वेद, महर्षि दयानंद और भारतीय संविधान-43

निर्मम कानून निर्मम समाज बनाता है
गतांक से आगे…..
जीवन के इतने अमूल्य समय को दो भाई संपत्ति के विभाजन को लेकर खो देते हैं। जिसका प्रभाव उनके बच्चों पर पड़ता है, और परिवारों में कलह कटुता का परिवेश बना रहता है। यहां तक कि दोनों परिवार एक दूसरे की खुशी और गम में भी सम्मिलित नही होते हैं। एक कुसंस्कार दोनों परिवारों में घुस जाता है और ईष्र्या व ‘घृणा’ के रूप में परिवर्तित होकर समय समय पर दीखता रहता है। कभी कभी ये ईष्र्या और घृणा का भाव परिवारों में हत्या तक करा देता है।
वर्तमान कानून की देन है-ये स्थिति। इसकी स्थिति एकदम एलोपैथी चिकित्सा पद्घति की भांति है। एलोपैथी में जब कोई डॉक्टर चिकित्सा प्रारंभ करता है, तो उस व्यक्ति की सामाजिक, पारिवारिक और मानसिक स्थिति परिस्थितियों का आंकलन नही करता, अपितु सीधे दवाई देता है। दवाई देकर भी यह नही सोचता कि इस दवाई के साइड इफेेक्ट्स क्या होंगे? फलस्वरूप रोगी स्वस्थ होकर भी अस्वस्थ रहता है। कभी कभी तो एक बीमारी का उपचार कराके किसी दूसरी बीमारी से भी उसे ग्रस्त हो जाना पड़ता है।
यही स्थिति है-कानूनी उपचार की। यह कानून एक वैद्य की सी मानसिकता नही रखता जो पहले अपने रोगी की सामाजिक, पारिवारिक और मानसिक स्थिति परिस्थितियों का आंकलन करता है और उसके बाद उसका उपचार आरंभ करता है। जबकि ‘विधि’ इसी प्रकार की चिंतन शैली को लेकर आगे बढ़ती है। उसका लक्ष्य होता है कि दो भाईयों के बीच मतभेद गहरायें नही और ‘वैर’ तो कदापि स्थापित न होने पाए। क्योंकि ‘वैर’ एक सामाजिक कैंसर है जो सारे समाज की व्यवस्था को दूषित, प्रदूषित और दुर्गंधयुक्त बनाता है। इसलिए दो भाईयों की कटुता को बढ़ाना नही है, अपितु समाप्त कराके सामाजिक व्यवस्था को सुव्यवस्थित रखना है। इसलिए बड़े भाई से कुर्रा बनवाना और छोटे भाई से छांट करवाना हमारे समाज की एक आदर्श व्यवस्था थी। पंच बड़ा भाई बना और पक्ष छोटा भाई बना। न्याय की स्थापना के लिए ‘न्यायाधीश’ ने पक्ष से छांट करा दी और उस पर अपनी स्वीकृति की मुहर लगा दी। पक्ष संतुष्टï और न्यायधीश बना बड़ा भाई गौरवान्वित-ये है न्याय की सही और सच्ची व्यवस्था। जिसके विरोध को शांत किया और क्रोध को धूमिल कर दिया। जिससे सामाजिक परिवेश वेद के शब्दों में हमारी विधि थी कि-
मा भ्राता भ्रातम् द्विक्षत:।
अर्थात भाई भाई से द्वेष न करें।
यह द्वेष भाव किस प्रकार न बढ़े या बढऩे से पूर्व ही समाप्त कर दिया जाए। उसके लिए ही आदर्श व्यवस्था विकसित की गयी कि बड़े भाई को त्याग करना होगा और छोटे को बड़े के ‘त्याग का त्याग’ करना होगा, अर्थात छोटा भी न्यायसंगत रूप से जो चीज अपने लिए जितनी लेनी उचित है उतनी को ही लेगा। शेष को सविनय लौटा देगा।
आज का कानून कहता है कि इस प्रकार की उच्च भावनाओं का हमारे यहां कोई मूल्य नही है। कानून की यह भावशून्यता ही भावशून्य निर्मम मानव समाज की रचना कर रही है।
आज का सभ्य समाज कथित रूप से सभ्य है। वास्तव में तो वह भावशून्य समाज है। इस भावशन्य समाज का व्यक्तित्व इसकी सभ्यता की ऊंची ऊंची अट्टालिकाओं में कही विलीन और संकीर्ण होकर रह गया है। सिमट कर रह गया है।
यह बात मिथ्या है कि कानून भावनाओं पर नही चल सकता। अरे, समाज और संसार को भावनाएं ही तो चलाती हैं, और आप कह रहे हैं कि भावनाओं से हमारा कोई संबंध नही। यह बात तो सिरे से ही अनुचित है।
यह मिथक अंग्रेजों ने यहां चलाया। क्योंकि उन्हें भारतीय देशभक्तों को फांसी लगानी पड़ती थी। जिसे कई बार भारतीय न्यायाधीश ही अपने निर्णयों से सुनाया करते थे। तब भारतीय न्यायधीशों की भावनाएं अपने देश के लोगों के प्रति अंग्रेजों की इच्छा केे आड़े न आने पाएं इसलिए वह अंग्रेज लोग इस प्रकार की अतार्किक बात कहकर जनता को शांत किया करते थे। उस समय जनमत की मांग होती थी कि किसी भी देशभक्त भारतीय को फांसी न लगे पर जनमत की भावनाओं की अवहेलना करके निर्मम बनाये गये न्यायाधीशों के माध्यम से निर्मम कानून अपनी निर्ममता दिखाता था और आज के गद्दारों के लिए देश का जनमत फांसी मांग रहा है। परंतु जनमत के प्रति पूर्णत: भावशून्य बना कानून गद्दरों का संरक्षण बन गया है। बस, आजादी के बाद हमने इतनी ही उन्नति की है।
सारा समाज ही निर्मम और भावशून्य बन गया है-संवेदनाएं मर गयीं हैं और सारी समाजिक व्यवस्था तार-तार हो चुकी है। आवश्यकता कानून को विधि का रूप देकर उसे समाज के लिए उपयोगी बनाने की है। संविधान ने हमारी प्राचीन न्यायिक और सामाजिक विधियों और नीतियों की घोर अवहेलना की है, देशी सरकार विदेशी कानूनों से राज कर रही है। यह स्थिति निश्चित रूप से गलत है।

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