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इतिहास के पन्नों से

इब्नबतूता के ब्यौरों में देखें दक्षिण भारत में काफिरों का कत्लेआम- भारत में इस्लाम

-विजय मनोहर तिवारी

यह दक्षिण भारत के काफिरों की करुण कथा है। इब्नबतूता माबर पहुँचा है। यह वर्तमान तमिलनाडु में चेन्नई के आसपास का इलाका है। अब यह मोहम्मद तुगलक के कब्जे में है। तुगलक की तरफ से स्थानीय कब्जेदार शरीफ जलालुद्दीन एहसन शाह ने बगावत कर दी और पाँच साल तक माबर पर राज किया। फिर उसका कत्ल हो गया। अमीर अलाउद्दीन उदैजी तख्त पर बैठा। एक साल काबिज रहकर वह आसपास के हिंदू काफिर राज्यों पर लूटपाट करने के लिए निकलता है। इब्नबतूता वहीं से बता रहा है–
“वह काफिरों से जंग पर निकला और बेहिसाब धन-संपत्ति लेकर लौटा। दूसरे साल उसने उन पर फिर चढ़ाई की और उन्हें हराकर बहुतों को कत्ल कर डाला। जिस दिन कत्लेआम चल रहा था, उसने पानी पीने के लिए अपना सिरस्त्राण हटाया, किसी अज्ञात दिशा से एक बाण आकर उसे लगा और फौरन उसकी मौत हो गई।”
आपसी लड़ाई और खूनखराबा दिल्ली में 125 साल से जारी था, तख्त पर बैठने के लिए एक-दूसरे की मारकाट दक्षिण भारत में पैर जमाने में लगे इस्लाम के इन झंडाबरदारों की यहाँ भी जारी थी। माबर में भी स्थानीय कब्जेदार अलाउद्दीन उदैजी के मारे जाने के बाद उसका जमाता कुतबुद्दीन तख्त पर बैठा। 40 दिन में वह भी मार डाला गया। अब गयासुद्दीन दामगानी नाम का आदमी ऊपर आया। उसने सुलतान जलालुद्दीन एहसन शाह की बेटी से शादी की थी। इब्नबतूता ने जलालुद्दीन की बहन से दिल्ली में रिश्ता किया था।
वे इस समय मदुरई के आसपास थे। गयासुद्दीन दामगानी मालद्वीप तक जहाजों में अपने फौजियों को भेजने की तैयारी में है। मालद्वीप की मलिका के लिए बेशकीमती तोहफे और गरीबों में बांटने के लिए सामान से भरी तीन नावें तय कर दीं।
इब्नबतूता को खास काम मिला है। वह मालद्वीप की मलिका की बहन से गयासुद्दीन के रिश्ते को जोड़ेगा। लेकिन तीन महीने की इस समुद्री यात्रा की योजना पर उसके समुद्री सेनानायक ने नामुमकिन बताकर पानी फेर दिया। अब गयासुद्दीन इब्नबतूता को पट्‌टन जाने को कहता है और वे इस लड़ाई के बाद मदुरई में मिलने वाले हैं।
अब बेकसूर काफिरों के कत्लेआम के दृश्य हैं। इब्नबतूता चश्मदीद है। सब कुछ उसके सामने हो रहा है। सुनिए वह क्या बता रहा है- “जहाँ से हमें निकलना था वहाँ घना जंगल था। वहाँ बांस बहुत थे। सुलतान ने सबको हाथ में कुल्हाड़ी लेकर चलने को कहा। लोग सुबह से दोपहर तक पेड़ काटते रहते। फिर एक-एक दल खाना खाता और फिर कटाई शुरू होती। रात तक पेड़ कटते।
जो काफिर सेना को जंगल में मिलते, वे बंदी बना लिए जाते थे। एक लकड़ी, जिसके दोनों सिरों पर तेज नोक निकाल ली जाती थी, उन बंदियों के कंधों पर रख दी जाती। वे उसे उठाकर ले जाते। हर बंदी के साथ उसके औरत और बच्चे भी होते। वे इसी दशा में शिविर तक लाए जाते।
वे लाेग शिविर के चारों तरफ लकड़ी का एक कठघरा बना लेते। सुलतान के शिविर के चारों ओर एक दूसरा कठघरा बनाया जाता। मुख्य कठघरे के बाहर पत्थर के चबूतरों पर लोग आग जलाकर बैठते। पैदल सैनिक बाँस की पतली लकड़ियों के गट्‌ठे हाथ में लिए खड़े रहते। जब रात में कोई हमला करने आता तो यही लकड़ी जलाकर रोशनी की जाती और फिर सवार दुश्मन की खोज में निकल पड़ते।”
इब्नबतूता दुनिया घूमकर दिल्ली में रहकर और समूचे उत्तर भारत को नापते हुए दक्षिण में है। लेकिन मुस्लिम हुक्मरानों की बेरहमी देखकर हैरान है। वह लिखता है- “दूसरे दिन सुबह जो लोग पिछले दिन बंदी बनाकर लाए गए थे, चार हिस्सों में बाँट दिए जाते। हर एक दल को कठघरे के एक-एक दरवाज़े पर लाया जाता और हर दरवाज़े के सामने वह नोकदार लकड़ी, जिसे वे लाते थे, गाड़ दी जाती।
हर एक बंदी को लकड़ी की उसी नोक पर रखकर लकड़ी उसके शरीर के आरपार कर दी जाती। उनकी औरतों के बाल उसकी लकड़ी से बांध दिए जाते और उन्हें उनके बच्चों के साथ कत्ल कर दिया जाता। उन्हें उसी हालत में छोड़ दिया जाता। इसके बाद वे लोग जंगल में दूसरे पेड़ काटने में लग जाते। दुश्मनों के दूसरे दल के साथ भी जो बंदी बनाकर लाए जाते, यही सुलूक किया जाता। यह बहुत ही घोर पाप है। मैंने किसी बादशाह को इस तरह का पाप करते हुए नहीं देखा।”
दक्षिण में भी दिल्ली जैसा अत्याचार
दिल्ली में हम तुगलक के महल दारे-सरा के बाहर खूनी चबूतरों पर कत्ल का कारोबार हम देख चुके हैं। वही दृश्य दूर दक्षिण में अपने आसपास के इलाकों को लूट रहे स्थानीय मुस्लिम सुलतान के शिविर के बाहर है। नुकीली लकड़ियों से मारे जा रहे काफिरों को उनका कुसूर भी नहीं मालूम। कोई इल्जाम नहीं। कोई गुनाह नहीं। बस अजनबी इलाके में बाहरी लुटेरों की एक ताकतवर मुहिम, धरपकड़ और फिर कत्ल, कत्ल और कत्ल!
वे मरे-अधमरे हाल में वहीं खून से लथपथ छोड़ दिए जा रहे हैं। अब जंगली परभक्षी और चील-गिद्ध उन्हें अपना निवाला बनाएँगे। रास्ता चलते लोगों को पीढ़ियों तक अल्लाहो-अकबर के नारे याद रहने वाले हैं। मुस्लिम फौजों के गुजरने की रक्तरंजित यादें। इस तरह खून से सनी कहानियाँ भारत की याददाश्त में दर्ज होती रहीं। हर कोने में। उधर सिंध, पंजाब, बंगाल में, दिल्ली में और इधर माबर यानी दूर दक्षिण में।
ठहरिए, इब्नबतूता को कुछ याद आया है- “एक दिन काजी सुलतान के दाईं तरफ बैठा था। मैं बाईं तरफ था। हम लोग खाना खा रहे थे। एक काफिर, उसकी पत्नी और सात साल के उनके बेटे को पेश किया गया। सुलतान ने जल्लादों को उनका कत्ल करने का इशारा करते हुए हुक्म दिया कि औरत और बच्चे को भी।
फौरन तीनों के बारी-बारी से सिर काट दिए गए। मैंने अपना मुँह दूसरी तरफ फेर लिया। जब मैं वहाँ से उठा तो तीनों के कटे हुए सिर वहीं जमीन पर पड़े थे। …एक और दिन का वाकया है। मैं सुलतान के साथ था। एक काफिर लाया गया। सुलतान ने कुछ कहा, जो मेरी समझ में नहीं आया। इस पर जल्लादों ने तुरंत तलवारें तान लीं।
मैं उठा और चलने लगा। उसने मुझसे पूछा कि कहाँ जा रहे हो? मैंने जवाब दिया कि नमाज़ पढ़ने जा रहा हूँ। वह समझ गया और हँसने लगा। फिर उसने हुक्म दिया कि काफिर के हाथ-पाँव काट दिए जाएँ। जब मैं लौटा तो वह खून और धूल में लोट रहे थे।“
काफिरों से जंग का विस्तृत ब्यौरा
गयासुद्दीन दामगानी ने माबर के स्थानीय काफिरों के साथ एक जंग की। इब्नबतूता की डायरी में सब दर्ज है–
“माबर से सटा किसी बल्लालदेव काफिर हिंदू का राज्य था। उसकी सेना में 1 लाख से ज्यादा सैनिक थे। इनके अलावा 20,000 मुसलमान थे, जो भगोड़े गुलाम थे। वे माबर पर चढ़ाई करने आया। यहाँ 6,000 मुसलमान थे। इनमें आधे ही लड़ाई में काम के थे।
किसी कब्बान नाम के शहर के बाहर बल्लाल और इनका आमना-सामना हुआ। काफिरों ने मुसलमानों को बुरी तरह हराया। वे राजधानी मदुरई भाग निकले। काफिर राजा ने कुब्बान के पास अपने शिविर लगाए और 10 महीने तक घेरे रहा।
काफिर राजा ने उनसे किला छोड़ने को कहा। उनके पास 14 दिनों की ही रसद बची थी। उन लोगों ने कहा कि सुलतान से इजाजत लेनी होगी। गयासुद्दीन के पास वे अपना हाल लिखकर भेजते हैं, जिसे पढ़कर वहाँ लोग रोने लगते हैं। कहते हैं कि अल्लाह के लिए हम अपनी जान दे देंगे क्योंकि यदि काफिर उस शहर पर कब्ज़ा जमा लेंगे तो फिर हमें भी घेर लेंगे। इसलिए तलवार के साए में जान देना ही बेहतर है।
उन्होंने अपनी पगड़ियाँ घोड़ों की गर्दनों में बांध दीं। यह लड़ाई में मरने का संकल्प था। गयासुद्दीन बीच में था। एक तरफ सैफुद्दीन और दूसरी तरफ मलिक मुहम्मद सिलहदार। दोपहर के भोजन के बाद 6,000 की संख्या में ये लोग असावधान दुश्मनों पर टूट पड़े।”
हम देखते हैं कि इस्लाम के इन झंडाबरदारों ने हर कहीं एक जैसी बेरहमी और धोखे से काम किया। दिल दहलाने वाली क्रूरता के साथ काफिरों के इलाकों में दाखिल होना, लूटपाट और आतंक के दम पर कब्ज़े जमाना। एक बार कब्ज़ा जमाकर सबसे पहले रेवेन्यू सिस्टम पर हक कायम करना। उसकी आमदनी से अपनी हुकूमत करना।
इस्लामी राज्य की स्थापना का काम इतने भर से खत्म नहीं होता था। वे जहाँ भी काबिज होते, आसपास किसी न किसी प्राचीन हिंदू राज्य की सरहद होती ही थी। अब काफिरों के इन नए इलाकों में लगातार लूटपाट और कत्लेआम का अंतहीन दौर शुरू हो जाता। काफिर राजा आपस में हमेशा से लड़ते रहे थे लेकिन इन इस्लामी लड़ाकों के तौर-तरीके उनके लिए समझ के परे थे। वे क्रूरता की कभी न भूलने वाली मिसालें कायम करते थे। इंसानी खून उनके लिए पानी से भी सस्ता था। वे कहीं भी बहा सकते थे। और अगर सामने काफिर हों तो उनका इस्लाम दोगुने जोश से हमलावर होता था।
काफिर राजा का कत्ल
इब्नबतूता इस कहानी में आगे लिखता है- “काफिरों ने उन्हें चाेर समझा। वे बिना किसी तैयारी के बाहर आकर लड़ने लगे। तभी गयासुद्दीन भी वहीं आ पहुँचा। काफिर बुरी तरह हारे। राजा की उम्र 80 साल थी। उसने घोड़े पर सवार होने की कोशिश की लेकिन गयासुद्दीन के भतीजे नासिरुद्दीन ने उसे पकड़ लिया। वह उसे नहीं पहचानता था। इसलिए वह उसे कत्ल करने ही वाला था कि उसके एक गुलाम ने बताया कि यह तो राजा है।
नासिरुद्दीन उसे बंदी बनाकर अपने चाचा के पास लेकर आया। वह उससे उस समय तक सही बर्ताव करता रहा और छोड़ने का आश्वासन देता रहा जब तक कि उसने उसकी धन-दौलत, हाथी-घोड़े हासिल नहीं कर लिए। सारी दौलत छीन लेने के बाद राजा को कत्ल करा दिया गया। कत्ल के बाद उसकी खाल खिंचवाई गई और उसमें भूसा भरवाकर मदुरई की दीवार पर लटकवा दी गई। मैंने भी उसे वहीं लटके हुए देखा था।“
बेहिसाब लूट और हराम की दौलत के बूते इन तथाकथित सुलतानों ने हिंदुस्तान को अपनी अय्याशी का एक रौनकदार अड्डा बना दिया था। गयासुद्दीन ने काफिरों के राजा को तुगलकी नृशंसता से ही मारा। अब इस कामयाबी के बाद अय्याशी अनिवार्य थी।
एक योगी ने गयासुद्दीन को मैथुन शक्ति बढ़ाने की गाेलियाँ तैयार करके दीं। उनमें कुछ अंश लोहे के चूर्ण का भी था और सुलतान तय खुराक से ज्यादा खा गया। वह बीमार पड़ गया। उसी हालत में वह पट्‌टन पहुँचा। वहीं उसकी मौत हो गई।
अब उसका भतीजा नासिरुद्दीन तख्त पर बैठता है। उसने अपनी फूफी के बेटे को कत्ल कराया, जिसके साथ सुलतान गयासुद्दीन की बेटी का विवाह हुआ था। उसकी विधवा से खुद शादी कर ली। एक के बाद एक कई कत्ल हुए। जैसा कि हम दिल्ली से लखनौती तक देखते आए हैं।
नाकाबिलों के हाथ लगी लूट की हुकूमत में हर जगह यही हो रहा था। भारत भूमि हर जगह खून से लथपथ थी। इस्लाम के नाम पर काबिज ये लुटेरे आपस में एक-दूसरे का खून तो बहा ही रहे थे। सामने काफिर को पाकर सब इकट्‌ठे होकर उनके कत्लेआम कर रहे थे। दक्षिण का यह भूभाग दिल्ली से बहुत दूर था लेकिन खूनखराबे से अछूता नहीं था। इस्लाम ने ऐसे ही अपना परिचय यहाँ कराया।
बंगाल में गुलामों की मंडी
इब्नबतूता दक्षिण के इन दृश्यों को दिखाता हुआ मालद्वीप पहुँचता है, जहाँ वह अपनी पत्नी और बेटे से मुलाकात करता है। फिर 43 दिन की समुद्री यात्रा के बाद बंगाल पहुँचता है। वह बंगाल के बाज़ार में हर चीज़ दुनिया में सबसे सस्ती पाकर हैरान है।
एक खूबसूरत कनीज सोने के एक दीनार में उपलब्ध है, जो उसके अपने देश मोरक्को के ढाई दीनार के बराबर है। इस कीमत पर रंगीन मिजाज इब्नबतूता आशूरा नाम की एक बेहद खूबसूरत लड़की खरीद लेता है। उसके एक साथी ने लूलू नाम का एक नौजवान गुलाम सोने के दो दीनार में खरीदा है।
बंगाल में इस खुलासे से पहली बार हमें यह पता चलता है कि दिल्ली की तरह यहाँ भी गुलामों के बाज़ार सजे थे। लूट के माल में लाई गई लड़कियाँ और लड़के महज सोने के एक दीनार में आप छाँटकर ले सकते थे।
हम नहीं कह सकते थे कि इंसानों को जिंदा खरीद-बेच रहे सारे मुसलमान ही होंगे। मुमकिन है कि लगातार लुट-पिटकर बरबाद कर दिए गए कुछ काफिर ही अपने मुश्किल समय में अपने ही परिवार के कुछ बेचने योग्य बच्चों को अच्छे दामों की उम्मीद में गुलामों के इन बाजारों में लेकर आते होंगे। हो सकता है मुनाफे के इस तेजी से फैलते कारोबार में काफिर समुदाय के कुछ लालची कारोबारी गुलाम लड़कियों-बच्चों की खरीद-फरोख्त में कमीशनखोरी से फायदे बटोरने में लग गए हों।
ऐसा भी नहीं है कि इन बाज़ारों में सिर्फ हिंदू, बौद्ध और जैन परिवारों की लड़कियाँ-बच्चे ही बिकने आते हों। तुगलक ने सबको बेरहमी से काटा। उसने जितने मुसलमानों पर जुल्म ढाए, उसके पहले किसी के समय ऐसा नहीं हुआ था। उसके हाथों बुरी तरह बरबाद हुए लोगों में सब बराबर थे।
हो सकता है कि इन बाजारों में बिकने के लिए शुरू में लूट में लाई गईं काफिर औरतें-बच्चे आते हों। लेकिन जैसे-जैसे धर्मांतरण तेज़ होता गया होगा, यहाँ धर्मांतरित गरीब मुस्लिम भी दो पैसे के लिए अपने जिगर के टुकड़े बेचने को मजबूर हुए हों।
गुलामों के कारोबार में ये सारे तबके खरीदने-बेचने और बिकने वाले एक साथ भी हो सकते हैं। सोने के एक दीनार में खरीदी गई खूबसूरत आशूरा के साथ खड़ा हुआ इब्नबतूता हैरानी से बता रहा है कि मैंने बंगाल वालों को यह कहते हुए सुना कि इस समय उनके यहाँ महंगाई है! आशूरा के नाम से लगता है कि वह मुस्लिम है।
काफिरों की उदारता से इब्नबतूता हैरत में
काफिरों का हाल देखकर इब्नबतूता हिंदुस्तान के बारे में सोचने लगता है। वह मुसलमान और काफिरों के बारे में ख्याल करता है। उसे एक वाकया याद आया। वह माबर में गयासुद्दीन दामगानी के शिविर में पहुँचा था। गयासुद्दीन ने उसके स्वागत के लिए हाजिब भेजे थे। वह उस दिन का प्रसंग याद करते हुए बताता है–
“सारे हिंदुस्तान में यह रिवाज है कि कोई भी सुलतान की सेवा में बिना मोजे पहने जा नहीं सकता। लेकिन मेरे पास मोजे नहीं थे। एक काफिर ने मुझे मोजे दिए। हालाँकि वहाँ बहुत से मुसलमान मौजूद थे। मुझे उन मुसलमानों की तुलना में काफिर को इतना उदार देखकर हैरत हुई।“
अब वह उस जगह पर जाता है, जहाँ गंगा समुद्र में मिलती है। उसने देखा कि यहाँ हिंदू तीर्थयात्री दूर-दूर से आते हैं। इन दिनों बंगाल में कोई फखरुद्दीन नाम का सुलतान काबिज है। हम बंगाल में बख्तियार खिलजी की मौत के बाद मिनहाज सिराज के साथ दिल्ली चले आए थे, लेकिन यहाँ लखनौती पर एक के बाद दूसरे मुस्लिम कब्जेदार आते-जाते रहे।
इब्नबतूता यहाँ बल्बन के बेटे नासिरुद्दीन और उसके बाद के सुलतानों के ब्यौरे दर्ज करता है। वही उठापटक। वही खूनखराबा। कटे हुए सिर। लूटपाट। मारकाट। गुलामों के बाज़ार। इस्लाम का सितारा वाकई बुलंदी पर था।

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