इधर हम सभी नोटबंदी और उत्तर प्रदेश में सपा की नौटंकी देखने में व्यस्त रहे और उधर जम्मू कश्मीर की विधानसभा में नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस ने एक बार पुन: राष्ट्रगान का अपमान कर डाला। इधर हम पांच राज्यों के चुनावों की तैयारियां कर रहे हैं और उधर जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के सुर बदलते ही जा रहे हैं। इतना ही नहीं, उनके पिता फारूक अब्दुल्ला भी आतंकवादियों की पीठ थपथपाते नजर आ रहे हैं। वैसे ये दोनों जो कुछ भी बोल रहे हैं वह अप्रत्याशित नहीं है, ऐसा बोलना और अलगाववादियों को समर्थन देना इनका पारिवारिक संस्कार है। इनके पूर्वज शेख अब्दुल्ला भी आजीवन इसी डगर पर चलते रहे थे और अपने राष्ट्रविरोधी कार्यों के लिए समय-समय पर जेल की हवा भी खाते रहे थे। यह सच है कि पारिवारिक संस्कार व्यक्ति का इतनी सरलता से पीछा नहीं छोड़ पाता है।
भाजपा या आरएसएस पर या किसी भी हिंदूवादी राजनीतिक संगठन पर अक्सर यह आरोप लगता रहा है कि ये संगठन वर्तमान राष्ट्रगान के और तिरंगे के रखने के पक्षधर नहीं थे। सीधे शब्दों में ये आरोप सावरकरजी की हिंदू महासभा पर लगता है, और यह आरोप आरोप ही नहीं है अपितु सच भी है कि सावरकर जी वर्तमान राष्ट्रगान और राष्ट्रध्वज को अपनाने के पक्षधर नहीं थे। उनके अपने तर्क थे और उन तर्कों में सत्य ही सत्य था। आज उनकी विरासत की विचारधारा को जो संगठन लेकर चल रहे हैं वे उनके तर्कों को सुंदर ढंग से प्रस्तुत कर सकते हैं।
पर आज हम इस विषय पर विचार नहीं कर रहे हैं कि राष्ट्रगान और तिरंगे को बनाने वाले या अपनाने वाले कितने गलत या कितने सही थे और ना ही इस बात पर विचार किया जा रहा है कि उनका विरोध करने वाले कितने गलत या कितने सही थे? हम इतिहास के अतीत के पन्नों पर जाकर नही खेलना चाहते, और ना उन्हें खोलना चाहते। हम वर्तमान में खड़े होकर सोचें तो पता चलता है कि अपने राष्ट्रगान और राष्ट्रध्वज से असहमत होकर भी ये राष्ट्रवादी संगठन या राजनीतिक दल (जिन्हें कुछ अज्ञानी लोग हिंदूवादी संगठन कहते हैं) ही हैं जो अपने राष्ट्रीय प्रतीकों का सर्वाधिक सम्मान करते हैं। ठीक है राष्ट्रगान और राष्ट्रध्वज पर उनका विरोध रहा था-पर आज जब उन्हें स्वीकार कर लिया गया है तो आज वह विरोध नहीं है। यह एक जमीनी सच्चाई है कि राष्ट्रगान और राष्ट्रध्वज का अपमान करने वाले भी वही लोग हैं जो इन्हे अपनाने में धर्मनिरपेक्षता की रक्षा होते देखने के उस समय तर्क दे रहे थे। उनका विरोध केवल इसलिए है कि आज उनके साथ राष्ट्रीयता का प्रश्न जुड़ा है।
यह कितने आश्चर्य की बात है कि जिन लोगों ने वर्तमान राष्ट्रगान और राष्ट्रध्वज को अपनाया वही उनका अपमान करें और फिर ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’ वाले मुहावरे को चरितार्थ करते हुए आरएसएस या हिंदू महासभा पर यह आरोप लगायें कि तुम तो इनके विरोधी थे और तुमने ही इनको लागू कराने वाले गांधी की हत्या की थी।
यह कितनी मूर्खतापूर्ण बात है कि जिन गांधीजी ने वर्तमान राष्ट्रगान और राष्ट्रध्वज को देश के लिए लागू कराया उन्हें उनके ही मानसपुत्र फाड़ें या जलायें या उनका अपमान करें? इससे तो यही स्पष्ट होता है कि गांधी के नश्वर शरीर को चाहे गोडसे ने समाप्त कर दिया था पर उनके यश रूपी शरीर को तो उनके ही मानसपुत्र समाप्त कर रहे हैं। जिसे जम्मू कश्मीर की विधानसभा में हाल ही में राष्ट्रगान का अपमान करने की घटना में घटित होते देखा गया है। नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस को चाहिए कि वे गांधी जी विरासत को संभालकर रखें और उसे तार-तार करने से बाज आयें।
हमारे राष्ट्रीय चरित्र का यह एक घोर निराशापूर्ण पक्ष है कि हम अपनी गलतियों या दोषों को स्वीकार करने या सुधारने के स्थान पर उनकी वकालत करनी आरंभ कर देते हैं और दूसरों को उनकी कमियां बताने या गिनाने लगते हैं। इससे तो यही पता चलता है कि कोई भी अपनी गलती को सुधारने के लिए तैयार नहीं है। सयारों के राज में बेसुरे बोल ही सुनने को मिला करते हैं, वहां विद्वत्तापूर्ण तर्क और शास्त्रार्थों की परंपरा को खोजना चील के घोंसले में मांस ढूंढऩे के समान होता है। खोखले दरख्तों से यदि तूफान के समय चिपटोगे तो मरोगे ही, बचना कतई भी संभव नहीं है।
लोगों की भावनाओं को उकसाकर उनसे अपना राजनीतिक कद खड़ा करते-करते कई ‘शेख अब्दुल्ला’ इस देश से चले गये, पर हम हैं कि इन ‘अब्दुल्लाओं’ को इनके जाने के बाद ‘शेरे कश्मीर’ कहकर सम्मानित करते जाते हैं, जबकि वे कश्मीर के चमन में जीते जी आग लगाते रहे थे। ऐसे में इन अब्दुल्लाओं के वारिस तो पैदा होते ही रहेंगे क्योंकि उन्हें पता है कि तुम जितनी आग लगाओगे ये हिंदुस्तान तुम्हें उतना ही ‘शेरे कश्मीर’ कहकर पूजेगा। क्योंकिये तो देश ही ऐसा है, जहां ‘पत्थर’ ही पूजे जाते हैं। लोग चेतन को भूल जाते हैं अर्थात वास्तविक शहीदों को भूल जाते हैं और आग लगाने वालों को याद रखते हैं। उमर अब्दुल्ला लगता है सही रास्ते पर हैं उन्हें ‘शेरे कश्मीर’ जो बनना है? पर उन्हें यह याद रखना होगा कि आज का हिंदुस्तान बदल चुका है और नीयत की खोट को पहचानने लगा है, अब आग लगाने वालों की खैर नहीं। मूर्खताओं के दिन लद चुके हैं। इसलिए संभलकर चलें तो ही अच्छा है। इस देश का अधिकांश मुसलमान भी जानता है कि सच क्या है और झूठ क्या है?

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