प्रधानमंत्री जी! कश्मीर के दर्द को सुनो

सम्मानीय, प्रधानमंत्री जी, सादर अभिवादन। महोदय, आशा है आप सानन्द होंगे। दिल्ली की चाक चौबंद सुरक्षा व्यवस्था और उसमें भी आपका निवास स्थान, किसकी हिम्मत है कि उसकी ओर कोई नजर उठाकर भी देख ले। सवा अरब जनता का प्रधानमंत्री यह हक भीरखता है कि उसे पूरी सुरक्षा व्यवस्था मिले। आज आप दूसरी पारी खेलने के लिए राष्ट्रपति भवन जाकर देश के लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं। 15वीं लोकसभा के अभी हाल ही में संपन्न हुए चुनावों में भारत की जनता ने आपको तो नही परंतु आपकी पार्टी को यही जनादेश दिया है, जिसके लिए आपको मुबारकबाद पेश करती हूं। प्रधानमंत्री जी देश की जनता से उसका मत 15 बार ले लिया गया है, लेकिन कश्मीर की जिस घाटी से मैं यह चिट्ठी आपके लिए लिख रही हूं उसकी हिंदू जनता का मत आपके हिंदुस्तान की जम्हूरियत ने एक बार भी नही लिया है। कहते हैं कि कश्मीर में आतंकवाद है, मैं भी मानती हूं कि यहां एक आतंक है जो इस आतंकवाद से भी बड़ा है।
यहां के आतंकवाद से भी अधिक हमें आपकी जम्हूरियत का आतंकवाद खाये जा रहा है, और मिटाये जा रहा है। कुछ लोग इसे आपकी कायरता या पंगुपन कहकर भी उल्लेखित करते हैं, किंतु मैं ऐसा नही कह रही हूं। मैं इसे आपकी जम्हूरियत की दहशतगर्दी कह रही हूं। जी हां, जो लोकतंत्र आतंकवादियों को हमारी अस्मत से खेलने का न्यौता दे या ऐसा करने की खुली छूट प्रदान करे, उसकी काली करतूतों पर बेहयाई से ताली बजाए या उनकी पीठ थपथपाये, या हमारी आवाज को बंद कर आतंकियों की आवाज के साथ अपनी आवाज के सुर मिलाये, उसे निमर्म तंत्र ही कहा जाएगा और उसकी व्यवस्था को दहशतगर्दी की व्यवस्था ही माना जाएगा। आपको भली प्रकार ज्ञात है कि यहां क्या हो रहा है? तुम इलाज भी जानते हो उसका? किंतु तुम्हें वोट चाहिए उन्हीं के जो कि यहां जुल्म ढहाने का सर्टिफिकेट लेकर पिछले 62 वर्ष से खुलू घूम रहे हैं। उनके वोट की ओट में तुम मेरे जैसी ललनाओं को उनकी हविश का शिकार बनने देते हो, धिक्कार है तुम्हारे लोकतंत्र पर और नेतृत्व पर
तू इधर उधर की बात न कर यह बात की काफिला क्यों लुटा।
मुझे तेरी रहजनों से नही गरज तेरी रहबरी का सवाल है।
तुम्हारी जानकारी के लिए अपनी पीड़ा बता रही हूं, जब तुम्हारा हिंदुस्तान आजाद हुआ था तो मेरा हिंदुस्तान (कश्मीर) तुम्हारे चाचा पंडित नेहरू की गलती से आजाद नही हो पाया था। मेरे पिताजी का नाम मेरे दादाजी ने 1947 में भारत के आजाद होने पर आजाद रखा था। आज मेरे दादाजी तो संसार में नही रहे किंतु मेरे पिताजी अवश्य हैं। उन्हें बड़ा दुख होता है, अपने नाम पर। वह कहते हें मैं केवल नाम का आजाद हूं। यह नाम भी मेरे साथ एक अन्याय का प्रतीक बन गया है। आजादी के समय की पीढ़ी चली गयी उसके समय पैदा होने वाले धीरे धीरे बूढ़े होते जा रहे हैं। उससे आगे पैदा होने वाले मेरे जैसी उम्र के युवा हो चुके हैं, लेकिन कश्मीर का दर्द समाप्त नही हो रहा है। रोज आतंकियों की चिट्ठियाँ हिंदुओं को मिल रही हैं कि कश्मीर छोड़ो यह नारा तुमने इसलिए दिया था कि कश्मीर छोड़ो कहने वालों से भी दोस्ती करेंगे? मेरे पिताजी के पास भी सरदार मनमोहन सिंह जी आतंकियों ने चिट्टिïयां डालनी शुरू कर दी थी कि कश्मीर छोड़ो अन्यथा सजा-ए-मौत के लिए तैयार रहो।
आजिज आकर उन्होंने मन बना लिया कि कश्मीर छोड़ दिया जाए और आजाद हिंदुस्तान में जाकर शरण ली जाए। एक दिन हम सब दिल पर पत्थर रखकर अपने घरबार को छोड़कर वहां से चल दिये। हमें जाने से रोकेंगे।
लेकिन गजब हो गया उनकी आंखों में जरा सी भी लिहाज नही रही। वो सारे इकट्ठे होकर आये और हमारे पिताजी से कहने लगे आप जा रहे हैं तो बड़े शौक से जाइए। लेकिन अपनी बेटी को हमारे लिये छोड़ जाइए। पिताजी उनके प्रस्ताव को सुनकर सन्न रह गये। पिताजी की इसी अवस्था में उन्होंने मेरी बाजू पकड़ी और लगे खींचने। मैं चीखने चिल्लाने लगी, पिता माता, भाई और भाभी सभी रोने लगे, अनुनय विनय करने लगे किंतु किसी की एक न सुनी गयी। सब रोते रह गये, मुझे कुछ देर तक यह दृश्य दिखायी दिया, फिर मेरे साथ क्या हुआ और मैं कहां ले जाकर पटक दी गयी, मुझे नही पता। आज तक मेरे साथ क्याा क्या हुआ है मैं लिख नही सकती।
चौदहवीं शताब्दी की नृशंसता को मैंने देखा है, झेला है, सहा है। मेरा यौवन ही नही मेरी जिंदगी बर्बाद हो गयी है। लेकिन मैं फिर भी आपके लिए चिट्ठी लिख रही हूं केवल इसलिए कि कश्मीर के आतंकवादियों की वोटों के सौदागर मत बनो, कश्मीर की मुझ जैसी अभागी बेटियों की पीड़ा पर भी ध्यान दो। मेरे परिजन आपके यहां शरणार्थी है, और मैं जेल में हूं। जिंदा होकर भी हम मिल नही सकते। 15वीं लोकसभा के मुखिया के नाते मेरे दर्द की दवा करने का प्रबंध करो, तभी लोकतंत्र की जय बोलना। कभी कभी मुझे भ्रांति होती है कि मेरे बिछुडे हुए पिता तुम्ही हो। इसलिए यह चिटï्ठी लिख रही हूं आपको आपकी आजादी और गद्दी मुबारक हो। आपकी एक अनाम बेटी-

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