भारत के 50 ऋषि वैज्ञानिक अध्याय – 44 भारत के प्राचीन चिकित्साशास्त्री : माधवकर

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भारत के प्राचीन चिकित्साशास्त्री : माधवकर

भारत में दक्षिण की ओर पड़ने वाले आज के हैदराबाद राज्य में गोलकुंडा हीरों के लिए विशेष रूप से विख्यात है। इसी क्षेत्र को रामायण काल में किष्किंधा के नाम से जाना जाता था। किष्किन्धा का शाब्दिक अर्थ बंदरों का राज्य है’। यही वह क्षेत्र है जहां कभी राजा रामचंद्र जी ने वानरों की अर्थात वनों में रहने वाले लोगों की सेना का निर्माण कर श्रीलंका पर चढ़ाई की थी। यह आजकल हम्पी है, वाल्मीकि रामायण में बालि यहीं का राजा था, जिसे मारकर रामचंद्र जी ने सुग्रीव को यहां का राजा बना दिया था।
उस समय विंध्याचल पर्वत माला से लेकर पूरे भारतीय प्रायद्वीप में घना वन फैला हुआ था। इसी को रामायण काल में दण्डक वन कहा जाता था। यहां के निवासियों को उस समय वानर की संज्ञा दी जाती थी। 900 ई0 में यहीं पर भारत के महान चिकित्साशास्त्री माधवकर का जन्म हुआ था। इन्हीं का नाम माधवाचार्य या विद्यारण्य भी था। माधवाचार्य ने अपने काल में भारत के चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में विशेष योगदान दिया था।

अनमोल विरासत उनकी है जो नाम अमर कर जाते हैं,
कम ही लोग जगत में ऐसे , जो पुण्य कर्म कर पाते हैं।
देश – धर्म की रक्षा कर, वही इतिहास बनाते हैं जग में,
जो नेक कर्म करते जग में , और नेक कर्म का खाते हैं।।

   उन्होंने अपनी अनुपम साधना से चिकित्सा क्षेत्र में कार्य करने वाले लोगों के लिए अपने प्रसिद्ध ग्रंथ 'रुग्विनिश्छाया' की रचना की थी। उनके इस ग्रंथ को 'माधव- निदान' या 'निदान' नाम से भी जाना जाता है। उस समय दक्षिण भारत में विजयनगर साम्राज्य शासन कर रहा था। इसके प्रतापी शासन में भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को उन्नति करने का विशेष अवसर उपलब्ध हुआ था। बात स्पष्ट है कि उस वंश के शासन काल में भारत ने चिकित्सा क्षेत्र में भी विशेष उन्नति की थी। माधवकर जैसे चिकित्सा शास्त्रियों का इस राजवंश के समय होना समझो सोने पर सुहागा वाली बात थी। उन्होंने खगोल विज्ञान के क्षेत्र में भी मां भारती की झोली को हीरों से भरा।

विजयनगर राज्य उस समय मां भारती की अनुपम सेवा कर रहा था। उस राज्य के मंत्री के रूप में माधवकर की नियुक्ति होना उनकी राष्ट्रभक्ति और धर्म व संस्कृति के प्रति विशेष अनुराग का पता चलता है। वृद्धावस्था में उन्होंने संन्यास ग्रहण कर लिया था । यद्यपि इसके उपरांत भी वे समाज सुधार के माध्यम से देश के लोगों को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रति समर्पित रहने के लिए प्रेरित करते रहे थे।

विजयनगर के मंत्री बन , अनुपम इतिहास रचाया था,
माधवकर ने धर्म के हेतु , जीवन साज सजाया था।
संन्यास ग्रहण कर मानवता की सेवा का संकल्प लिया,
कर में ले धर्म ध्वजा को अंधकार को दूर भगाया था।।

चिकित्सा शास्त्र पर लिखे गए अपने ग्रंथ के माध्यम से उन्होंने लोगों को बहुत ही उत्तम जानकारी दी है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ के रूप में ख्याति अर्जित करने वाले माधवकर ने बहुत सहज व सरल ढंग से लोगों को विभिन्न रोगों से मुक्त रहने के उपाय अपने चिकित्सा शास्त्र संबंधी के अंत में बताए हैं। हर भारतीय चिकित्सा शास्त्री की भांति उन्होंने रोगों के लक्षण और उनसे निदान के सूत्र देकर अपने ग्रंथ को अनमोल बना दिया है। उन्होंने चिकित्सक होने को अपने लिए गौरव का विषय माना। यही कारण था कि चिकित्सा के क्षेत्र में अनुपम कार्य करने के उपरांत भी उन्हें किसी प्रकार का अहंकार नहीं था।
व्यक्ति को मानसिक रूप से स्वस्थ रखना और अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक बनाए रखना किसी भी चिकित्सा शास्त्री का प्राथमिक कर्तव्य होता है। जो चिकित्सा शास्त्री अपने प्राथमिक कर्तव्य को अपना धर्म मानकर निर्वाह करता है वह समाज में मानवता की सेवा करने के कारण विशेष सम्मान अर्जित करता है। माधवकर के भीतर ऐसा ही विशिष्ट गुण था । अपने व्यक्तित्व की इसी विशेषता के कारण माधवकर सबके लिए वंदनीय थे।
माधवकर ने अपने द्वारा लिखित ग्रंथ में भाषा की जटिलता के बंधन को शिथिल करने का सफल प्रयास किया है। भाषा की सरलता के कारण उनका ग्रंथ जनसाधारण के लिए उपयोगी बन पड़ा है। उनके जीवन के कालखंड के बारे में विद्वानों का मानना है कि वह वाग्भट के बाद हुए हैं और द्रधबल तथा वृंद से पहले जन्मे थे। माधवकर भारत की पवित्र भूमि पर उस समय विचरण कर रहे थे , जिस समय उत्तरी भारत पर विदेशी आक्रमणकारी रह-रहकर आक्रमण कर रहे थे। उस समय भी उन्होंने भारत की महान सांस्कृतिक विरासत की रक्षा करने के लिए अपने आपको समर्पित किया और भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद व संस्कृति की विरासत को अक्षुण्ण बनाए रखने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया , इसके लिए उनका जितना वंदन किया जाए – उतना कम है। माधवकर के ग्रंथ पर विजयरक्षित और श्रीकंठदत्त आदि विद्वानों ने टीकाएँ लिखीं। इन टीकाओं के अध्ययन से उनकी ऐतिहासिक महत्ता और उनके महान योगदान का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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