दूधेश्वर मठ के सेवा प्रकल्प:इतिहास के आईने में

एक मात्र भारत ही ऐसी धर्मभूमि है, जहां भगवान विभिन्न रूपों में प्रकट होकर एक से अनेक स्वरूप व स्थान में पूजित होते हैं, स्वयं कर्म की प्रतिष्ठा करते हैं, कत्र्तव्य परायणता का आदर्श उपस्थित करते हुए सज्जनों का संरक्षण व दुष्टों का दमन करते हैं। यह अनेक रूपता अवतारों के रूप में भी होती है और शिवलिंग के रूप में भी। अत्यंत शीघ्र प्रसन्न हो जाने वाले आशुतोष भगवान सदाशिव विषयक शास्त्रों में सुविदित है कि वे अवतार रूप में भी धराधाम पर आए और असंख्य शिवलिंगों के रूप में भी प्रकट हुए जहां किसी ने उन्हें अत्र्तश्वर से पुकारा उसके उद्घार के लिए उन्हेांने मूर्त रूप धारण किया और ऐसे बहुसंख्य अवसरों पर वे वहीं अवस्थित भी हो गये। जिसकी जैसी तपस्या थी, उसकी तपस्या से मूत्र्त रूप में प्रकट हुए भगवान की मूर्ति का माहात्म्य भी तदनुरूप ही है। यहां उल्लेखनीय है कि सृष्टि का मूल परमब्रहम का संकल्प ही है और संकल्प से उत्पन्न सप्तर्षियों की संतानें हैं समस्त लोकवासी प्राणी है सप्तर्षियों में एक महर्षि पुलस्त्य भी हुए। उन्हीं के पुत्र कुबेर भक्तिभाव के बल पर भगवान शिव के परम प्रिय मित्र बन गये, जिनके प्रति ब्रहमा जी काा स्नेह अत्यधिक था। इन दोनों परमपूज्यों की पूजा प्रसन्नता के लिए अतिशय व्यस्तता के कारण कुबेर पिता की प्रसन्नता का ध्यान नही रख पाए। दिव्य दृष्टिï से अपने प्रति पुत्र के उपेक्षा भाव को जानकर महर्षि पुलस्त्य ने शिव सायुज्त्य की प्राप्ति के लिए कठोरतम तप किया और तप के फलस्वरूप ही वे विश्वेश्वर कहलाए। विश्वेश्वर स्वयं काशी विश्वनाथ ही है। उन्हीं के पद को प्राप्त हो जाने से महर्षि पुलस्त्य भगवान प्रसिद्घ हुए और कैलाश की तरह ही दूधेश्वर क्षेत्र भी शिव का नित्य निवास हो गया। इसीलिए दूधेश्वर क्षेत्र विश्वेश्वर वा का कैलाश प्रसिद्घ हुआ कि स्वयं पुलस्त्य के इष्टï देव कैलाशवासी शिव ही भक्त से अभेद हो यहां निवास करते हैं। कैलाश के शिव पूजन का फल दूधेश्वर के शिव पूजन का भी है। विश्वेश्वर वा जी का ही पुत्र हुआ राक्षस राज महाप्रतापी रावण। शिवजी की अभेद भक्ति का सुफल सुपुत्र के रूप में शिवगण की प्राप्ति हुई। यहां कैलाश के द्वैत संबंधी शास्त्रों का मत उपलब्ध नही होने से लंकापति रावण के कैलाश में शिव को प्रसन्न करने पर विवाद की स्थिति हो सकती है किंतु हमारा उद्देश्य रावण की निर्विवाद शिव भक्ति सिद्घ करना ही है और उसके लिए दो तथ्य ध्यातव्य है। रावण की पितृ भूमि बिसरख दूधेश्वर के ही निकट है, जहां से कैलाश में शिव को प्रसन्न कर भ्रमण करते हुए मयराष्ट्र (मेरठ) पहुंचकर उसे मय दानव की राजकुमारी मंदोदरी पत्नी के रूप में प्राप्त हुई। पिता की उपेक्षा करने वाले भाई कुबेर से उसने लंका छीन ली। कुबेर अपने मित्र शिवजी के पास नही गया बल्कि पिता के पास पहुंचा कि उसे लंका वापस दिला दें। स्पष्ट ही शास्त्रों का संकेत है कि रावण ने उसे पिता के प्रति अपराध बोध कराया और दंड स्वरूप लंका से वंचित कर पिता के पास भेजा कि सर्व समर्थ विश्वेश्वर रूप अपने पूज्य पिता से ही क्षमा प्राप्त कर सकता है। पिता ने उसे कुबेर पद से वंचित नही किया और रावण को पितृ भक्ति के पुरस्कार स्वरूप लंका का राजा बना दिया। यही है शिव का न्याय, कुबेर को मिल अलका पुरी और उसकी लंकापुरी रावण को मिल गई। दंड और पुरस्कार दोनों ही स्थितियों में प्राप्ति।
त्रेता के विश्वेश्वर वा का कैलाश कालांतर में दूधेश्वर के रूप में प्रकट हुआ। विक्रम संवत 1511 की बैकुंठी चतुर्दशी को भगवान दूधेश्वर के प्राकट्य से पूर्व विश्वेश्वर वा की तपस्थली टीले और गहन वन के रूप में कैसे परिणित हुई इस विषय में शोध आवश्यकता है किंतु यह अस्वाभाविक नही कही जा सकती। भगवान श्रीकृष्ण की लीलास्थली मथुरा वृंदावन भी द्वापर के बाद आज के लगभग साढ़े पांव सौ वर्ष पूर्व ही प्रकाश में आई है। समुद्र की कोख में श्रीकृष्ण की द्वारिकापुरी की खोज में सफलता आसन्न अतीत में ही मिली है। ध्यान देने की बात है कि म्लेच्छ राज में गोपाल तीर्थों का प्रकटय अवश्य ही किसी महत उद्देश्य में हुआ। दूधेश्वर व मथुरा दोनों में एक साम्य स्पष्ट है। दोनों ही क्षेत्रों में पिता की प्रतिष्ठा के लिए ही भगवान शक्ति का आवाह्नïन हुआ। एक ओर पुत्र से उपेक्षित महर्षि पुलस्त्य के तप से विश्वनाथ विश्वेश्वर का प्राकटï्य हुआ तो दूसरी ओर कंस से प्रताडि़त महाराज उग्रसेन व वसुदेव जी की भक्ति से श्रीकृष्ण धराधाम पर आए। भगवान शिव योगीश्वर हैं और श्रीकृष्ण हैं योगेश्वर। दोनों ही योग क्षेम के वाहक हैं। एक धर्म के वाहक हैं तो दूसरे रक्षक। धर्म की वृषक रूप में शिवजी का वाहन है। महर्षि वाल्मीकि भगवान शिव को गोपतिध्वज कहते हैं और श्रीकृष्ण को शास्त्र गोपाल कहते हैं।
म्लेच्छ-राज में धर्म की ग्लानि के समय ही दूधेश्वर का प्राकट्य हुआ इसी समय चैतन्य महाप्रभु की दिव्य दृष्टि से मथुरा वृंदावन का प्राकट्य सुविदित है। सनातन धर्म की रक्षा की बीड़ा उठाए छत्रपति शिवाजी महाराज भगवान दूधेश्वर को प्रसन्न करने पधारे थे। उन्होंने दूधेश्वर क्षेत्र का जीर्णोद्घार कराया, वहां यज्ञ किया किंतु निकट ही राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में सनातन धर्म विरोधी शासन होने से संपर्क सनातन धर्मियों ने दूधेश्वर को यथासाध्य चर्चित होने नही दिया। दूधेश्वर क्षेत्र की प्रसिद्घि 14वें श्रीमहंत गौरी गिरिजी महाराज के समय ही बढ़ी। वे तपस्वी विद्वान एवं दिव्य दृष्टिï संपन्न सिद्घ संत थे। उन्होंने महर्षि पुलस्त्य की तपस्थली के महात्म्य को लोक कल्याण के लिए प्रकट करने का उपक्रम किया। यहां के इतिहास से अनभिज्ञ निकटवर्ती पड़ोस के ग्रामीणों को महर्षि क्षेत्र के महात्म्य से अवगत कैसे कराएं कि प्रतिगामी सत्ता के कान खड़े न हों?
यहां शंकराचार्य व अन्य मूर्धन्य संतों को बुलाकर अनुष्ठान व ज्ञान यथा कराने लगे, इस क्षेत्र का नया नाम द्वारिकापुरी प्रसिद्घ किया। पिलखुवा के सुप्रसिद्घ संत साहित्यकार भक्त रामशरणदास जी बाल्यकाल में ही दूधेश्वर की प्रसिद्घि से आकृष्टï होकर यहां आने लगे थे। वे श्रीमहंत गौरी गिरि जी के परम प्रिय श्रद्घालु भक्तों में एक थे। सनातन धर्म के समर्पित सेवक व भगवान दूधेश्वर के निष्ठावान भक्त जी की लेखनी ने दर्जनों समाचार पत्र पत्रिकाओं के माध्यम से इस महर्षि क्षेत्र का महात्म्य जन जन तक पहुंचाया।
श्रीमहंत गौरी गिरि जी ने मेरठ जनपद (तब गाजियाबाद उसी का अंग था) के सुदूर गांवों के धार्मिक जनों की श्रद्घा रंग लाई। उन्होंने दूर दूर के गांवों में अनेक मंदिर बनाए। उनकी दृष्टिï में मंदिर धर्म, मर्यादा व लोक जीवन को सुखी बनाने के लिए आवश्यक संगठन केन्द्र थे। उन्होंने हजारों धर्म ग्रंथों व गौओं काा विरण कर हजारों सज्जनों को शास्त्रसेवी और गौसेवक बनाया। धर्म के प्रति जन जाग्रति के लिए उनकाा योगदान प्रेरक अविस्मरणीय व बहुमुखी रहा। माता पिता की सेवा, सत्य निष्ठा, पुरखों का सादर स्मरण अनुकरण, गौसेवा एवं विद्या का प्रचार उनके लिए भक्ति के ही स्वरूप थे। जन जन को दीन दुखियों के प्रति सेवा भावी बनाने के लिए वे स्थान स्थान पर कथा कीर्तन के साथ ही अन्न दान व सदाव्रत का आयोजन करते थे।
उन्हीं भारतीय सनातन संत परंपरा के पावन प्रतीक श्रीमहंत गौरी गिरी जी महाराज के प्रिय शिष्य श्रीमहंत नारायण गिरि दूधेश्वर नाथ महादेव मठ के 16वें श्रीमहंत हैं जो अपने गुरूदेव राम गिरि जी से कहीं अधिक अपने दादागुरू जी के ही सेवा सानिध्य में रहे। अत: स्वाभाविक रूप से ही उन पर दादा गुरू की गहरी छाप पड़ी धर्म प्रचार के लिए आपके भी कदम श्रीमहंत गौरी गिरी जी महाराज के ही पदचिन्हों पर बढ़े। युवा सन्यासी के रूप में आपकी अप्रतिम यायावर वृत्ति तप: स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान मूलक दिनचर्या, सरल स्वभाव, साधु सेवा, गौ सेवा व धर्म जागरण व्रत के साथ ही सनातन समाज के शक्ति जागरण की साधना अनुकरणीय है। स्वामी विवेकानंद की श्रद्घा, भक्ति व सनातन धर्म की श्रेष्ठता के प्रचार की उत्क ट अभिलाषा में हिंदू संगठक युगाचार्य प्रणवानंद की संगठन क्षमता के योग से जिस सजीव मनीषा मूर्ति की संभावना साकार हो सकती है, उसी क्रम में उल्लेखनीय है श्रीमहंत नारायण गिरि जी महाराज। उनकी गतिविधियों की एक झलक धार्मिक जनों के लिए प्रेरक, अनुकरणीय एवं समाज को अनुप्राणित करने का अमोघ मंत्र सिद्घ हो सकती है। श्री दूधेश्वर मठ के सेवा प्रकल्पों का संक्षिप्त विवरण निम्नांकित है-
चसंत-सनातन कुंभ-श्रीमहंत के रूप में अभिषिक्त होते ही श्रीमहंत नारायण गिरि जी ने दूधेश्वर के वार्षिकोत्सव को संत सनातन कुंभ के रूप में आयोजित करने की परंपरा स्थापित की। इस अवसर पर हजारों संत व भक्त एकत्र होते हैं जो प्रवर संतों के सत्संग में धर्म का मर्मज्ञान प्राप्त करते हैं, धर्माचरण का संकल्प लेते हैं और धर्म प्रचार का व्रत लेने के साथ ही समाज को संगठित करने निकल पड़ते हैं। वे समाज को आडंबर व कुप्रथाओं से मुक्त होकर सेवा भावी एवं परस्पर सहयोग के लिए प्रेरित करते हैं। आगामी संत सनातन कुंभ में पिछले वर्ष के अनुभवों पर विचार करते हुए समाज को सशक्त बनाने के सहयोग सूत्र विकसित किये जाते हैं।
चगौशाला का विकास-जिन गौ-माताओं के दुगधाभिषेक से भगवान दूधेश्वर प्रकट हुए, वे दूधेश्वर के ही प्राप्त हो गयीं और उनकी सेवा के लिए स्थापित गौशाला भी 542 वर्ष से निरंतर गौ-सेवारत हैं। श्रीमहंत नारायण गिरि जी ने गौ माता की सेवार्थ अत्यधिक सुविधाओं से संपन्न नये गौशाला भवन का निर्माण कराया है। अब यहां गौ मात की सुचारू सेवा हो रही है।
चगोदान-व्रत का विस्तार-पिछले एक वर्ष की अवधि में आर्य समाज गुरूकुल सहित अनेक संन्यासी व सद्गृहस्थी को दूधेश्वर की ओर से गोदान कर उन्हें गौसेवा के लिए प्रेरित व प्रोत्साहित किया गया है। हमारा विशेष आग्रह होता है कि गोदान करने वाले सज्जन क्षेत्र के विभिन्न मंदिरों, विद्या केन्द्रों व ब्रहमाचारी-सद्गृहस्थों को गोदान दें ताकि गौसेवा के प्रति जन सामान्य में रूचि बढ़, किन्हीं कारणों से गोदान प्राप्त संस्था व सज्जन सुचारू गौसेवा में असमर्थता सूचित करें तो दूधेश्वर गौशाला उनके लिए वैकल्पिक व्यवस्था भी करती है।
चश्रीमहंत गिरि विद्या मंदिर- दादा गुरू जी की शुभेच्छा के अनुरूप ही श्रीमहंत जी ने उत्तम संस्कार युक्त शिक्षा के क्षेत्र के साधन वंचित बचपन के शिक्षित संस्कारित करने के लिए दूधेश्वर मठ की ओर से श्रीमहंत गौरी गिरि विद्या मंदिर स्थापित किया है जो अब शासन से मान्यता प्राप्त कर चुका है। यहां शिक्षा प्राप्त कर रहे शताधिक बच्चों में से अधिकतर निर्धन परिवारों के हैं जिन्हें नि:शुल्क शिक्षा सुलभ हो रही है। कई बच्चों को विद्यालय के गणवेष (वस्त्र) व पाठ्य पुस्तकें भी मठ ही प्रदान करता है। श्रीमहंत जी का मत है कि बचपन संज्ञा कारित हो तो बालक बालिकाएं संस्कारयुक्त नई पीढ़ी के रूप में विकसित होंगी। निर्धन बस्तियों में इस विद्यालय की शाखाएं स्थापित करने की भी योजना है।
चश्रीमहंत राम गिरि औषधालय- क्षेत्र के साधन वंचित नागरिकों के लिए स्वास्थ्य रक्षा पर धन व्यय करना अत्यंत कठिन पाकर श्रीमहंत नारायण गिरि जी ने एक धर्मार्थ औषधालय की स्थापना की, जो दानवीर भक्तों के सहयोग से नागरिकों को आयुर्वेदिक चिकित्सा व आरोग्य परामर्श उपलब्ध करा रहा है।
चनवग्रह मंदिर- मानव जीवन ग्रहों से प्रभावित होता है और ग्रह दशा की शांति के लिए भक्तजनों को चिंतित देखकर श्रीमहंत नारायण गिरि जी ने दूधेश्वर परिसर में ही नवग्रह मंदिर के निर्माण का निश्चय किया ताकि ग्रहों की पूजा से भक्तजन ग्रहों के कुप्रभाव से मुक्त हो सकें। मंदिर निर्मित हो चुका है और निकट भविष्य में ही यहां नवग्रह मूर्ति प्रतिष्ठा हो जाएगी।
चदूधेश्वर सत्संग एवं स्वाध्याय केन्द्र-ज्ञान के अभाव में अल्पज्ञ जन अंध विश्वास एवं धूर्तों के शिकार होते हैं और छोटी छोटी समस्याओं के समाधान में भी उनका अत्यधिक समय एवं साधनों का अपव्यय अंतत: समाज की भीषण क्षति सिद्घ होता है अत: श्रीमहंत जी ने लोगों का अज्ञान दूर करने के लिए नियकित सत्संग एवं स्वाध्याय की व्यवस्था का निश्चय कर सत्संग कक्ष निर्मित कराया है, स्वाध्याय के लिए सुसज्जित गं्रथ भंडार स्थापित करने की योजना है, निकट भविष्य में ही मूर्धन्य विद्वानों का नियमित सत्संग प्रारंभ हो जाएगा और स्वाध्याय एवं सत्संग धर्मज्ञान एवं समस्या समाधान में भक्जनों के लिए उपयोगी सिद्घ होंगे। इसके अतिरिक्त श्रीमहंत नारायण गिरि जी महाराज ने अनेक अवसरों पर साप्ताहिक पाक्षिक योग व प्राकृतिक चिकित्सा शिविर जी दूधेश्वर मठ की ओर से आयोजित कराए हैं। जनता को संगठन शक्ति के प्रति जागरूक बनाने के लिए निर्बल वर्म उत्थान समिति भी उनके संरक्षकण में कार्य कर रही है। धर्म प्रचारक यात्राएं आयोजित कर वे कई बार जनपद के अनेक क्षेत्रों के ग्रामीणों के बीच संत एवं धर्माचार्यों के विशेष प्रवचन कार्यक्रमों का सफल आयोजन कर चुके हैं। ग्रहण एवं होली के अवसर पर हवन यज्ञों का आयोजन और इसमें जन सामान्य की भागीदारी विशेष उल्लेखनीय है। महाशिवरात्रि का विशाल मेला, होली भगवान दूधेश्वर की भव्य शिव बारात शोभा यात्रा का नगर भ्रमण, राम नवमी, नवरात्रा एवं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के भव्य आयोजन भगवान दूधेश्वर के सान्निध्य में होने वाले बड़े समारोह हैं। व्रत पर्वों एवं पुरूषोत्तम मास, कार्तिक व माघ महीनों में कथा महात्म्य भी होता रहता है। वे धर्म प्रचार के लिए एक बार मारीशस की भी यात्रा कर चुके हैं।
श्रीमहंत नारायण गिरि जी का सपना है कि इस आर्ष पीठ से धर्म का सर्वांगीण प्रचार एवं प्रसार लोक को एकता एवं सेवा का सार्थक संदेश देने में समर्थ हो सके तभी विश्वश्रवा के कैलाश का परमाध्याय होने के नाते अपने कत्र्तव्य-निर्वाह से संतुष्ठ हो सकेंगे।

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