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विशेष संपादकीय

भारत का विपक्ष स्थिति को समझे

कोयला घोटाले की आंच से तप रही यूपीए सरकार के लिए संकट गहराता जा रहा है, लेकिन अब ये संकट कुछ विस्तार पाता जान पड़ रहा है। सीबीआई सन 1993 से हुए कोल ब्लॉक आवंटन की जांच करेगी। इससे स्पष्ट है कि एनडीए सरकार के छह सालों के दौरान हुए कोल ब्लॉक आवंटन की जांच भी अब होने जा रही है। इस जांच से स्वाभाविक रूप से कुछ नये और बड़े नाम सामने आ सकते हैं। यदि ऐसा होता है तो एनडीए भी कोल ब्लॉक आवंटन की कालिमा में फंस सकता है। इससे राजनीति फिर गरमा सकती है, और एनडीए को घेरने की यूपीए की रणनीति आगामी लोकसभा चुनावों के परिणामों को प्रभावित कर सकती है। वर्तमान में राजनीति कुछ इसी प्रकार की हो गयी है कि नंगे को अपना नंगापन दिखाई नही देता, बल्कि वह दूसरे को नंगा करने में ज्यादा आनंद लेता है। यूपीए की रणनीति अपने आप को बचाने के लिए एनडीए के प्रति ऐसी ही हो सकती है।
जांच होना कोई बुरी बात नही है, जांच होनी चाहिए और उसका सही परिणाम आने पर दोषियों के खिलाफ समुचित कार्यवाही भी होनी चाहिए। घोटालों के माफिया लोगों के खिलाफ बड़े-बड़े आरोप लगे हैं, लेकिन कानून की धीमी चाल के चलते देश को न्याय नही मिल पाया। लोगों को लगता है कि घोटाले बाजों का कुछ भी नही होने वाला। कानून के शासन के प्रति ऐसी अवधारणा बनना भी शासन के प्रति क्षोभ को दर्शाती है। मनमोहन सिंह राजनीति में नौसिखिया रहे और उन्हें स्वयं अपने प्रति यह भरोसा नही रहा कि वह कितने समय तक देश के प्रधानमंत्री रह सकते हैं? वह संयोग से देश के प्रधानमंत्री बने और परिस्थितियों वश इस पद पर बने हुए हैं। वह लापरवाही नही हैं, लेकिन उनकी लगाम अपने मंत्रियों पर नही है क्योंकि उनकी खुद की लगाम सोनिया गांधी के पास है। वह रिमोट से चलते हैं इसलिए उनके मंत्रियों पर उनका कोई नियंत्रण नही रहा। परिणामस्वरूप देश में उनके शासनकाल में केवल घोटाले ही घोटाले हुए हैं। ऐसी उपलब्धियों के साथ वह सत्ता-स्वाद ले रहे हैं। देश उनकी सरकार से परेशान है, और वह सत्ता में बने हुए हैं।
एनडीए को अपने शासनकाल में हुए कोयला ब्लॉक आवंटन के विषय में जांच कराने की मांग अपनी ओर से करनी चाहिए। 2014 के चुनाव के दृष्टिगत यूपीए का यह चुनावी स्टंट जितनी जल्दी लोगों के सामने आ जाए उतना ही अच्छा है। अब स्थिति साफ होती जा रही है कि चुनावी बिगुल कभी भी बज सकता है। यूपीए के लिए यह समय चुनाव के लिए बहुत ही अनुकूल है, क्योंकि विपक्ष इस समय एकजुट नही है। विपक्ष की चुनाव के लिए कोई तैयारी भी नही है। इसलिए वह बिखरे हुए विपक्ष का लाभ लेकर सत्तासुख अपने पास यथावत रखने के लिए रणनीतिक चाल चल रही है।
एफडीआई को लेकर विपक्ष सरकार पर भारी तो पड़ रहा है, परंतु अभी भी एफडीआई के बारे में जनता तक इतना प्रचार नही हो पाया है, जिससे चुनावों के परिणाम बदल जाएं। कांग्रेस इस स्थिति को समझ रही है, अच्छा हो कि भारत का विपक्ष भी समय रहते इसे समझ ले। दैव योग से नही बल्कि यूपीए सरकार के काले कारनामों के कारण विपक्ष को इस सरकार को उखाड़ फेंकने का अच्छा अवसर मिला है। एक महिला के हाथों में देश की सत्ता की चाबी देखते-देखते लोग तंग हो चुके हैं, अब परिवर्तन की बाट जोहते देश को एनडीए सक्षम नेतृत्व दे, यह समय की मांग है।

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