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हिंद प्रशांत क्षेत्र और विश्व का बदलता हुआ घटनाक्रम

शिवेश प्रताप

दुबई, इंडोनेशिया एवं सिंगापुर दुनिया के ऐसे देश हैं जो मात्र ट्रांसशिपमेंट हब बनकर अपनी पूरे देश की अर्थव्यवस्था को समृद्धि की तरफ ले गए हैं। आपको जानकर खुशी होगी कि ग्रेट निकोबार द्वीप का क्षेत्रफल दुबई और सिंगापुर के संयुक्त क्षेत्रफल के बराबर है।
अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह बंगाल की खाड़ी के दक्षिण में 8249 किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ 836 द्वीपों का समूह है। इन सभी में मात्र 38 द्वीप ऐसे हैं जहां पर 4 लाख 30 हजार लोगों की संयुक्त आबादी रहती है। इस पर केंद्र सरकार द्वारा अंडमान एवं निकोबार प्रशासन के नाम से सीधे नियंत्रण किया जाता है। भारत के अनन्य आर्थिक क्षेत्र का 30% अकेले इन दोनों द्वीप समूहों के द्वारा निर्मित है। अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूहों का सबसे उत्तरी द्वीप म्यांमार से 22 नॉटिकल मील तथा सबसे दक्षिणी बिंदु इंदिरा पॉइंट, इंडोनेशिया से 90 नॉटिकल मील की दूरी पर है। यह द्वीप समूह मलक्का जलडमरूमध्य के पश्चिमी द्वार पर स्थित है जिसका अर्थ है कि यह संसार के सबसे व्यस्त, रणनीतिक एवं व्यापारिक जलमार्ग के पास स्थित है। इन द्वीपों की अवस्थिति बेहद रणनीतिक माने जाने वाले 10 डिग्री चैनल एवं 6 डिग्री चैनल पर अपना प्राबल्य रखती है। इन चैनलों से होकर प्रतिदिन 60 हजार से अधिक व्यापारिक जहाजें पारगमन करते है।

इतने रणनीतिक स्थान का विकास देश की आजादी के बाद से लगातार अनदेखा किया गया एवं इसलिए ही भारत को वाणिज्यिक एवं सामरिक मोर्चे पर इतना नुकसान उठाना पड़ा है। विविधताओं से भरे हुए अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह में संसार की कुछ दुर्लभ आदिवासी समूह तथा विशाल मात्रा में जंतुओं तथा वनस्पतियों की प्रजातियां प्राप्त होती हैं। देश की आजादी के बाद से इन द्वीप समूहों की यथा स्थिति बनाए रखते हुए यहां किसी भी प्रकार का विकास नहीं किया गया। समय के साथ यह बेहद महत्वपूर्ण द्वीप समूह अवहेलना की भेंट चढ़ गया।

परिवर्तनशील विश्व में तेजी से बदलते वैश्विक घटनाक्रमों के बीच हिंद प्रशांत क्षेत्र अत्यंत महत्वपूर्ण बनकर उभरा है। ध्यान देने की बात है कि हिंद प्रशांत में सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र हिंद महासागर ही है। शीत युद्ध के समापन के बाद पुनः हिंद महासागर सभी देशों के लिए रणनीतिक शक्ति का अखाड़ा बनकर उभर रहा है। ऐसे में अंडमान निकोबार द्वीप समूह भारत के लिए इस पूरे क्षेत्र में अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए तुरुप का इक्का साबित हो सकता है।

इन सभी उपरोक्त वर्णित बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने शासनकाल में अंडमान निकोबार में अभूतपूर्व नीतियों का निर्माण और क्रियान्वयन कर रही है। 2015 में नरेंद्र मोदी की सरकार ने इस द्वीप समूह को भारत का पहला मेरीटाइम हब घोषित किया। 1 लाख मिलियन का बजट घोषित किया। 2018 में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन द्वीप समूहों की यात्रा की एवं ऊर्जा, संचार एवं पर्यटन से संबंधित कई परियोजनाओं का श्रीगणेश किया।

2019 में पास हुई आईलैंड कोस्टल रेगुलेशन जोन नोटिफिकेशन 2019 के तहत यहां पर बंदरगाह एवं जलयान पत्तन हेतु भूमि अधिग्रहण की परियोजना प्रारंभ हुई है। इसी वर्ष केंद्र सरकार ने अंडमान के लिए 5000 करोड़ रुपए की रक्षा योजना भी बनायी। यह सभी बिंदु सत्यापित करते हैं कि भारत अपने सबसे दक्षिणी छोर पर अपनी सैन्य एवं आर्थिक विकास को तीव्र गति से आगे बढ़ा रहा है।

2022 में नरेंद्र मोदी सरकार के द्वारा अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूहों के इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए 75000 करोड़ का एक भारी भरकम बजट अप्रूव किया गया। इसके अंतर्गत ग्रेट निकोबार द्वीप की 16610 हेक्टेयर भूमि पर 4 परियोजनाओं का विकास किया जाना है। इसमें एक ग्रीन फील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, एक अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, बड़े टाउनशिप का विकास तथा एक पावर प्लांट स्थापित किए जाने की योजना है।

पर्यावरण मंत्रालय ने ऐसे आधुनिक विकास से वहां के आदिवासियों, जीव जंतुओं तथा वनस्पतियों के साथ जलीय पर्यावरण की रक्षा को सुनिश्चित करने के लिए संरक्षण एवं प्रबंधन योजना के तहत एक बड़े बजट को सुनिश्चित किया है। इसके साथ ही यहां तीन स्वतंत्र समितियां भी स्थापित की जाएंगी जो पर्यावरण नियंत्रण, जैव विविधता तथा आदिवासी समाज के संरक्षण के लिए कार्य करेंगी। उपरोक्त परियोजना की तैयारी से स्पष्ट होता है कि जल्द ही भारत हिंद महासागर में एक नई शक्ति और संप्रभुता स्थापित कर लेगा। साथ ही चीन के विरुद्ध हिंद महासागर में भारत के लिए अंडमान निकोबार द्वीप समूह अपने पूरे सामर्थ्य के साथ भारत की महान दीवार के रूप में स्थापित हो जाएंगे।

नीति आयोग के अनुसार ग्रेट निकोबार द्वीप, अंडमान निकोबार द्वीप समूह का सबसे मूल्यवान एवं महत्वपूर्ण द्वीप है। यह पूर्व पश्चिम अंतरराष्ट्रीय जलयान गलियारे से सटा हुआ है। यह गलियारा हिंद महासागर को स्वेज कैनाल के रास्ते यूरोप से जोड़ता है। ग्रेट निकोबार का महत्व इस गलियारे के कारण आसानी से समझा जा सकता है। ग्रेट निकोबार द्वीप श्रीलंका के कोलंबो पोर्ट, मलेशिया के क्लांग पोर्ट तथा सिंगापुर से समान दूरी पर विद्यमान है। ऐसे में मलक्का की तरफ से आने वाले जलयान के लिए ग्रेट निकोबार की अवस्थिति भविष्य में सभी क्षेत्रीय पोर्ट्स के लिए बहुत ही कठिन प्रतिस्पर्धा देगा।

इस द्वीप पर बनने वाला पोर्ट बांग्लादेश, म्यांमार, थाईलैंड एवं इंडोनेशिया के लिए एक बहुत ही अच्छा वैकल्पिक ट्रांसशिपमेंट फैसिलिटी बंद कर उभरेगा। ग्रेट निकोबार में पोर्ट बनाने के बाद भारत अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक जलमार्ग में सीधे तौर पर भागीदार बन जाएगा और इस तरह से हिंद महासागर की व्यापारिक गतिविधियों पर अपना प्रभुत्व बढ़ा पाने में सक्षम होगा। भारत के लिए ग्रेट निकोबार का यह पोर्ट, बिलियन डॉलर मार्केट प्लेस बनकर उभरेगा।

दुबई, इंडोनेशिया एवं सिंगापुर दुनिया के ऐसे देश हैं जो मात्र ट्रांसशिपमेंट हब बनकर अपनी पूरे देश की अर्थव्यवस्था को समृद्धि की तरफ ले गए हैं। आपको जानकर खुशी होगी कि ग्रेट निकोबार द्वीप का क्षेत्रफल दुबई और सिंगापुर के संयुक्त क्षेत्रफल के बराबर है। यह बात स्पष्ट करती है कि निकोबार द्वीप किस प्रकार से भारत के लिए व्यापारिक लाभ एवं सामाजिक महत्व में क्रांतिकारी परिवर्तन लेकर आएगा। अंडमान निकोबार द्वीप समूह की अवस्थिति मलाका स्ट्रेट से मात्र 200 किलोमीटर है। पूरे विश्व के व्यापारिक जलमार्ग में यह वह रणनीतिक क्षेत्र है जहां से विश्व व्यापार का मूल्य के आधार पर 90% तथा मात्रा के आधार पर 70% इसी संकीर्ण मार्ग से होकर गुजरता है। प्रतिवर्ष संसार के 85 से 90% कच्चे खनिज तेल का व्यापार इसी मार्ग से होता है। चीन का यूरोप, खाड़ी देशों तथा अफ्रीका के साथ होने वाले 78% तेल की आपूर्ति तथा 70% व्यापार इसी मार्ग से होकर गुजरता है। चीन के लिए वर्तमान में भारत का सबसे प्रभावी दबाव यदि मौजूद है तो वह है मलाका स्ट्रेट के पास भारत की उपस्थिति।

विश्व भर के सामरिक विशेषज्ञ भारत की इसी रणनीतिक उपस्थिति के कारण इसे चीन हेतु मलक्का डिलेमा कहते हैं। यही कारण है कि चीन अपनी इस कमजोरी को खत्म करने के लिए पिछले एक दशक में बहुत ही उत्साहित रूप से कार्य कर रहा है तथा अपनी नौसेना के आधुनिकीकरण पर तेजी से कार्य कर रहा है। चीन द्वारा विगत 5 वर्षों में अपनी सेना में 80 जंगी जहाजों को कमीशन किया गया है। चीन द्वारा स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स नीति के तहत इंडोनेशिया, म्यांमार, श्रीलंका में स्थाई सैनिक अड्डे बनाए गए हैं। परंतु अंडमान निकोबार द्वीप समूह से यह तीनों सैनिक अड्डे भारतीय मिसाइल की जद में होंगे। स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स नीति से निपटने के लिए भारत ने दो योजनाओं पर कार्य प्रारंभ किया है।

डबल फिश हुक स्ट्रेटजी

पहला है- “डबल फिश हुक स्ट्रेटजी” इसका पूर्वी हुक अंडमान निकोबार से प्रारंभ होकर डिएगो गार्सिया पर खत्म होता है। इस पूर्वी हुक में भारत ने ऑस्ट्रेलिया के साथ उसके कोक आयरलैंड पर लॉजिस्टिक एक्सचेंज एग्रीमेंट तथा इंडोनेशिया के साथ बोर्ड विकास परियोजना एवं लॉजिस्टिक सहायता एग्रीमेंट साइन किया है। इस प्रकार से इस हिंद महासागर की पूर्वी क्षेत्र में अपना प्रभाव रखने वाले दो बड़े देश इंडोनेशिया एवं ऑस्ट्रेलिया के साथ भारत की साझेदारी मजबूत है।

दूसरी तरफ पश्चिमी हुक ओमान के डुकम पोर्ट से प्रारंभ होकर डिएगो गार्सिया पर खत्म होता है। भारत सरकार के द्वारा ओमान के साथ एक मेरी टाइम ट्रांसपोर्ट एग्रीमेंट हुआ है। इस मुद्रिका पर मॉरीशस, मेडागास्कर कोमोरोस, सेशल्स तथा फ्रेंच रियूनियन मौजूद हैं। भारत ने पिछले कुछ वर्षों में इन सभी के साथ अपने संबंध काफी मजबूत किए हैं। साथ ही यह सभी छोटे द्वितीय देश इंडियन ओशन कमीशन का भी हिस्सा हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि 2020 में भारत इस इंडियन ओशन कमिशन में एक पर्यवेक्षक सदस्य के रूप में सम्मिलित हो चुका है। साथ ही भारत सभी बड़े देशों जैसे- अमेरिका, फ्रांस और जापान के साथ इन सभी हुक्स में अंतरसंचालन हेतु अनुबंध कर रहा है। 2019 में अमेरिका के साथ हुआ लॉजिस्टिक एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट इसका एक ज्वलंत उदाहरण है।

मेटल चैन स्ट्रेटजी

चीन को पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में ब्लॉक करने के लिए अमेरिका समर्थित कई द्वीपों की श्रृंखला है जो कुरील द्वीप, जापान, रुक्यु, ताइवान, फिलीपींस और बोर्नियो तक फैला है। इसी क्रम में अंडमान निकोबार को एक मेटल चैन बनाकर भारत चीन को हिंद महासागर क्षेत्र में भी रोक (सी डिनायल) सकता है।

सी डिनायल स्ट्रैटजी जलसेना की एक महत्वपूर्ण रणनीति होती है जिसके अंतर्गत किसी दूसरे देश के युद्धपोतों की राह में समुद्री अवरोध पैदार कर अपने देश और समुद्र तक पहुंचने का मार्ग अवरुद्ध किया जाता है। किसी युद्ध की स्थिति में निकोबार की स्थिति का लाभ उठाते हुए भारत मालक का स्ट्रीट को ब्लॉक कर चीन को व्यापारिक हानि पहुंचा सकता है। साथ ही भारत अपने नाभिकीय सबमरीन को यहां पर लंगर कर स्ट्रेट से आने जाने वाले ऐसे जहाज को ट्रेस कर सकता है जिससे भारत की संप्रभुता को खतरा हो।

भारत की नेकलेस ऑफ डायमंड रणनीति

चीन के स्ट्रिंग आफ पर्ल्स रणनीति के विरुद्ध भारत की नेकलेस ऑफ डायमंड रणनीति कारगर सिद्ध होती है। इसके अंतर्गत सिंगापुर के चांगी नेवल पोर्ट, इंडोनेशिया के सबांग पोर्ट, सेशल्स के असंप्शन द्वीप, ईरान में चाबहार पोर्ट, ओमान के डुकाम पोर्ट का सीधा प्रवेश प्राप्त किया है। साथ ही चीन के सभी पड़ोसियों से भारत ने मित्रवत संबंधों की नई आधारशिला रखी है जिसके अंतर्गत मंगोलिया, जापान, वियतनाम आदि के साथ हमारे संबंध और मजबूत हुए हैं। इस क्रम में भी अंडमान निकोबार एक महत्वपूर्ण कड़ी बनकर उभरा है इसीलिए यहां पर सरकार के द्वारा तीन वायुसेना स्टेशन स्थापित किए गए हैं। पोर्ट ब्लेयर में INS उत्क्रोश, ग्रेट निकोबार में INS बाज़ एवं उत्तरी अंडमान में INS कोहासा मौजूद है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन द्वीप समूह को भारत सरकार द्वारा एक प्राकृतिक जलपोत के रूप में विकसित करना चाहिए जो चीन के विरुद्ध एक स्थाई एवं अत्यंत मजबूत प्रतिरोध के रूप में कार्य कर सकें।

31 मार्च 2022 को भारत सरकार ने जापान इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी के साथ एक ग्रांट एग्रीमेंट भी साइन किया है जिसके द्वारा इन द्वीप समूह पर विद्युत आपूर्ति के लिए जापान 133 मिलियन अमेरिकी डॉलर की एक सहायता उपलब्ध करा रहा है। यह बात स्वयं सिद्ध करता है कि अंडमान एवं निकोबार का विकास न केवल भारत अपितु विश्व के भू-राजनैतिक परिस्थितियों में जापान सहित अन्य सभी चीन विरोधी शक्तियों के लिए भी कितना महत्वपूर्ण है।

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