आईए चलें: चित्त की पवित्रता और परलोक के आलोक में

हमें अपने राष्ट्र और संस्कृति पर गर्व है। समस्त भूमंडल पर भारत ही एक ऐसा देश है जिसकी सभ्यता और संस्कृति हमारे वंदनीय और अभिनंदनीय ऋषियों के चिंतन से आज भी अनुप्रमाणित होती है। हमारे ऋषियों ने हमारे धर्मशास्त्रों में हमारे जीवन के सशक्त स्तम्भ अथवा आदर्श जहां चार पुरूषार्थों-धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को माना है वहीं हमारे जीवन के अस्तित्व के लिए शरीर में चित्त, मन, बुद्घि और अहंकार को प्रमुख पंच माना है, जिसे हमारे ऋषियों ने अंत:करण चतुष्ट्य कहा है। ध्यान रहे, इनके भी दो दो के जोड़े हैं। मन और अहंकार का जोड़ा है, जो हमारी कर्मगत क्रियाओं पर नियंत्रण रखता है, जबकि चित्त और बुद्घि का जोड़ा है, जो हमारी ज्ञानगत सभी क्रियाओं पर नियंत्रण रखता है और उत्प्रेरक भी है।
अंत:करण चतुष्टïय के उपरोक्त चारों पंच जिस कर्म अथवा विचार को स्वीकृति देते हैं उसे हमारा स्व अर्थात आत्मा स्वीकार कर लेती है और जीवनशैली तदानुकूल ही बन जाती है। मानव का इतना बड़ा शरीर इन्हीं के निर्देशन की तारम्यता सेे चलता है। अहंकार इन चारों का सेनापति है जबकि चित्त प्रधानमंत्री है, जो राजा अर्थात आत्मा के हर समय साथ रहता है। याद रखो, आत्मा के चारों तरफ चित्त का घेरा है। सच पूछो तो हमारी आत्मा का निवास अथवा घर हमारा चित्त है। चित्त की मलिनता अथवा पवित्रता का होना नितांत आवश्यक है क्योंकि कर्म की आत्मा उसका भाव होता है। इस संदर्भ में श्वेताश्वतर-उपनिषद का ऋषि कहता है कर्म एक्शन शरीर है, भाव उसकी आत्मा है। मनुष्य हाथ चलाता है, यह कर्म है। यह कर्म शुभ अथवा अशुभ तभी हो सकता है, यदि इसमें क्रोध अथवा प्रेम का भाव हो। स्मरण रखो सृष्टि का संचालन कर्म से और कर्म का संचालन भाव से हो रहा है इसी परिप्रेक्ष्य में बृहदारण्यक उपनिषद का ऋषि कहता है-आत्मा सर्वमय है अर्थात जिसके साथ जुड़ जाता है वैसा ही हो जाता है। यथा पाप के साथ जुड़ जाये तो पापात्मा हो जाता है और यदि पुण्य से जुड जाए तो पुण्यात्मा हो जाता है। इतना ही नही इसे वेद में इंद्रमय और अदोमय भी कहा गया है। इदंमय से अभिप्राय है-पृथ्वीलोक, इहलोक, अर्थात इस जन्म से संबद्घ है। अदोमय से अभिप्राय है-आदित्य लोक, परजन्म और परलोक से जुड़ा है। यहां तक कि वेद ने इसे काममय एवायं पुरूष भी कहा है। अर्थात जैसी कामना है वैसा ही क्रुतु अर्थात प्रयत्न होता है, जैसा क्रतु होता है वैसा ही कर्म होता है, और जैसा कर्म होता है वैसा ही फल होता है। उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्टï है कि हमारे शरीर में आत्मा रूपी राजा के प्रमुख वजीर चित्त की भूमिका इस क्रम में महत्वपूर्ण होती है क्योंकि कर्म करने के संकल्प तथा संस्कार चित्त में ही रहते हैं। इतना ही नही चित्त आत्मा के सबसे अधिक निकट होने के कारण वह आत्मा रूपी राजा को समय समय पर अपनी सलाह भी देता रहता है। इसलिए चित्त का स्फटिक की तरह दीप्तिमान और पवित्र होना नितांत आवश्यक है। यह चित्त की पवित्रता ही मनुष्य को परलोक अथवा मोक्ष धाम का अधिकारी बनाती है किंतु समझ में नही आता कि इतना जानते हुए भी आज का उन्नत मानव पुण्य कम और पाप अधिक करता जा रहा है? अंतत: भोगना तो एक दिन इसे ही पड़ेगा। इसलिए श्वेताश्वतर उपनिषद का ऋषि मनुष्य को कर्म के प्रति सर्वदा सचेत रहने का आदेश देता हुआ कहता है-कर्म के बंधन से छूटने का उपाय भाव से छूट जाना, कामना को छोड़ देना है। इसी को गीता में निष्काम कर्म कहा है। कर्म जीव को तभी तक बांध सकता है, जब तक उसमें भाव अथवा कामना है। काम क्रोध, लोभ मोह यही तो भाव है। भावों के वश में होकर जीव अंधा हो जाता है और जो नही करना चाहिए वह कर डालता है। इसी से कर्मचक्र चलता है, पुनर्जन्म और योनि का निर्धारण उस समय कर्म के साथ चित्त में भाव कैसे थे इस आधार पर होता है। कर्म की प्रधानता पर प्रकाश डालते हुए रामचरित मानस की ये पंक्तियां मनुष्य को सावधान करती है:-
कर्म प्रधान विश्व रचि राखा।
जो जस करहिं तस फल चाखा।।
कर्म का निष्पादन करने में हमारे चित्त की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। आओ, अब इस बात पर विचार करें कि चित्त की उत्पत्ति कैसे होती है? ब्रहा और प्रकृति के नित्य व्याप्य व्यापक भाव-संबंध के कारण महाप्रलय के पश्चात पुन: जब ब्रहमा के ईक्षण द्वारा सर्ग का आविर्भाव होता है, तब अव्यक्त प्रकृति से सबसे पहले महा-आकाश, काल, दिशा के बाद महत तत्व प्रकट होता है। यह समष्टि चित्त के निर्माण में कारण है और फिर समष्टि चित्त सत्व से व्यष्टि चित्तों का निर्माण होता है। इसलिए व्यष्टि चित्तों की उत्पत्ति का उपादान कारण समष्टि चित्त है जबकि ब्रहमा निमित्त कारण है।
चित्त का स्वरूप स्फटिक मणि अथवा हीरे के समान कांतिमान है, जो पारदीप ज्योति मर्करी लाइट के समान मनोज्ञ और अपनी प्रज्ञाशीलता के कारण दिव्य चक्षु को चौंधिया देने वाला, सदा परिणामशील, विशुद्घ, स्वच्छ, आहलादक मोहक और अनुद्भुत प्रकाशात्मक एक छोटा सा अण्डाकृति का पुंज अथवा पिण्ड है।
परमपिता परमात्मा ने वामस्तन की घुण्डी के नीचे हमारे सबसे कोमल, संवेदनशील और प्राणशक्ति का संचार करने वाले हृदय में इसे अवस्थित किया है। कितना निर्विकार अद्भुत और अप्रतिम है यह हमारी आत्मा का घर? वाह रे विधाता। तेरी इस सौगात का कोई जवाब नही। इस लाजवाब रचना का समस्त ब्रहमाण्ड में कोई सानी नही। धन्य है, प्रभु! तेरी कारीगरी, इसका कोई पार नही पाता। इसलिए हमारे ऋषियों ने तुझे नेति नेति कहा।
वर्तमान अंग्रेजी सर्जरी के विशेषज्ञ डॉक्टरों ने भी हृदय में देखा है कि यहां पर पोल में ऊपर को उभरा हुआ रक्ताशय में एक स्थान है। इसे अंग्रेजी में ओरिक्यूलो वैन्ट्रिक्यूलर बंडल आफ हिंस कहते हैं। यह एक बहुत छोटा सा उभरा हुआ स्थान होता है। इसमें निरंतर गति रहती है। चित्त और आत्मा अथवा कारण शरीर का प्रभाव सबसे पहले यहीं पर पड़ता है। इसी के प्रभाव से हृदय धड़कता रहता है और शरीर की सभी नस नाडिय़ों में निरंतर रक्त परिभ्रमण होता है तथा चेतना का संचार बना रहता है।
चित्त का संबंध मुख्य रूप से जीवात्मा के साथ है तथा गौण रूप से अहंकार, सूक्ष्मप्राण, मन, बुद्घि और सब इंद्रियों से भी है। चित्त का जीवात्मा के साथ संबंध अनादि काल से है अर्थात मोक्ष से पुनरावृत्र्तन के पश्चात से ही चला आ रहा है। चित्त और आत्मा के अन्योन्याश्रित संबंध पर प्रकाश डालते हुए प्रश्नोपनिषद का ऋषि कहता है-मृत्यु के पश्चात जिस प्रकार का चित्त होता है उसी प्रकार का चित्त प्राण के पास पहुंचता है। प्राण अपने तेज के साथ आत्मा के पास पहुंचता है। प्राण ही तेज चित्त और आत्मा पुण्यकर्मों के कारण पुण्यलोक में और पाप कर्मों के कारण पापलोक में उभयकर्मों के कारण मनुष्य लोक में पहुंच जाता है। इसी संदर्भ में बृहदारण्यक उपनिषद का ऋषि मनुष्य को कर्म और चित्त के संस्कारों के प्रति सावधान करता हुआ कहता है।
‘जीवनपर्यन्त किये हुए कर्मों के संस्कार हमारे चित्त में अंकित रहते हैं। जीव शरीर छोड़ते समय सविज्ञान हो जाता है, अर्थात जीवन का सारा खेल उसके सामने आ जाता है यही विज्ञान उसके साथ साथ जाता है। ज्ञान, कर्म और पूर्व प्रज्ञा ये तीनों भी उसके साथ जाते हैं।
पूर्व प्रज्ञा से अभिप्राय है पहले जन्म की प्रज्ञा अर्थात पहले जन्म की बुद्घि वासना और संस्कार। इन तीनों के आधार पर ही पुनर्जन्म मिलता है, लोक परलोक मिलता है।
अब प्रश्न पैदा होता है कि क्या हमारे जीवन के सभी कर्मों के संस्कार इस छोटे से चित्त में समा जाते हैं? इसका छोटा सा उत्तर है-नही। तो फिर ये अनंत संस्कार किस रूप में, कहां रहते हैं? इस रहस्य को भी समझिये प्रत्येक अंत:करण का सीधा संबंध निरंतर और प्रतिक्षण उन दिव्य अदृश्य रश्मियों की धारा के द्वारा समष्टिï चित्त से जुड़ा रहता है। इसे ऐसे समझिए जैसे टीवी टावर रिसीवर और ट्रांसमीटर दोनों की भूमिका अदा करता है।
वह अपने मुख्य केन्द्र से रेडियो तरंगों को पकड़ता भी है और प्रसारण भी करता है। ठीक इसी प्रकार हमारा समष्टिï चित्त है जो व्यक्ति चित्त से आने वाली तरंगों को ग्रहण भी करता है और पूर्व प्रज्ञा अर्थात पूर्व जन्म की बुद्घि वासना और संस्कारों का प्रसारण भी करता रहता है। कई माता पिता चाहते हैं कि मेरा बेटा आईएएस अफसर बने किंतु बन जाता है फिल्म का अभिनेता ऐसा क्यों हो गया?
इसका सीधा सा उत्तर है कि उसके पूर्व जन्म की बुद्घि और संस्कार प्रबल थे।
वह वैसा ही बन गया। इस बात को और भी सरलता से समझिये जैसे कोई सौ गज का भूखण्ड हो और उसमें चना, मटर, टमाटर, घीया, गोभी, गाजर, धनियां, पोदीना, मिर्च, भिंडी, गेंहूं, गन्ना, अंगूर नींबू, नीम, जामुन, आंवला आम इत्यादि के पौधे हों तो वे अपने सजातीय रसों को ही भूमि से खींचते हैं। विजातीयों को नहीं। क्रमश:

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