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जलेसर:खण्डहर बता रहे हैं इमारत बुलंद थी

पिछले दिनों 9 दिसंबर को अपने अधिवक्ता साथियों श्री राजपाल सिंह नागर, ऋषिपाल भाटी एवं श्री दयानंद नागर के साथ जलेसर जाने का अवसर मिला। यह उत्तर प्रदेश के एटा जनपद का एक पुराना कस्बा है। जिसमें एक किले के खण्डहर अपने अतीत की कहानी बयान करते हैं और माने अपनी उपेक्षा की कहानी कहते-कहते रो पड़ते हैं। चारों ओर से अतिक्रमण झेलते हुए टूट फूट होते मिट्टी का ढेर बनता जा रहा यह किला ज्यों ज्यों दिन बीत रहे हैं उतना ही अधिक लोगों की नजरों से ओझल होता जा रहा है-मानो छिपते हुए सूरज से पीठ फेरकर दुनिया के लोग जल्दी से अपने अपने घरों की ओर भाग रहे हों और किले की कहानी को पूरी तरह उपेक्षित कर रहे हों।पर आदमी चाहे कितना ही निर्मम हो और काल भी चाहे कितना ही क्रूर हो, वृद्घावस्था की एक एक झुर्री जवानी की कहानी को बयान कर डालती है, उसमें जैसा अनुभव छिपा होता है वैसी ही आवाज वह झुर्री निकालती है। आवश्यकता सिर्फ पढऩे वालों की होती है-समझने वालों की होती है। एक एक झुर्री का कोई न कोई गूढ़ अर्थ होता है। वैसे ही जैसे एक शकुन (पक्षी की आवाज) का कोई अर्थ होता है। उसे जो समझता है वही आगे बढ़ता है या कोई सटीक निर्णय ले लेता है। हर व्यक्ति शकुन को समझने वाला नही होता, ना ही हर झुर्री का अर्थ समझ पाता है। इसलिए आदमी ने अपने अतीत को समझने के लिए इतिहास को बार-बार मथा है।

मैंने भी जलेसर को इतिहास में खोजना चाहा। क्योंकि जलेसर के किले के विषय में एक क्विदंती सुनने को मिली कि यह महाभारत कालीन राजा जरासंध का किला है। लेकिन यह बात सिरे से ही गलत है, क्योंकि राजा जरासंध जलेसर का नही अपितु मगध का शासक था। मगध और जलेसर में बहुत दूरी है। ऐसा भी संभव नही है कि राजा जरासंध ने जलेसर में रहकर कोई किला बनवा दिया हो। क्योंकि तत्कालीन जलेसर मथुरा (जिसे मधुरा कहा जाता था) नरेश उग्रसेन के क्षेत्र में था।
स्थानीय क्विदंती यह भी है कि यह किला महाभारतकालीन राजा जलंधर ने बनाया था। कालांतर में उसी राजा के नाम से जलंधर से जलेसर हो गया। उस समय का मथुरा राज्य दूर दूर तक फैला हुआ था। द्वारिका (गेट वे ऑफ इण्डिया) अरब देशों से व्यापार के लिए भारत का एक द्वार था। यहीं से मछलियों का व्यापार भी होता था, मछली को संस्कृत में मुम्ब कहा जाता है, इसी से मुंबई नामक व्यापारिक नगर का विकास हुआ। आजकल का आबू पर्वत उस समय अर्बुद कहा जाता था। जबकि आजकल का जूनागढ़ जीर्णगढ़ था। ये विशाल क्षेत्र मथुरा में ही आता था। इसलिए जरासंध का मेल जलेसर से नही हो सकता? मथुरा को उस समय शूरसेन प्रांत कहा जाता था। शूरसेन जनपद में भोजकुलोत्पन्न यादव राज्य करते थे। तत्कालीन शूरसेन प्रांत का राजा उग्रसेन था।
यह उग्रसेन वही है जो कि श्रीकृष्ण जी के नाना थे। देवकी उग्रसेन के भाई देवक की पुत्री थी। राजा उग्रसेन का कोई जलंधर नाम का मंत्री या सरदार इस जलेसर किले का निर्माता हो सकता है। क्योंकि एक बड़े और प्रतापी शासक के एकदम बगल में कोई स्वतंत्र शासक उस समय रहा हो यह कहीं से ज्ञात नही होता है।
एटा को पृथ्वीराज चौहान के सरदार राजा संग्राम सिंह ने बसाया था। इस साक्षी से स्पष्टï है कि एटा को महाभारत युद्घ के लगभग चार हजार वर्ष पश्चात बसाया गया है। जबकि जलेसर महाभारत कालीन शहर है। जलेसर की प्राचीनता असंदिग्ध है। पर उसके इतिहास पर कोई अच्छा खासा शोध पत्र जारी किया जाना अपेक्षित है। जैसे एक ऐतिहासिक स्थानावली में इस किले को मेवाड़ के राजा कटीर द्वारा सन 1403 में बनाया गया बताया गया है। यद्यपि मेवाड़ की राजवंशीय शाखा में उस समय (संवत 1440 से 1478) लाखाजी का शासन था।
मेरा विचार है कि शहर के जिस चौराहे पर तोप रखी है, उसी के पास एक भव्य शिलालेख इस कस्बे के शानदार अतीत के विषय में उत्कीर्ण किया जायें। लेकिन इस कार्य से पहले सब तरह से प्रमाण एकत्र कर प्रामाणिक शोध पत्र तैयार किया जाना अति आवश्यक है। अपने अतीत को मिटते देखकर हमें सजग होना चाहिए कि यदि अपने अतीत से ही हम कट गये तो आगत को हम बचा नही पाएंगे। जलेसर के किले के ध्वंसावशेषों को देखकर मेरे मुंह से अनायास ही निकल गया था—
‘खंडहर बता रहे हैं, इमारत बुलंद थी’
–आर. के. आर्य

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