परवान पर है बुद्धिबेचकों का ताण्डव

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  • डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

समाज और देश को बुद्धिजीवियों पर भरोसा था। उनके नीर-क्षीर विवेक पर गर्व था। यह विश्वास था कि इनकी बुद्धि से सबका भला होगा, देश की उन्नति में योगदान दिखेगा, नवनिर्माण और विकास की धाराओं को सम्बल प्राप्त होगा और ऐसा कुछ हो सकेगा कि दुनिया में अपने मुल्क का नाम इनकी वजह से ऊँचा होगा।

पर ऐसा हो नहीं पाया, न होना संभव है। कारण साफ है कि जिस बुद्धि के सहारे ये लोग जीवित हैं, जीविकार्जन के लिए जिस प्रकार की बुद्धि का दुरुपयोग कर रहे हैं, अर्जन ही अर्जन की धुन सवार है, समाज के लिए कुछ देने-करने का भाव गायब होता चला जा रहा है, इन स्थितियों में बुद्धिजीवियों की हरकतों और फितूरों ने बुद्धिबल पर ही प्रश्न चिह्न खड़ा कर दिया है।

जिस विद्या के सहारे विनय और पात्राता आने की बातें साकार होती थीं, अब न वो विद्या रही है, न पात्राता आ रही है। बल्कि अब तो जो लोग बुद्धिशाली और बुद्धिबली हो गए हैं वे ज्यादा शातिर, शोषक, चतुर और धूर्त-मक्कार होते जा रहे हैं।

हम, हमारे आस-पास और दुनिया वाले जिनसे परेशान हैं वे सारे के सारे बुद्धिजीवी कहे जाते हैं। अपराध, आतंक, लूट-खसोट, चोरी-बेईमानी, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, शोषण और दूसरे सारे मर्यादाहीन धंधों में रमे हुए लोगों में जो कुख्यात हैं उन सभी में अधिकांश वे हैं जो बुद्धि का इस्तेमाल कर रहे हैं चाहे आईटी में माहिर हों या फिर एंटीसोशल इंजीनियरिंग में अथवा जिन्हें माननीय, लोकप्रिय और सर्वज्ञ मानकर अपने वर्तमान और भावी स्वार्थों की पूर्ति की आशा में पूज्य मानकर पिछलग्गू बने हुए हैं।

हालांकि वे लोग भी असंख्य हैं जो अपनी बुद्धि का इस्तेमाल अपने कर्तव्य कर्मों में कर रहे हैं, समाज और देश के लिए जीते हैं और राष्ट्रीय चरित्रा, स्वाभिमान और देश हित के लिए समर्पित हैं और जहाँ जिस क्षेत्रा में काम कर रहे हैं वहाँ सामाजिक और राष्ट्रीय सरोकारों की भावना से आदर्श काम करते हुए गौरव भी प्राप्त कर रहे हैं, और कृतज्ञ समाज एवं देश उन पर गर्व भी करता है।

लेकिन बहुत बड़ी संख्या वाले बुद्धिजीवियों की कई-कई जमातें ऐसी भी है जिनका समाज और देश के उत्थान में तनिक भी योगदान नहीं है बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय परिप्रक्ष्य में इनकी भूमिका हद दर्जे की नकारात्मक, विध्वंसकारी, छिद्रान्वेषी, स्वार्थपूर्ण और विवादों की जननी रही है और इन लोगों का एक ही काम रह गया है न खुद ढंग से जीना, न औरों को जीने देना। फिर जहां कोई अच्छा काम होता है, समाज की भलाई और देश के उत्थान की भूमिका रची जाती है, समाज और देशहित में परिवर्तन की बात कही जाती है वहाँ अपने अनर्गल और बेतुके शब्द पोखरों से विरोध और हुड़दंग मचाने में पीछे नहीं रहते।

ये सारे के सारे सड़ियल मानसिकता वाले हुडदंगी अपने वजूद को जैसे-तैसे बनाए रखने के लिए अनाप-शनाप चर्चाओं, बहसों और श्वानी मानसिकता का परिचय देते रहते हैं। इन्हें न सच से कोई सरोकार है, न देश से। इन्हें केवल अपनी खोटी चवन्नियां चलाने का ही भूत सवार है और इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए वे सारे घृणित और देशविरोधी हरकतों में रमे हुए हैं।

ये केवल बोलने के लिए ही बोलते रहने और विरोध के लिए ही विरोध का पागलपन दर्शाने के आदी हो गए हैं जैसे कि दुनिया के बहुत सारे उन्मादी, मंद बुद्धि और पागल लोग बेवजह चिल्लाते रहने को ही जिन्दगी समझते हैं। सारे गंदे काम करते रहें, जो चाहे बकते रहें, जिसे चाह लें उसका इस्तेमाल अपने हक में करते रहें और कहलाए जाते हैं बुद्धिजीवी।

आजादी के पहले बिकने वाले, टुकड़ैल, झूठन चाटने वाले, झूठे, धूर्त और मक्कारों की झूठन पर जिन्दगी गुजार देने वाले ऐसे लोगों की संख्या गिनती की हुआ करती थी। आज ये इतने सारे हो गए हैं कि गिनने तक में नहीं आते। ऐसे अनगिनत खुदगर्ज और नंगे-भूखे बुद्धिजीवियों की संख्या हमारे आस-पास से लेकर प्रदेश, देश और दुनिया भर में धींगामस्ती करते हुए आतंकवादी के रूप में नज़र आ रहे हैं।

जिन लोगों को अपनी बुद्धि का इस्तेमाल जीवों और जगत के कल्याण के लिए करना चाहिए, वे अपने स्वार्थों में अंधे होकर हराम का खान-पान करने से लेकर बिना पुरुषार्थ के मुद्रा पाने और जमा करने के षड़यंत्रों में मुँह मारने लगे हैं।

जिस मातृभूमि का अन्न, पानी और हवा लेकर शरीर, मन और बुद्धि का निर्माण किया, उसी मातृभूमि के लिए सर्वस्व समर्पण भाव से जीने वाले कितने लोग हैं जिन्हें असली बुद्धिजीवी कहा जा सकता है। इसका ठीक-ठीक जवाब कोई नहीं दे सकता। न सामान्य जन और न ही बुद्धिजीवी कहे जाने वाले लोग। बुद्धिजीवियों के सामाजिक व राष्ट्रीय सरोकार अब कहीं दिखने में नहीं आते, केवल वैयक्तिक स्वार्थ से ही उनका सरोकार रह गया है।

बुद्धिजीवियों की स्थिति के बारे में सटीक और निरपेक्ष मूल्यांकन किया जाए तो पता चलेगा कि इसी किस्म में वे लोग हैं जो अपने वजूद को कायम रखने, आदर-सम्मान, प्रतिष्ठा, पद, पुरस्कार और सम्मान, अभिनंदन पाने बड़े लोगों, असामाजिक तत्वों, अपराधियों और आतंककारियोंके पीछे ऐसे घूमते हैं, परिक्रमाएं करते हैं, महिमामण्डन करते हैं जैसे पालतु श्वान अपने मालिकों के आगे-पीछे पुचकारने में लगे रहते हैं या फालतु श्वान पेट भरने के लिए दुम हिलाते हैं।

कोई इनकी प्रसिद्धि के लिए झूठा मिथ्यागान कर रहा है, प्रशस्ति ग्रंथ लिख रहा है, भाषण, लेख और प्रोपेगण्डा रच रहा है, कशीदे पढ़ रहा है, कोई इनके इशारों पर बंदर-भालुओं की तरह नाच करते हुए वह सब कुछ करने में मस्त है जो निर्देशित किया जा रहा है। और तो और ये मीडिया के सभी उपलब्ध माध्यमों का अपने हक में तथा समाज तथा देश के विरोध के लिए भयंकर दुरुपयोग में रमे हुए हैं।

यानि की अब इन छद्म बुद्धिजीवियों से कुछ भी करा लो, कोई ना-नुकुर नहीं, बड़ी ही प्रसन्नता और सर्वस्व समर्पण भाव से सब कुछ करने-कराने को हर क्षण तैयार हैं। इनके लिए समाज और देश से भी बढ़कर मायने रखते हैं वे लोग जो भौंपों और मदारियों की तर्ज पर इन्हें पालतू जानवरों की तरह नचाते हैं।

आजकल तो हर तरफ बुद्धिजीवियों की बुद्धि, शुचिता, व्यवहार और कर्म पर प्रश्नचिह्न लगते जा रहे हैं। अपनी बुद्धि का उपयोग होना चाहिए समाज और देश के लिए, तभी हमें सही मायने में बुद्धिजीवी कहलाने का हक है अन्यथा धिक्कार है ऐसी बुद्धि को जो देश के काम न आ सके।

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