आपातकाल की भयावह कर देने वाली स्मृतियां

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बृजेन्द्र सिंह वत्स
दिनांक २५ जून १९७५ को इस सेवक की आयु मात्र १३ वर्ष थी। हमारे आवास पर स्वनामधन्य पत्रकार श्री के. नरेंद्र के संपादकत्व में प्रकाशित होने वाला हिंदी समाचार पत्र वीर अर्जुन आया करता था। श्री के. नरेंद्र मूर्धन्य पत्रकारों के परिवार से संबंधित थे। उनके पिता महाशय कृष्ण ब्रिटिश समय में लाहौर से उर्दू दैनिक प्रताप प्रकाशित करते थे। मुरादाबाद में एक बार एक वरिष्ठ सज्जन से इस सेवक की भेंट हुई, तब उन्होंने बताया कि वे तत्कालीन भारत के पाकिस्तानी क्षेत्र विभाजन से पर्याप्त पहले अपना समस्त धनधान्य लेकर सुरक्षित भारत आ गए थे। उसका कारण पूछने पर उन्होंने बताया कि महाशय कृष्ण वर्ष १९४६ से ही समाचार पत्र के माध्यम से यह संकेत दे रहे थे कि हिंदुओं को यहां से चला जाना चाहिए क्योंकि कालांतर में विभाजन की स्थिति बन सकती है और तब विभाजन की इस विभीषिका का संताप हिंदुओं को झेलना होगा। उन सज्जन का यह कहना था कि वे महाशय कृष्ण के कृतज्ञ हैं कि उनकी दूरदर्शिता पूर्ण पत्रकारिता के कारण वे अपने परिवार तथा धनधान्य के साथ सुरक्षित आ सके। महाशय कृष्ण के एक सुपुत्र श्री वीरेंद्र जी पंजाब से उर्दू का प्रताप और हिंदी में वीर प्रताप प्रकाशित करते थे तो श्री के. नरेंद्र दिल्ली से उर्दू में प्रताप और हिंदी में वीर अर्जुन प्रकाशित किया करते थे। वही वीर अर्जुन मेरे आवास पर भी आता था। परिवार के वातावरण के प्रभाव से इस सेवक की रूचि समाचार पत्र पाठन में थी अतः प्रत्येक दिवस समाचार पत्र की प्रतीक्षा लगी रहती थी लेकिन २५ जून १९७५ को जब समाचार पत्र नहीं आया तो एक न्यूनता सी आ गई।


पिताश्री और दोनों बड़े भाई अपने कार्य क्षेत्र से सायं काल लौटे तो उन्होंने इस सेवक को कठोर शब्दों में निर्देशित किया कि कुछ भी राजनैतिक टिप्पणी करने की आवश्यकता नहीं है, देश में इमरजेंसी लग चुकी है। उस छोटी अवस्था में यह इमरजेंसी क्या होती है? समझना कठिन था लेकिन अगले कुछ दिनों में जो कुछ व्यवहार में घट रहा था वह धीरे-धीरे इमरजेंसी का अर्थ समझा रहा था।मुरादाबाद में अचानक ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय जनसंघ तथा अनेकों विरोधी दलों के के नेताओं की गिरफ्तारियां होने लगी। इन लोगों में वकील थे, डॉक्टर थे, इंजीनियर थे, शिक्षक थे। इस अबोध बालक की समझ में यह नहीं आ रहा था कि इनका दोष क्या है? पुलिस ने क्यों पकड़ रही है ?जो भूमिगत हो गए उनके घरों की पुलिस के द्वारा कुर्कियां की गई और अत्याचार की पराकाष्ठा उस समय हुई जब कुर्की के नाम पर घर का सामान तो ले जाया ही गया, बच्चों के हाथ में जो खाने का सामान था ,रोते बिलखते बच्चों से वह भी छीन लिया गया। १३ वर्ष के एक बालक की आंखों के सामने घट रही आपातकाल रूपी उस विभीषिका की स्मृतियां आज ६१ वर्ष की आयु में भी शिराओं को स्पंदन रहित कर रही हैं।
१२ जून १९७५ को उच्च न्यायालय इलाहाबाद के न्यायाधीश न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने एक वाद का निर्णय सुनाया। भारत की न्याय व्यवस्था का वह स्वर्णिम दिवस था। न्यायमूर्ति सिन्हा ने, प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा रायबरेली चुनाव क्षेत्र से जीते गए चुनाव को भ्रष्ट आचरण से विजयी होने का दोषी मानते हुए न केवल चुनाव रद्द कर दिया वरन उन्हें ६ वर्ष के लिए चुनाव लड़ने से भी वंचित कर दिया। वस्तुतः १९७१ में होने वाले लोक सभा के सामान्य निर्वाचन में रायबरेली चुनाव क्षेत्र से श्रीमती इंदिरा गांधी को विपक्ष की ओर से श्री राज नारायण ने चुनौती दी थी। इस चुनाव में राज नारायण पराजित हुए और उन्होंने इस परिणाम को उच्च न्यायालय में चुनौती दी, जिसका निर्णय १२ जून १९७५ को न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने सुनाया।
इस निर्णय के आते ही राजनैतिक गलियारों में हड़कंप मच गया। परिस्थितियां यह थी कि वर्ष १९७४ से ही भारत में प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की लोकप्रियता कम होने लगी थी ।देश में महंगाई आज तक के चरमोत्कर्ष पर थी। जनता अशांत होकर त्राहिमाम कर रही थी। लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने जनता के इस क्षोभ को स्वर देना प्रारंभ कर दिया। उन्होंने एक आंदोलन छेड़ दिया था। इस निर्णय के आने के पश्चात इस आंदोलन में की आग में घी डालने का कार्य कर दिया जिससे आंदोलन की लौ और तेज हो गई। न्यायालय के आदेशानुसार श्रीमती गांधी की शासन करने की नैतिक क्षमता ही समाप्त हो गई थी। फलस्वरूप जेपी ने श्रीमती गांधी से त्यागपत्र की मांग और तीव्र गति कर दी। श्रीमती गांधी की राजनीतिक सत्ता क्षीण पड़ चुकी थी किंतु वे सत्ता त्यागने को तत्पर नहीं थी। वे इस सिद्धांत पर आगे बढ़ रही थी कि यदि सत्ता की बागडोर को थामने के लिए हाथ कमजोर हो जाएं तो उसे वे दांतो से थामना चाहती थीं। दांत भी झड़ जाए तो वे सत्ता सूत्रों को मसूड़ों से पकड़े रहना चाहती थीं और इसी प्रयास में २५ जून १९७५ की वह अर्धरात्रि भी आ गई जब वे आपातकाल लगाने वाले आदेश को लेकर राष्ट्रपति भवन गई और वहां निद्रा मग्न राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद को जगा कर उस आदेश पर हस्ताक्षर कराए गए। हास्यास्पद यह है कि उस समय तक श्रीमती गांधी की कैबिनेट को भी इस प्रस्ताव की कोई जानकारी नहीं थी। २५ तारीख को जब दिन निकला तब उन्हें बुलाया गया और तब प्रधानमंत्री के निर्देश पर उन्हें सूचित किया गया कि देश में आपातकाल लागू हो चुका है तथा उसके लिए एक प्रस्ताव पारित होना है और कैबिनेट ने आपातकाल लागू करने का वह प्रस्ताव पारित कर दिया जो पहले ही आदेश के रूप में लागू हो चुका था।
आपातकाल लागू होने के पश्चात संविधान को एक प्रकार से बंधक बना लिया क्या गया उसके द्वारा जो नागरिक अधिकार प्रदान किए गए थे उनको निलंबित कर दिया गया। सभी विरोधी नेताओं को बिना किसी प्रथम दृष्टया रिपोर्ट के असीमित समय के लिए जेल में ठोंक दिया गया, ठीक ऐसे ही जैसे अंग्रेज रौलट एक्ट के अंतर्गत बिना कोई कारण और अवधि बताएं भारतीयों को जेलों में बंद कर देती थी। कुचलने की मानसिकता की पराकाष्ठा यह थी कि वयोवृद्ध जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह जैसे नेताओं को भी मुक्त नहीं किया गया। जयपुर की महारानी गायत्री देवी और ग्वालियर की महारानी विजय राजे सिंधिया को भी जेल के कपाटों के पीछे भेज दिया गया और तो और अपने दल के युवा तुर्क चंद्रशेखर को भी जेल खाने में बंद कर दिया गया क्योंकि श्रीमती गांधी जानती थीं कि चंद्रशेखर इस निर्णय का पुरजोर विरोध करेंगे और उस विरोध को वह झेल नहीं पाएंगी।
आज भारत का विपक्ष नरेंद्र मोदी को तानाशाह कहकर पुकारता है। वह ममता बनर्जी जिनके पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनाव की शुचिता बनाए रखने के लिए उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय को मार लगानी पड़ रही है जिस पर भी कोई कान देती प्रतीत नहीं होती हैं,वे मोदी को तानाशाह कहती हैं वे स्वयं तथा श्रीमती इंदिरा गांधी के नेतृत्व में उनकी परंपरा में पला बढ़ा हुआ भारत का अधिकांश विपक्ष तथा रवीश कुमार, राजदीप सरदेसाई, अजीत अंजुम, बरखा दत्त जैसे पत्रकार मोदी को तानाशाह कहते थकते नहीं है। हास्यास्पद यह है कि वे स्वच्छंदता पूर्वक अपने कार्य स्थलों पर बैठकर मोदी को कोसने का काम करते हैं जबकि आपातकाल में टाइम्स ऑफ इंडिया के पत्रकार के. विक्रम राव को जेल के सींखचों के पीछे बैठना पड़ा था। मोदी को हिटलर का समकक्ष तो बताने का प्रयास किया जाता है लेकिन वह नहीं सोचता कि वास्तव में भारत में हिटलर जैसा कौन था? यह सही है कि एडोल्फ हिटलर ने संविधान को तोड़ा मरोड़ा था तथा वाइमर संविधान को जर्मन राइच (संसद) में ‘एनेबलिंग एक्ट’ (अधिकार प्रदान करने वाले अधिनियम) को पारित करा कर नाजी पार्टी का शासन जर्मनी पर थोप दिया था तथा इस प्रकार जर्मनी और हिटलर पर्याय बन गए थे। लगभग वही कार्य बिना विपक्ष के भारत के संविधान की प्रस्तावना में संशोधन करके और ४२ वें संविधान संशोधन के द्वारा अपनी तानाशाही पूर्ण सत्ता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए श्रीमती गांधी ने हिटलर के पद चिन्हों को आत्मसात किया था। जिस प्रकार कभी जर्मन और हिटलर एक दूसरे के पर्यायवाची थे उसी प्रकार सत्तासीन कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष देवकांत ने कहा थी, ‘इंदिरा इज इंडिया , इंडिया इज इंदिरा ‘।
आपातकाल के लागू होते ही उस रात दिल्ली के सब अखबारों की विद्युत आपूर्ति भंग कर दी गई ,फलत: जो समाचार पत्र जितना छपा था उतना ही रह गया और इसी कारण वीर अर्जुन समाचार पत्र इस सेवक के आवास पर नहीं आ पाया। आपातकाल भी में बहुत कुछ तिरोहित हो गया। वीर अर्जुन समाचार पत्र भी उसमें से एक था। यह समाचार पत्र आपातकाल की ज्वाला में भस्म हो गया। यह समाचार पत्र भविष्य में उस रूप में पुनः प्रकाशित नहीं हो पाया जैसा वह २५ जून १९७५ से पूर्व था। आपातकाल अत्यंत कष्टदायक था। वह एक ऐसी कालरात्रि थी जिसके आंचल में पूरा देश एक कारागार बन गया था। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक छलावा बन चुकी थी। पुलिस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अपराध में उठाकर अनियमित काल के लिए जेल में ठोंक देती थी। यद्यपि आपातकाल के पश्चात मोरारजी देसाई की जनता सरकार ने संविधान में संशोधन करके आपातकाल लागू करने के को इतना प्रतिबंधित कर दिया है कि वह सुगमता से पुन:लागू नहीं हो सकता। लोकतंत्र में तानाशाही प्रवृत्ति एक अपराध होती है। इसी प्रवृत्ति के नाते श्रीमती गांधी ने यह अपराध किया था। आज भी उसी प्रवृत्ति के दर्शन उनके उत्तराधिकारियों में हो जाते हैं। २००४से १४ के मध्य में यूपी ए सरकार के प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह थे लेकिन एक अन्य समिति भी थी जिसकी अध्यक्षता कैबिनेट रैंक प्राप्त करके श्रीमती सोनिया गांधी करती थी । यह समिति भारत सरकार के सारे कार्यों की समीक्षा करती थी। डॉ मनमोहन सिंह की कैबिनेट के सारे प्रस्तावों को सोनिया जी की यह समिति जब तक हरी झंडी नहीं दिखाती थी तब तक वह प्रस्ताव निरर्थक ही रहते थे। पाठकों को स्मरण होगा कि डॉ मनमोहन सिंह की कैबिनेट के द्वारा पारित एक अध्यादेश को राहुल गांधी ने सार्वजनिक रूप से फाड़ दिया था। स्पष्ट है कि वह अध्यादेश डॉ मनमोहन सिंह की कैबिनेट से पहले सोनिया जी की समिति द्वारा पारित किया गया होगा जिसे बिना किसी पद पर विराजे राहुल गांधी ने तार-तार कर दिया था। यह तानाशाही की प्रवृत्ति नही है तो क्या है? कांग्रेस के निर्वाचित अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे हैं। अभी कर्नाटक का चुनाव पूर्ण हुआ। तो खड़गे जी कहते पाए गए कि वह हाईकमान से विचार-विमर्श करके कोई निर्णय करेंगे। अब अध्यक्ष के ऊपर भी कोई हाईकमान हो सकती है? लेकिन सत्यता यही है कि कांग्रेस में राहुल और सोनिया के अतिरिक्त कोई भी नेता नहीं है, ठीक वैसे ही जैसे १९७५ में प इंदिरा जी और आपातकाल में संजय गांधी थे। वस्तुतः यही तानाशाही प्रवृत्ति है और ऐसी प्रवृत्ति ही आपातकाल जैसी स्थितियों को न्योता देती है।

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