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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

ममता का त्यागपत्र और राजनीति की नौटंकी

तृणमूल कांग्रेस की नेता और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आखिरकार यूपीए को अलविदा कह ही दिया। उनके छह मंत्रियों ने सरकार से अपना त्यागपत्र दे दिया है और सत्तारूढ़ यूपीए से समर्थन वापसी का पत्र भी राष्ट्रपति को सौंप दिया है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बहुब्रांड खुदरा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति देने के फैसले के विरूद्घ सहयोगी दल तृणमूल कांग्रेस के इस कदम पर दुख व्यक्त किया है।तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी का यूपीए से अलग होना तय था। वह एक जिद्दी महिला हैं और साथ ही साहसी भी। अपने इन दो गुण-अवगुणों के कारण ही वह राजनीति में अपना स्थान बना पायी हैं। उनका यूपीए को समर्थन भी सदा अपने इन्हीं दो गुण-अवगुणों के पालने में झूलता रहा। इस बार मनमोहन सिंह ने उनके सामने झुकने से मना कर दिया और उनके समर्थन वापिसी का खुद इंतजार करने लगे। मनमोहन के लिए ममता की ‘म’ मुलायम के रूप में तैयार खड़ी थी। ममता दीदी ने हाथ छोड़ा और मुलायम नेताजी ने हाथ पकड़ लिया। एफडीआई को लेकर मचा सारा बवाल राजनीति की इसी नौटंकी की भेंट चढ़ गया। मुलायम सिंह यादव का कहना है कि उन्होंने साम्प्रदायिक शक्तियों को सत्ता से दूर रखने के लिए ऐसा किया।

श्री यादव के इस वक्तव्य से स्पष्ट है कि वह यूपीए के पश्चात अभी एनडीए को या भाजपा को सत्ता में आता देख रहे हैं। अत: अभी शीघ्रता में चुनाव कराया जाना उन्हें घाटे का सौदा नजर आ रहा है। इसलिए वह राजनीतिक परिवेश को अभी अपने प्रतिकूल समझ रहे हैं तो ऐसी परिस्थितियों में वह यूपीए को संजीवनी देना ही उपयुक्त मान रहे हैं। यह कितना हास्यास्पद है कि जो सरकार भ्रष्ट और निकृष्ट सिद्घ हो चुकी है और मुलायम सिंह जिसे उखाडऩे के लिए कृतसंकल्प भी दिखाई देते हैं उसी भ्रष्ट और निकृष्ट मनमोहन सरकार को वह अपने हाथों से ही दूध भी पिला रहे हैं। वह जनमत का अपमान इसलिए कर रहे हैं कि जनमत का बहुमत सरकार के खिलाफ तो है परंतु स्वयं उनके पक्ष में नही हैं। दूसरे शब्दों में मुलायम सिंह यादव का यह कदम जनता को यह बताता है कि या तो मेरे पक्ष में हो जाओ, अन्यथा इसी भ्रष्ट और निकृष्टï सरकार को झेलने के लिए अभिशप्त रहो।
तृणमूल की नेता गच्चा खा गयी है। उन्हें पहले राजनीतिक दलों की नब्ज टटोलनी चाहिए थी। विशेषत: यूपीए के मित्र दलों और संभावित मित्रों को अवश्य अपने विश्वास में लेना चाहिए था। वह अति उत्साह से भरी रहने का प्रदर्शन करती हैं और बिना विकल्पों को तलाश किये अपने संकल्पों को खोल देती हैं। ऐसे व्यक्ति जीवन में असफल हो जाते हैं। यही कारण रहा कि देश परिवर्तन की दहलीज में आता आता पीछे चला गया। वास्तव में देश इस समय किसी जयप्रकाश नारायण के लिए तरस रहा है। विपक्ष के पास कोई जय प्रकाश नारायण नही है जो सभी को एक मंच उपलब्ध करा सके और परिवर्तन के पश्चात देश की चाबी अपने पास न रखकर दूसरों को दे दे। जो लोग जेपी बनने चल रहे हैं वह जेपी बनकर भी देश की सत्ता की चाबी को अपने पास रखने की राह को ही अपने लिए और देश के लिए उचित मानते हैं।
मायावती इस समय यूपी में सपा की और फजीहत चाहती हैं, सपा के शासन काल में दंगों की बार बार पुनरावृत्ति हो रही है। इससे निश्चय ही जनता सपा से दूरी बढ़ा रही है। बसपा सुप्रीमो इस दूरी को और बढऩे देना चाहती है ताकि आगामी चुनावों में इस स्थिति का अपनी पार्टी के हित में और अधिक लाभ उठाया जा सके। बसपा सुप्रीमो का मानना है कि प्रदेश में सत्ता विरोधी लहर का लाभ कांग्रेस या भाजपा को न मिलकर उनकी पार्टी को ही मिलेगा। जबकि भाजपा इस समय केन्द्र सरकार की फजीहत को अपने हक में बनते माहौल के रूप में ‘कैश’ करना चाहती है। वह प्रदेश से अधिक देश की सत्ता के लिए लालायित है इसलिए उत्तर प्रदेश में बढ़ते साम्प्रदायिक दंगों पर वह चुप रहना चाहती है और सोचती है कि यहां की किसी बात का प्रभाव देश की राजनीति पर नही पडऩा चाहिए और ना ही चुनाव बाद के उसके सत्ता समीकरण प्रभावित होने चाहिए। लेकिन सोचने वाली बात ये है कि क्या भाजपा के लिए यह लुकाछिपी का खेल लाभप्रद हो सकता है, संभवत: कदापि नहीं।
भाजपा अपने मकडज़ाल में स्वयं को उलझा रही है। उसे सत्ता के लिए संघर्ष की स्थिति से बचकर जनता के लिए संघर्ष की स्थिति में आना चाहिए। सत्ता के लिए होते संघर्षों से हटकर चलने वाले नेता और पार्टी की ही इस समय देश को आवश्यकता है। बाबा रामदेव के साथ जनता का उमड़ता सैलाब इसी बात का प्रतीक है कि जनता उनके भीतर जनता के लिए संघर्ष का माद्दा देखती है। भाजपा ने अपने आपको एफडीआई के विरूद्घ आंदोलन से पीछे रखा है। इससे उसकी राजनीतिक अस्पृश्यता की स्थिति और बढ़ी ही है। राजनीति में स्वेच्छा से दूसरे के लिए मैदान छोडऩा भी कभी कभी आत्मघाती हो जाया करता है। उत्तर प्रदेश में उसने मायावती को सत्ता में बैठाकर मैदान उनके हाथ में देकर देख लिया है कि एक बार मैदान देकर वह दुबारा मैदान में नही आ सकी है। इसलिए उसे अपनी पुरानी गलती से शिक्षा लेनी चाहिए। कांग्रेस को इस समय न किसी प्रदेश की चिंता है और ना ही देश की। कांग्रेस को केवल अपनी कुर्सी की चिंता है। वह किसी भी प्रकार से आगामी लोकसभा चुनावों तक सत्ता से चिपके रहना चाहती है। वह सूखा पेड़ बन चुकी है और इस पेड़ से अब उसके सारे साथी पक्षी उडऩे की तैयारी कर रहे हैं। वह अपने बाग में लगती आग से चिंतित है। डीजल, पेट्रोल, मिट्टी का तेल रसोई गैस की बढ़ती कीमतों की लपटों ने घोटालों से कांग्रेस के सूखे पड़े बाग में आग लगाने में मदद की है। ऐसी लपटों के बीच उसे जो भी साथी जिस भी कीमत पर मिल जाए वह उसे लेने को तैयार बैठी है। सपा को वह उसकी कीमत से ज्यादा भाव पहले ही दे चुकी है। अब भी वह वही कुछ करने को तैयार है जो सपा चाहेगी।
इस समय मनमोहन सिंह कुछ आक्रामक नजर आ रहे हैं। इसका कारण ये नही है कि उनके भीतर शेरत्व जाग गया है। बल्कि इसका कारण है कि वह इस बात से निश्चिंत है कि कांग्रेस अगला चुनाव उन्ही के नेतृत्व में लड़ेगी। इस समय कांग्रेस के डूबते जहाज की जिम्मेदारी ओढऩे के लिए कांग्रेस में कोई भी नेता मनमोहन सिंह का स्थान लेने को तैयार नही दीखता। कांग्रेस के कथित युवराज राहुल भी बचकर भाग रहे हैं। उन्हें कांग्रेस के बाग में लगी आग की लपटों ने भयभीत कर दिया है और देश में जनता की वोटों के समुद्र पर इस आग से छाये गहरे धुएं के बीच घिरे अपने जहाज को वह फंसता देख रहे हैं। इसलिए वह किं कत्र्तव्यविमूढ की अवस्था में हैं।
ऐसी विषम राजनीतिक परिस्थितियों से देश गुजर रहा है। देश के सामने इस समय सचमुच नेतृत्व का संकट है। ममता दीदी ने जिस प्रकार यूपीए से समर्थन वापस लिया है, उससे नेतृत्व का यह संकट और बढा ही है, घटा नही है। यदि कोई चिकित्सक किसी रोगी को ऐसी औषधि दे जिससे रोग घटने की बजाए और बढ़ जाऐ तो उसे आप क्या कहेंगे? ममता दीदी ने वही किया है। दूसरे, यदि कोई दूसरा चिकित्सक रोगी और रोग दोनों को बचाए रखने की कोशिश करे…..तो आप उसे क्या कहेंगे। वह काम मुलायम सिंह यादव ने किया है…और भाजपा ने जो कुछ किया है उससे ऐसा लगता है कि उसे न रोगी की चिंता है और न ही रोग की। इस स्थिति को देखकर देश की राजनीतिक नौटंकी पर सचमुच दया आती है।

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