भारतीय रियासतों का एकीकरण और पटेल

राकेश कुमार आर्य

सरदार पटेल का नाम भारत की तत्कालीन 563 रियासतों के भारत में विलीनीकरण के कारण बहुत ही सम्मान से लिया जाता है। उनके लौहपुरूष होने का प्रमाण उनके द्वारा रियासतों को भारतीय संघ में सम्मिलित करने के उनके महान कार्य में देखने को मिला।

भारत की स्वतंत्रता में राजशाही का कोई विशेष योगदान नही था। बहुत से शासक केवल नाम मात्र के शासक थे। छोटे छोटे रजवाड़े अपने किलों में या दरबारों में अपनी प्रशंसा कराके ही खुश हो जाते थे। परंतु इसके उपरांत भी उनके भीतर यह इच्छा अवश्य थी कि स्वतंत्र भारत में संभवत: वह भी अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाये रख सकेंगे। इस प्रकार स्वतंत्र भारत में वह भी अपनी स्वतंत्रता खोज रहे थे। उनकी यह इच्छज्ञ उस समय और भी बलवती हो गयी जब अंग्रेजों ने भारतीय रियासतों को यह अधिकार दे दिया कि वह चाहें तो भारत के साथ जा सकती हैं, चाहें तो पाकिस्तान के साथ जा सकती हैं और यदि चाहें तो अपना स्वतंत्र अस्तित्व भी बचाये रख सकती हैं।

बहुत से राजाओं ने स्वतंत्रता मिलते ही अपने को स्वतंत्र घोषित करने के सपने पालने आरंभ कर दिये। रामपुर और पालनपुर के मुस्लिम नवाब ऐसे शासक थे जिन्होंने बिना देरी किये और बिना किसी संकोच के भारतीय संघ में मिलने की घोषणा कर दी। जबकि मंगरोल के शासक ने कुछ हिचकिचाहट के साथ अपना अस्तित्व भारतीय संघ के साथ विलीन कर दिया। इसमें सरदार पटेल का हस्तक्षेप हुआ और उन्होंने बड़ी सफलता प्राप्त की। टोंक रियासत के नवाब को भी जूनागढ़ के नवाब ने भड़काने का प्रयास किया। मुस्लिम लीगी नेता भी उसे पाकिस्तान के साथ विलय करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे। पर उसे भी सरदार पटेल ने उधर जाने से रोक लिया।

सरदार का राजोचित व्यवहार

महाभारत (अ.145 पू पृष्ठ 5949) में आया है :-

चारै: कर्म प्रवृत्या च तद् विज्ञाय विचारयेत्।

अशुभ निर्हरेत सद्यो जीवयेच्छुभात्मन:।।

अर्थात गुप्तचरों द्वारा और कार्य की प्रवृति से देश के शुभाशुभ वृतांत को जानकर उस पर विचार करे। तत्पश्चात अशुभ का तत्काल निवारण करे। अपने राज्य के (शुभ के) लिए शुभ का सेवन करे।

गहर्यान, निगर्हमेदेव पूज्यवान सम्पूज्येत तथा।

दणडर्याश्च दण्डयेद् देवि नात्र कार्या विचारणा।।

हे, वीर! शासक निंदनीय मनुष्यों की निंदा ही करे, पूज्यनीय पुरूषों का सत्कार करे और दण्डनीय अपराधियों को दण्ड दे। इसमें कोई अन्यथा विचार नही करना चाहिए।

सरदार पटेल का राजधर्म ऐसा ही था। वह निंदनीय पुरूषों के प्रति, राष्टï्रदोहियों के प्रति और अपूज्यों के प्रति ही कठोर थे। पूज्यनीय और राष्टï्रभक्तों के प्रति सदा ही वह सत्कार शील रहे।

उन्होंने भारतीय नरेशों के साथ बड़ी सावधानी से वार्तालाप किया। इस बात का पूरा ध्यान रखा कि किसी भी राजा के सम्मान को चोट न लगे और वह हमारी बात को भी मान ले। उन्होंने राजाओं को बताया कि वह चाहते हैं कि इस पवित्र भूमि को दुनिया के देशों के मध्य उपयुक्त स्थान दिलायें और इसे शांति एवं समृद्घि का घर बना दें।

स्वतंत्रता मिलते ही त्रावणकोर के हिंदू राजा ने भी अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी थी। उसका अनुकरण करने का मन कुछ अन्य हिंदू नरेश भी बना रहे थे। इस प्रकार संकट केवल मुस्लिम रियासतों की ओर से ही नही था अपितु कहीं से भी उत्पन्न होना संभावित था। ऐसे में बहुत ही धैर्य और विवेक का परिचय देने वाले नेतृत्व की आवश्यकता थी। विशेषत:  तब जब कि अंग्रेज भारत को खण्ड खण्ड कर देने की चालें चल रही थीं और उन चालों में फंसने के लिए बहुत सी मछलियां स्वयं को तैयार बैठी थीं।

15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता मिलने के उपरांत भोपाल के नवाब ने अपने चैम्बर ऑफ प्रिंसेस को अधिकृत कर कार्यरत घोषित कर दिया। भोपाल का नवाब 25 जुलाई 1947 की उस बैठक में भी नही गया था जिसे माउंट बेटन ने दिल्ली में आहूत किया था। उसने कह दिया था कि वह बैठक घोंघों को दरियाई घोड़े और कठफोड़वे के साथ चाय पीने के लिए बुलावा देने के समान है।

वायसराय माउंट बेटन ने भोपाल के नवाब को समझाया और उसे भारत के साथ विलय प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने के लिए प्रेरित किया। जिसने उसे कुछ हिचकिचाहट के साथ मान लिया।

भोपाल के नवाब ने पटेल को लिखा:-मैं इस तथ्य को छिपाना नही चाहता कि संघर्ष के दिनों में मैंने अपनी रियासत की स्वतंत्रता व तटस्थता बनाये रखने के लिए वह सब कुछ किया जो मेरे बस में था। अब जबकि मैंने पराजय स्वीकार कर ली है, मुझे उम्मीद है कि आप पाएंगे कि मैं उतना ही पक्का मित्र हो सकता हूं जितना पक्का विरोधी था। आपकी ओर से मुझे सदा सम्मान मिला है, और मेरे साथ विनम्रता पूर्ण व्यवहार किया गया है, इसलिए किसी के बारे में मेरे मन में कोई विद्वेष नही है।

सरदार पटेल ने नवाब को अपनी उदारता और विनम्रता का जवाब यों दिया-स्पष्टï बात तो यह है कि आपकी रियासत के भारतीय राष्टï्र में विलय को मैं न अपनी जीत मानता हूं और न ही आपकी हार। अंतत: विजय न्याय एवं उपयुक्तता की हुई है। इस विजय में मैंने और आपने अपनी-अपनी भूमिका ही निभाई है। स्थिति की महत्ता को समझने और ईमानदारी तथा  साहस के साथ अपने पुराने रूख को बदलने के लिए आप श्रेय के पात्र हैं। हमारा यह मानना है कि आपका पिछला रूख भारत तथा आपकी अपनी रियासत दोनों के हितों के प्रतिकूल था। मुझे आपके इस आश्वासन के विशेष प्रसन्नता हुई है कि देश के गद्दारों से, चाहे वे किसी भी जाति या धर्म के हों निपटने में आप भारत का साथ देंगे। निष्ठा पूर्ण मैत्री के आपके प्रस्ताव का भी मैं स्वागत करता हूं। शरणागत शत्रु के प्रति उदारता अपनाना औरर उसे अभयदान देना भारतीय राजधर्म की विशेषता रही है। पराजित राजा के प्रति राजोचित व्यवहार करना भी केवल भारत की ही परंपरा रही है। सदार पटेल भारत के राजधर्म की जीती जागती मिसाल बन गये थे। वह कुछ ऐसा राजधर्म निभा रहे थे जैसा कि लेखक के ज्येष्ठ भ्राता श्री प्रो. वीएस आर्य जी की ये पंक्तियां बताती हैं:-

मित्र को हैं हम फूल से कोमल

शत्रु को फौलाद हैं हम।

वीर शिवाा, शेखर, राणा जी की,

वही तो वज्र औलाद हैं हम।।

अब जूनागढ़ की ओर आते हैं। यहां के शासक ने भी जिन्ना की बातों में आकर पाकिस्तान के साथ जाने का निर्णय लिया। जिन्ना ने इस रियासत के नवाब को केवल भारत को तंग व परेशान करने के लिए ही उपसाया था। इस रियासत के दीवान शाहनवाज भुट्टïो के पिता थे। वह रियासत को भारत के साथ जाने देने के घोर विरोधी थे। यद्यपि उनके ऐसे प्रयास सरदार पटेल के लौह व्यक्तित्व और बुद्घि चातुर्य के समक्ष शीघ्र ही ढीले पड़ गये। जूनागढ़ का नवाब पाकिस्तान भाग गया। इतना भयभीत कि अपनी एक बेगम को उसके हवाई अड्डे पर समय से न पहुंचकर के कारण वह उसका इंतजार न करके उसे यहां ही छोड़कर चला गया। बीस फरवरी 1948 को जूनागढ़ की जनता ने जनमत के माध्यम से भारत के साथ विलय कर दिया। जूनागढ़ यात्रा के दौरान ही सरदार पटेल ने घोषणा की थी कि महमूद गजनवी द्वारा तोड़े गये सोमनात के मंदिर का फिर से निर्माण कर उसे पुराना गौरव प्रदान किया जाएगा।

अब आते हैं हैदराबाद की रियासत पर। श्री के.एम. मुंशी ने यहां के कासिम रिजवी के बारे में लिखा है यद्यपि रिजवी धर्मांत था, पर वह बहुत ही चालाक और अथक परिश्रम करने वाला कार्यकर्ता था। वह लोगों को प्रेरित भी कर सकता था और आतंकित भी। आवश्यकता पडऩे पर वह मुस्करा सकता था, मजाक कर सकता था। अपने व्यक्तित्व से लोगों को अपने आकर्षण में बांध सकता था।

हैदराबाद की रियासत की जनसंख्या का 80 प्रतिशत भाग हिंदू था। कासिम रजवी हैदराबाद के निजाम पर दबाव बना रहा था।  उसने निजाम से कहकर उदार मंत्री मिर्जा अस्माइल को प्रधानमंत्री पद से हटवा दिया और छतारी के नवाब को इस पर बैठा दिया। छतारी के नवाब ने जिन्ना से पूछा कि यदि भारत ने हैदराबाद पर आक्रमण किया तो क्या पाकिस्तान उसकी मदद के लिए आएगा। जिन्ना ने दो टूक शब्दों में उत्तर दिया-यही यह सुनकर छतारी के नवाब के पैरों तले की जमीन खिसक गयी और उन्होंने हैदराबाद छोड़ दिया।

कासिलम रिजवी की घृणास्पद बातों में फंसकर हैदराबाद का निजाम भारत विरोधी बन गया था। यहां पर सरदार पटेल ने लंबी प्रतीक्षा के पश्चात पुलिस एक्शन लिया। रिजवी भाग गया और निजाम को सरदार के सामने झुकना पड़ गया। उसको बचाने के लिए कोई नही आया। सारे देश के मुस्लिम अखबारों ने भी लिखा था कि निजाम ने अपनी मूर्खताओं से अपनी परेशानियां बुलाईं। सुहरावर्दी, जो बाद में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने, ने भी लौहपुरूष को इस बात के लिए बधाई दी कि उन्होंने अपनी दक्षता से एक जटिल समस्या को सहज ही सुलझा लिया।

सरदार ने सुहरावर्दी को बताया-भारत के मुसलमानों ने हमारा साथ दिया जिसका निश्चित रूप से अच्छा प्रभाव पड़ा।

निजाम ने अपने किये पर प्रायश्चित किया। उसने रिजवी की साम्प्रदायिकता को कोसा और उसके रहते अपनी असहायावस्था को सहज की स्वीकार किया।

सरदार पटेल ने निजाम को लिखा महामहिम जैसा कि मैंने आपसे कहा, गलती करना मनुष्य की कमजोरी है। ईश्वरीय निर्देश भूल जाने व क्षमा करने का संकेत देते हैं, मनुष्यों का यह कत्र्तव्य है कि वे ईमानदारी से पाश्चाताप करके एवं शेष समय में जनता व ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए इस प्रक्रिया में अपना योगदान करें।

इस प्रकार सारे भारत को पटेल एक करने में सफल हुए उनसे कश्मीर की रियासत का प्रश्न नेहरू ने अपने लिये रख लिया था, उसे ही हम आज तक नही सुलझा पाए। काश, नेहरू कश्मीर को भी पटेल के हवाले कर देते।

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