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बिहार फिर बनने जा रहा है विपक्षी एकता की धुरी,?

लेकिन इससे राज्य को मिलेगा क्या ?

संतोष पाठक

क्या बिहार की तस्वीर और तकदीर बदलने जा रही है ? क्या बिहार बदलने जा रहा है ? क्या शिक्षा और नौकरी के लिए बिहारियों को इसके बाद पलायन नहीं करना पड़ेगा ? यह कहा जा सकता है कि वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में ये सारे सवाल बेमानी हैं।

पिछले लंबे समय से बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा की जा रही मेहनत अब रंग लेती नजर आ रही है। अब लगभग यह साफ हो गया है कि देश के विरोधी दलों की एक बड़ी और साझा बैठक बिहार की राजधानी पटना में 12 जून को होने जा रही है। उसी बिहार में जहां की धरती से राष्ट्रपति महात्मा गांधी ने आजादी के आंदोलन की अलख जलाई थी, उसी बिहार में जहां से लोक नायक जयप्रकाश ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन की शुरुआत कर तत्कालीन इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल को उखाड़ फेंका था। हालांकि अब भी यह एक बड़ा सवाल बिहार और बिहारियों के लिए पहले की तरह ही बना हुआ है कि उसकी धरती पर होने जा रहे इस बड़े राजनीतिक घटनाक्रम से उसको मिलने क्या जा रहा है।

क्या बिहार की तस्वीर और तकदीर बदलने जा रही है ? क्या बिहार बदलने जा रहा है ? क्या शिक्षा और नौकरी के लिए बिहारियों को इसके बाद पलायन नहीं करना पड़ेगा ? यह कहा जा सकता है कि वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में ये सारे सवाल बेमानी हैं क्योंकि यह पूरी कवायद 2024 में होने वाले लोक सभा चुनाव के लिए की जा रही है। लेकिन पिछले 33 सालों से कभी मिलकर, कभी अलग होकर, कभी फिर से साथ आकर सरकार चलाने वाले लालू यादव और नीतीश कुमार जब 40 साल तक बिहार पर राज करने वाले कांग्रेस से हाथ मिलाने जा रहे हैं या यूं कहें की बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार देश के सभी विपक्षी दलों से यह अपील करने जा रहे हैं कि जिस कांग्रेस के खिलाफ स्वयं उन्होंने और लालू यादव ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की थी, उसी कांग्रेस को अपना नेता मानते हुए सारे दल लोकसभा चुनाव की तैयारी करें।

ऐसे में बिहार और बिहारियों का इतना हक तो बनता ही है कि उनकी धरती पर पटना आकर देश की राजनीति को बदलने की कोशिश करने वाले दल राज्य की जनता को इतना तो बताएं की अगर दिल्ली में सरकार बनाने की उनकी मुहिम कामयाब होती है तो इसका फायदा बिहार को और बिहार की जनता को कैसे मिलेगा ? बल्कि एक मायने में देखा जाए तो विपक्षी गठबंधन में शामिल होने वाले सभी दलों को अपने-अपने राज्य की जनता को यह जरूर बताना चाहिए कि उनके मोर्चे के जीतने पर जो सरकार बनेगी वो कितने महीने तक चल पाएगी और उस सरकार से उनकी राज्य की जनता को क्या-क्या लाभ मिलने जा रहा है ?

बेहतर तो यह होगा कि मोदी विरोध के नाम पर एकत्र होने वाले ये दल या तो 1977 के जनता पार्टी के उदाहरण पर चलते हुए आपस में विलय कर एक नया राजनीतिक दल बना लें ताकि हर सीट पर भाजपा के खिलाफ एक उम्मीदवार मैदान में उतारा जा सके या फिर राष्ट्रीय स्तर पर एक साझा घोषणापत्र जारी करने के साथ ही हर राज्य के लिए भी अलग-अलग घोषणापत्र जारी कर अपने विजन को स्पष्ट करें ताकि जनता को चुनने में सहुलियत हो सके।

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