानी महसूस कर रहा था। पहली बार देश की संसद में अधिकांश राजनीतिक दलों ने पड़ोसी देश में अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों को लेकर गहन चिंता व्यक्त की।
देश की चिंता का ध्यान बंटाने के लिए असम में दंगे भड़क गये, यदि इस बात को यूं कहा जाए कि दंगे भड़का दिये गये तो भी कोई अतिश्योक्ति नही होगी। इसके बाद पाकिस्तान से भड़काऊ एस.एम.एस. का आना और देश के विभिन्न नगरों में साम्प्रदायिक तनाव को बढ़ावा देना या इस संबंध में अफवाह फैलाना निरंतर जारी है। देश की सरकार ने और ग्रहमंत्री ने पाकिस्तान की सरकार से अपना औपचारिक विरोध व्यक्त किया है, लेकिन इन औपचारिक विरोधों को व्यक्त कराने से कुछ भी काम नही होने वाला। पाकिस्तान के बारे में यह बात पूरी तरह से सिद्घ हो चुकी है कि भारत के प्रति उसका दृष्टिकोण उल्टा चोर कोतवाल को डांटे वाला रहा है। पाकिस्तान अपने हरकतों से बाज आने वाला नही है, लेकिन हम यदि अपने आपसे भी पूछें तो पता चलता है कि हम अपने आप कहीं अधिक दोषी हैं। हम चोर को चोर कहने का साहस तक नही जुटा पाते, इसलिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में पाकिस्तान चोर नही बल्कि शाह बनकर बैठता है, उसने हमारी स्थिति हास्यास्पद बना दी है। देश के प्रधानमंत्री के भीतर वो जज्वा नही है कि वो पड़ोसी देश को डपट सकें।
पूरे देश ने स्वतंत्रता दिवस को हर्षोल्लास के साथ मनाया, लेकिन आसाम में लाखों लोग ऐसे रहे जिनकी आंखों में स्वतंत्रता दिवस पर भी आंसू थे। यह हमारी संवेदनशून्यता है कि दूर की आग के प्रति हम कतई सावधान नही होते, हम यह भी नही जानते कि जहां आग लग रही है वहां कितने लोगों को कितनी भयंकर पीड़ा से गुजरना पड़ रहा होगा। हमारी ऐसी प्रवृत्ति ही देश को गुलाम कराने में सहायक रही थी। जब पिटती हुई चित्तौड़ को देखकर अजमेर को कोई चिंता नही थी और पिटती हुई अजमेर को देखकर कन्नौज को कोई चिंता नही होती थी। इतिहास की यह भावशून्यता और संवेदनशून्यता एक प्रेत की भांति हमारा पीछा कर रही है और हम आज भी अतीत की उसी काली छाया में जीने के लिए अभिशप्त हैं जिसने हमें खून के आंसू रूलाया है। आसाम देश का एक हिस्सा है तो उसका दर्द पूरे देश के बदन में होना चाहिए। इसका अभिप्राय यह नही कि उस दर्द की प्रतिक्रियास्वरूप किसी सम्प्रदाय को निशाना बनाया जाए, लेकिन इसका अभिप्राय यह भी नही कि पीडि़त पक्ष की पीड़ा न सुनकर उत्पीडि़त करने वाले पक्ष से ही जाकर संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी मिलें और उन्हीं से पूछें कि माजरा क्या है? साम्प्रदायिक हिंसा निषेध अधिनियम को सोनिया गांधी जिस प्रकार लाना चाहती हैं उसमें देश के बहुसंख्यकों को ही वह प्रत्येक प्रकार की साम्प्रदायिकता के लिए दोषी मानती हैं। असम दंगों के बारे में भी उनका दृष्टिकोण कुछ भिन्न नही लगता।बांग्लादेश से अवैध घुसपैठिये भारत आते रहे और उन्हें यहां की नागरिकता दी जाती रही, लेकिन पाकिस्तान से जो हिंदू उजड़कर भारत आ रहे हैं उन्हें यहां आकर भी कितनी ही प्रकार की समस्याओं से दो चार होना पड़ रहा है, जबकि पाकिस्तान से आने वाले ये हिंदू भारत को अपनी पितृ भूमि मानते हैं और इसके प्रति उनकी गहरी निष्ठा है उनके यहां आने से कोई जनसांख्यिकीय असंतुलन उत्पन्न नही होने वाला, अपितु वह देश की मिट्टी और देश के समाज के साथ घुल मिलकर रहना चाहते हैं। इसके उपरांत भी उन हिंदुओं के साथ सरकार की ओर से जिस उदासीनता का प्रदर्शन किया जा रहा है, वह निश्चय ही एक दुखद घटना है। बांग्लादेश के घुसपैठियों की घुसपैठ को हमारी सरकारों ने एक मानवीय समस्या माना, और उसका दानवीय परिणाम आसाम में भुगता है। जबकि वास्तव में भारत के लिए मानवीय समस्या तो पाकिस्तान के हिंदुओं की है, जो तिल-तिल कर वहां मर रहे हैं और भूखे भेडिय़ों से अपनी अस्मत की रक्षा करने में कतई असमर्थ हो गये हैं। आसाम के दंगों के पीछे यदि बांग्लादेशी घुसपैठ है तो पाकिस्तानी हिंदुओं के हो रहे सर्वनाश के पीछे मजहबी जुनून है। इन दोनों समस्याओं को सुलझाने के लिए भारत की सरकार को संजीदगी से काम करने की आवश्यकता है। संवेदनशून्यता और भावशून्यता शासक को हृदयहीन बनाती है, और यह सच है कि ऐसे शासक से कभी किसी शुभ कार्य की अपेक्षा नही की जा सकती।

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