मनमोहन पर मुल्ला मुलायम की ममता आखिर क्यों..?

सिद्धार्थ शंकर गौतम
18 सितम्बर की शाम जैसे ही यह खबर राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खी बनी कि ममता अपने तमाम मंत्रियों के साथ संप्रग सरकार 2 से समर्थन वापस लेंगी, केंद्र की राजनीति में उन्हें मनाने से लेकर अन्य जोड़-तोड़ के समीकरणों पर माथापच्ची होने लगी। इसी तारतम्य में बुधवार 19 सितम्बर को कांग्रेस कोर कमेटी की बैठक में उन्हें ममता को मनाने की पुरजोर कोशिशें की गईं और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने स्वयं ममता को दो बार फोन भी लगाया किन्तु ममता पहली बार अपने फैसले पर अडिग रहीं और 21 सितम्बर को तृणमूल कांग्रेस कोटे के सभी 6 मंत्रियों ने मनमोहन सरकार से समर्थन वापस लेते हुए अपना इस्तीफ़ा सौंप दिया। सरकार चूँकि अल्पमत में थी और बाहर से समर्थन दे रहे माया-मुलायम में से किसी एक को अपने पाले में करना था लिहाजा कांग्रेस के कथित चाणक्य इस हेतु प्रयासरत हो गए। बस यही से मुलायम का सरकारी विरोध छूमंतर हो गया। दरअसल 20 सितम्बर को विपक्षी पार्टियों के आवाहन पर बुलाये गए भारत बंद में मुलायम भी सक्रियता से केंद्र की जनविरोधी नीतियों की आलोचना कर रहे थे। 20 सितम्बर को टीवी चैनलों पर दिनभर बंद के दौरान उत्तरप्रदेश में सपाइयों के आतंक का सीधा प्रसारण होता रहा था। तब ऐसा लगा कि अब मुलायम भी सरकार को समर्थन नहीं देंगे और अचानक ही अगले दिन उन्होंने यह कहकर चौंका दिया कि साम्प्रदायिक ताकतों को सत्ता पर काबिज होने से रोकने के लिए केंद्र में सेक्युलर सरकार का होना ज़रूरी हो इसलिए वे कांग्रेसनीत संप्रग सरकार को समर्थन देते रहेंगे। हालांकि इस मुद्दे पर जनता की अदालत में अपनी छवि बिगडती देख उन्होंने एक और पांसा चला और सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि वे संसद में एफडीआई का विरोध जारी रखेंगे। देखा जाए तो राजनीति में इतने जल्दी रंग बदलने वाली शख्सियत हाल के दिनों में देखने को नहीं मिली है। आखिर मुलायम समर्थन देने के बाद भी सरकार के फैसलों का फौरी तौर पर विरोध कर क्या साबित करना चाहते हैं? क्या केंद्र सीबीआई के डंडे की दम पर उन्हें नचा रही है या मुलायम अब केंद्र पर ममता लुटाते-लुटाते ममता बनने की राह पर अग्रसर हैं? मुलायम को नजदीक से जानने वाले कहते हैं कि नेताजी कोई भी फैसला हड़बड़ी में नहीं लेते और उनके हर फैसले के पीछे भविष्य की योजनाओं का खाका छुपा होता है। तब क्या मान लिया जाए कि मुलायम का असली मकसद सरकार को बचाना नहीं; कुछ और ही है। दरअसल 5 माह पूर्व उत्तरप्रदेश की सत्ता पर पूर्ण बहुमत से काबिज सपा मुखिया मुलायम ने अपने युवा पुत्र अखिलेश यादव को प्रदेश का कार्यभार सौंप दिल्ली की सुध ली थी। ज़ाहिर है उनके अंतर्मन में भी प्रधानमंत्री पद पाने की लालसा है जिसे उन्होंने शायद ही कभी छुपाया हो। हाल ही में उन्होंने काफी आत्मविश्वास से कहा था कि आगामी लोकसभा चुनाव में यदि उनकी पार्टी 40-60 सीटें जीतने में कामयाब रहती है तो केंद्र में सपा के समर्थन बिना सरकार का गठन हो ही नहीं सकता। काफी हद तक मुलायम का कथन सटीक था और वर्तमान हालातों को देखते हुए कह उम्मीद भी है कि सपा कम से कम 40 सीटें जीतने की क्षमता तो रखती है। किन्तु क्या इतने भर से मुलायम प्रधानमंत्री बनने का अपना सपना पूरा कर पायेंगे? संसद के मानसून सत्र में अपने पुराने सहयोगियों मसलन वाम दलों के साथ उन्होंने संसद परिसर के बाहर धरना देकर तीसरे मोर्चे के संभावित गठन की सुगबुआहट को जन्म दिया था। उनके इस कदम से क्या एनडीए-क्या यूपीए सभी बैकफुट पर आ गए थे। केंद्र सरकार भले ही मुलायम के रहमो करम पर चल रही हो किन्तु इतना को उसके नीतिनियंता जानते ही होंगे कि मुलायम को अधिक तूल देना उनके लिए ही हानि कारक है। तभी तो ममता के समर्थन वापसी के साथ ही सरकार ने माया-मुलायम दोनों से अलग वार्ता की शुरुआत की। यहाँ यह बताना आवश्यक है कि मुलायम लाख मध्यावधि चुनाव का कोरा राग अलापें, बदले राजनीतिक समीकरणों के चलते मायावती मध्यावधि चुनाव से बचना चाहेंगी। खैर, माया की तरफ कांग्रेस के झुकाव को देखते ही मुलायम को अपनी भूल का भान हुआ और उन्होंने तत्काल सरकार को समर्थन देकर माया को कांग्रेसी बेड़े में आने से रोक दिया। मुलायम के इस राजनीतिक पैंतरे का उन्हें लाभ तो मिलेगा ही, माया के मजबूत होने की राह में भी उन्होंने कांटे बिछा दिए हैं।
देखा जाए तो मुलायम तीसरे मोर्चे का नेतृत्व करते हुए खुद को प्रधानमंत्री के सशक्त दावेदार के रूप में पेश करना चाहते हैं। ऐसे भी कयास लगाए जा रहे थे कि कुछेक मुस्लिम संगठन भी मुलायम के नाम पर तीसरे मोर्चे के गठन की कवायद में जुट गए हैं। मुलायम की पूरी राजनीति ही यादव-मुस्लिम समीकरण पर टिकी हुई है। इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि संघ परिवार और भाजपा का विरोध ही उन्हें दिल्ली दरबार का राजा बना सकता है।
लिहाजा साम्प्रदायिक ताकतों के नाम पर जनता और सरकार को बरगलाने में माहिर मुलायम सियासी चालें चलते जा रहे हैं। पर मुलायम शायद यह भूल गए हैं कि जिन्हें वे साम्प्रदायिक ताकत कहते हैं उनके शासित राज्यों में साम्प्रदायिक सौहार्द आज भी बरकरार है जबकि उत्तरप्रदेश के पांच माह के सपा कार्यकाल में । से अधिक स्थानों पर साम्प्रदायिक दंगे भड़क चुके हैं। क्या यही मुलायम सिंह का कथित सेक्युलरिस्म है? क्या मुलायम मुल्ला-मौलवियों से इतर अपनी राजनीतिक ज़मीन नहीं बना सकते?
खुद को राम मनोहर लोहिया का अनुयायी और पक्का समाजवादी बताने वाले मुलायम के राजनीति पैंतरों को देखकर यक़ीनन लोहिया की आत्मा तड़प रही होगी। मुल्ला मुलायम को यह अच्छी तरह मालूम है कि जहां उन्होंने मुसलमानों की राजनीति को अलविदा कहा, उनका कोई राजनीतिक भविष्य नहीं है और यही वजह है जो बार-बार उन्हें कांग्रेस के दर पर आने और सर झुकाने हेतु मजबूर करती है। अब जबकि मुलायम सरकार को समर्थन देने के साथ ही उसके अंतिम संस्कार की तैयारियों में व्यस्त होंगे तभी उसी बीच अब उन्हें उस जनता की अदालत में उन सभी सवालों के जवाब भी देने होंगे कि आखिर उन्होंने देशहित से अधिक स्वहित को तवज्जो क्यों दी? क्यों वह गिरगिट की तरह रंग बदलने में माहिर होते जा रहे हैं? इस तरह से तो उनकी राजनीतिक प्रासंगिकता बजाए बढऩे के; कम ही होगी। केंद्र सरकार के प्रति लोगों में स्वाभाविक गुस्सा है और यह गुस्सा यक़ीनन किसी न किसी रूप में मुलायम सिंह पर भी निकलेगा, क्योंकि मुलायम ने एक ऐसी जनविरोधी सरकार को बचाया है जिसे देशवासियों से हितों से अधिक विदेशी मीडिया की चाटुकारिता पसंद है और जो उसी अनुपात में कार्य करने का प्रयास भी करती है

Comment:

betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
casinolevant giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti mobil giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
betgaranti güncel giriş
Kolaybet Giriş
ngsbahis giriş
artemisbet güncel
bettilt giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti
betgaranti giriş
betgaranti
betgaranti giriş
betgaranti
kolaybet giriş
bettilt giriş
betgaranti giriş
betnano güncel giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
hititbet
sahabet
sahabet
kolaybet giriş
Kolaybet Giriş
betgaranti giriş
casibom giriş
betgaranti giriş
holiganbet
sahabet
sahabet
onwin
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet
holiganbet
onwin
onwin
onwin
grandpashabet giriş
sahabet giriş
casibom giriş
onwin giriş
bettilt giriş
Betgaranti
sahabet giriş
sahabet giriş
betgaranti
norabahis giriş
norabahis giriş
betgaranti giriş
tipobet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
Kolaybet Giriş
sahabet giriş
grandpashabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
onwin giriş
onwin giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
onwin giriş
onwin giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş