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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

सेंगोल के सांस्कृतिक निहितार्थ और इसका महत्व

नए संसद भवन के उद्घाटन के बाद सबसे अधिक चर्चा का विषय इस समय सेंगोल अर्थात राजदंड है। बीजेपी ने कहा है कि जिस समय 1947 में 15 अगस्त को सत्ता हस्तांतरण हुआ था उस समय भी इस छड़ी को तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को प्रदान किया गया था। जिन्होंने इसे इलाहाबाद स्थित आनंद भवन में ले जाकर रखवा दिया गया था। इस छड़ी को देश के पहले प्रधानमंत्री ने अपने लिए दिया गया एक उपहार माना था।
वैसे भारतवर्ष में राजदंड को प्रदान करने की व्यवस्था प्राचीन काल से रही है। राजदंड एक प्रकार से इस बात का प्रतीक है कि राजा दंड देते समय किसी प्रकार का भी पक्षपात नहीं करेगा और पूर्णतया न्यायशील होकर अपने आपको ईश्वर का प्रतिनिधि मानकर शुद्ध अंतःकरण से लोगों के बीच न्याय करेगा। जिस प्रकार ईश्वर सभी को उसके किए कर्मों का उचित फल बिना पक्षपात देते हैं, उसी प्रकार का आचरण राजा करेगा। राज्यारोहण के पश्चात राजा राजदंड लेकर राज्यसिंहासन पर बैठता था, उस समय राजा कहता था कि अब मैं राजा हूँ। अतः ‘अदण्ड्योऽस्मि, अदण्ड्योऽस्मि , अदण्ड्योऽस्मि अर्थात मैं अदण्ड्य हूँ, मैं अदण्ड्य हूँ , मैं अदण्ड्य हूँ अर्थात मुझे अब कोई दण्ड नहीं दे सकता, मैं दंड से ऊपर हो गया हूं।) वास्तव में राजा से ऐसे शब्द उसके अहंकार को प्रकट कराते हुए बुलवाए जाते थे। इसके पश्चात उसके अहंकार को मारने के लिए उपस्थित ऋषि मंडल में से एक सर्वाधिक विद्वान ऋषि आगे आता था जिसके हाथ में एक छोटा, पतला सा पलाश का डण्डा रहता था। वह ऋषि उस राजा के अहंकार को मारने के दृष्टिकोण से उस पलाश के डंडे से राजा पर तीन बार प्रहार करने का नाटक करता हुआ कहता था कि ‘राजा ! आपके लिए इन क्षणों में ‘अदण्ड्योऽस्मि अदण्ड्योऽस्मि’ कहना पूर्णतया धर्म विरुद्ध है। तुम्हारा यह आचरण तुम्हारे अहंकार को प्रकट करता है। याद रखना कि न्याय करते समय किसी भी प्रकार का अहंकार रखना उचित नहीं होता। अहंकाराभिव्यक्ति के वशीभूत होकर व्यक्ति न्याय के स्थान पर अन्याय कर सकता है। अतः अपने आपको दंड से ऊपर मत मानो और मेरे साथ बोलो कि ‘दण्ड्योऽसि दण्ड्योऽसि दण्ड्योऽसि’ अर्थात तुझे भी दण्डित किया जा सकता है। मैं दंड से ऊपर नहीं हूं। धर्म मेरे ऊपर शासन करता है। मैं धर्म की पवित्रता से, नैतिकता से, मर्यादा से बंधा हुआ हूं और ईश्वरीय व्यवस्था का एक अंश होकर मैं सब प्राणियों के मध्य न्यायपूर्ण व्यवहार करूंगा।
राजा का यह राजदंड प्रत्येक उस व्यक्ति के लिए जो धर्म की व्यवस्था का पालन करता था, अत्यंत हितकारी होता था। जो व्यक्ति धर्म का पालन नहीं करता था अधर्म ,अनीति और अन्याय से लोगों का शोषण करता था, उनके लिए यह राजदंड वज्रपात बन जाता था। इसका दूसरा अर्थ यही था कि यह राज्य के शांति प्रिय नागरिकों को सुरक्षा देगा और अशांतिकारक तत्वों को उचित दंड देकर उनका विनाश करेगा।
भारतवर्ष में जब से राज्यव्यवस्था कार्य कर रही है, उसी समय से राजदंड की व्यवस्था का विधान कार्यरत रहा है। महाभारत, शान्तिपर्व (अध्याय 15) में आया है:-

दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति ।
दण्डः सुप्तेषु जागर्र्ति दण्डं धर्म विदुर्बुधाः ॥2॥

भावार्थः आपराधिक प्रवृत्ति के उग्रवादी लोगों को नियंत्रण में रखने के लिए दण्ड की व्यवस्था हर प्रभावी एवं सफल शासकीय तंत्र का आवश्यक अंग होती है । इस दंड के कारण ही प्रजा जन शासित ,अनुशासित और मर्यादित रहकर एक-दूसरे के अधिकारों का सम्मान करते हैं। दंड से ही प्रजा की सुरक्षा होती है। रात्रि काल में जब सब सो जाते हैं तब भी दंड जागा हुआ रहता है। इस दंड के कारण ही सब लोग अपने आपको सुरक्षित समझ कर सोते हैं। इस मर्यादा को ही विद्वान लोग धर्म कहते हैं। महाभारतकार आगे कहता है कि :-

दण्डश्चेन्न भवेल्लोके विनश्येयुरिमाः प्रजाः ।
जले मत्स्यानिवाभक्षन् दुर्बलान् बलवत्तराः ॥

  भावार्थः यदि दण्ड न रहे, अर्थात् दण्ड की प्रभावी व्यवस्था न हो, तो प्रजा का विनाश निश्चित है । जिस प्रकार पानी में पलने वाली छोटी मछली का भक्षण बड़ी मछली कर डालती है उसी प्रकार अपेक्षया अधिक बलवान् व्यक्ति दुर्बलों का ‘भक्षण’ कर डालेंगे ।

किसी भी दुर्बल शासक के रहते हुए राष्ट्र में शांति नहीं हो सकती। संसार में बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो धर्म की परिभाषा को जानते हैं और उसकी व्यवस्था में अपने आपको समर्पित कर स्वयं ही अपने ऊपर शासन करते हैं। वास्तव में लोकतंत्र जनता का जनता के द्वारा जनता के लिए शासन नहीं है बल्कि लोकतंत्र वह है जिसमें व्यक्ति अपने ऊपर, अपने आप ही अपने ही द्वारा शासन करता है। लोकतंत्र का अंतिम उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति को भौतिक विकास के समान अवसर उपलब्ध कराना ही नहीं है बल्कि प्रत्येक व्यक्ति को आत्मिक उन्नति के समान अवसर उपलब्ध करा कर एक को एक दूसरे के लिए सहारा बना देना है। इस राजदंड का तीसरा अर्थ यही था कि व्यक्ति धर्म के दंड से अथवा धर्म की व्यवस्था से और भौतिक जगत में राज्यव्यवस्था से अपने आपको सुरक्षित अनुभव करते हुए भयभीत भी समझे अर्थात धर्म और राज्य व्यवस्था के अनुकूल अपने आचरण को बनाए रखे, अन्यथा यह समझ ले कि यह दंड उसका सर्वनाश कर देगा।
इस राजदंड का चौथा अर्थ राष्ट्र में भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था देना भी था। प्रत्येक कर्मचारी और अधिकारी राजा के पास रखे राजदंड से अपने आप को सुरक्षित तभी मानता था जब वह भ्रष्टाचार मुक्त शासन देने के लिए अपने आपको कृतसंकल्प पाता था। यदि राजकीय कर्मचारी और अधिकारी भ्रष्टाचार में संलिप्त पाए जाते हैं तो उनका उपचार राजदंड से किया जा सकता है, ऐसा भय उनके भीतर रहना चाहिए।
भारत लोकतंत्र की जननी है। हमारा लोकतंत्र हमारे राजतंत्र में समाहित रहता था या कहिए कि हमारा राजतंत्र लोकतंत्र से सना हुआ होता था। शासन में ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ, महामेधासंपन्न, जितेंद्रिय लोगों को अधिमान दिया जाता था। वे राष्ट्र में अपने ही जैसे लोगों का निर्माण करने के लिए अपने आपको राजदंड से बंधा हुआ मानते थे। आज जो लोग राजदंड की इस व्यवस्था को सामंती व्यवस्था का प्रतीक कहकर इसकी आलोचना कर रहे हैं उन्हें इसके औचित्य और महत्व का ज्ञान नहीं है। वास्तव में शासक शासक होता है और उसे मर्यादा में बांधे रखने के लिए राजदंड की व्यवस्था का पुनः नितांत आवश्यक होता है। इसमें राज शब्द राजशाही का प्रतीक नहीं है। यह बिल्कुल वैसे ही है जैसे राजनीति में राज शब्द राजतंत्र का प्रतीक नहीं है। यदि आज राजनीति शब्द को लोकतंत्र स्वीकार कर चुका है तो राजदंड को भी लोकतंत्र को स्वीकार करना चाहिए। अपनी शुचिता, पवित्रता और पारदर्शिता को बनाए रखने के लिए लोकतंत्र को इतना उदार होना चाहिए कि वह बीते हुए कल की अच्छी बातों को लेने का स्वागत करना जानता हो।
लोकतंत्र शुद्ध हवा को आने से रोकने वाला नहीं होना चाहिए। हमें ध्यान रखना चाहिए कि हमारा लोकतंत्र ब्रिटिश लोकतंत्र का अनुचर नहीं हो सकता। इसके साथ ही रामायण, महाभारत जैसे ग्रंथों में वर्णित लोकतंत्र की उत्कृष्ट व्यवस्था को अंगीकार करना चाहिए।
आज जब हम अपनी आजादी के 75 वर्ष पूर्ण होने के उपरांत अमृत महोत्सव मना रहे हैं तो इसमें तेजी से उस दुर्गंधपूर्ण व्यवस्था को हमें दूर करना चाहिए जिसने लोगों की नाक में दम कर दिया है और देश के शासक वर्ग को अहंकारी बना दिया है।

  • डॉ राकेश कुमार आर्य
    (लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं।)

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