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हमारे क्रांतिकारी / महापुरुष

महर्षि दयानंद की 200 की जयंती के अवसर पर विशेष – भारत के क्रांतिकारी आंदोलन में महर्षि दयानंद का योगदान

जब-जब महर्षि दयानंद का नाम आता है तो हमें एक ऐसे महान व्यक्तित्व का बोध होता है जो भारतवर्ष में समग्र क्रांति का अग्रदूत था। जिसने सोते हुए भारत को जगाया और वेदों की ओर लौटने का संदेश देकर भारत की चेतना को बलवती करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जिसके आने से भारत सचेत, सजग और जागरूक होकर आगे बढ़ा और गुलामी के जुए को परे फेंककर मुक्ति अर्थात मोक्ष का उपासक भारत एक दिन मुक्ति अर्थात् स्वतंत्रता को प्राप्त कर आनंदोत्सव मनाने लगा।

दयानंद का प्रारंभिक जीवन

स्वामी दयानंद जी महाराज का प्रारंभिक नाम मूल शंकर अंबा शंकर तिवारी था। इनका जन्म 12 फरवरी 1824 को टंकारा गुजरात में हुआ था। ब्राह्मण परिवार में जन्मे महर्षि दयानंद सरस्वती जी महाराज के पिता एक समृद्ध परिवार के व्यक्ति थे जिनके पास धन-धान्य और सांसारिक सुख ऐश्वर्य की किसी प्रकार की कमी नहीं थी। इनकी जन्मभूमि मोरबी राज्य (गुजरात) में स्थित थी। इनके पिता का नाम अंबा शंकर तिवारी था।
हम सभी जानते हैं कि जब महात्मा बुद्ध ने एक वृद्व व्यक्ति को पहली बार देखा था तो उन्हें वैराग्य हुआ और वह इस सोच में पड़ गए कि एक दिन वह स्वयं भी इसी प्रकार की वृद्धावस्था को प्राप्त हो जाएंगे ।इसी प्रकार जब उन्होंने किसी मृत व्यक्ति के शव को ले जाते हुए कुछ लोगों को देखा तो उनके बारे में जानकार उन्हें और भी अधिक विरक्ति का बोध हुआ कि संसार से एक दिन इसी प्रकार जाना है तो जाने से पहले कुछ ना कुछ बड़ा काम करना चाहिए। ऐसी घटनाओं से जो सीखते हैं, वही महान बनते हैं । महर्षि दयानंद जी के जीवन में भी ऐसी कई घटनाएं हुई थीं। जिन्होंने उनके जीवन में निर्णायक मोड़ ला दिया था। जी हां, हमारा संकेत उसी घटना की ओर है जब महाशिवरात्रि के दिन एक चूहा शिव की प्रतिमा पर उछल-कूद कर रहा था और उस पर चढ़े प्रसाद को खा भी रहा था , इसके साथ-साथ उसी प्रतिमा पर मल-मूत्र भी कर रहा था। स्वामी दयानंद जी ने जब यह दृश्य देखा तो उनके मन में कई प्रकार के प्रश्न उठे। बस,इन्हीं प्रश्नों ने बालक मूलशंकर को महर्षि दयानंद बनने के लिए उठ खड़ा होने का महत्वपूर्ण संदेश दे दिया। इसी प्रकार उनके एक चाचा और बहन की मृत्यु ने भी उनमें विरक्ति के भाव पैदा किए थे।

बन गए वीतराग योगी

महर्षि दयानंद जी ने चूहे वाले दृश्य को देखने के पश्चात 21 वर्ष की अवस्था में संन्यासी जीवन का चुनाव किया। इसके पश्चात वह सच्चे शिव की खोज में निकल पड़े। घर – बार, परिवार, कुटुंब – कबीला,परिजन और प्रियजनों से पीठ फेरकर वह मूलशंकर शंकर के मूल को खोजने के लिए चल पड़े। संसार के साधारण जन जिस जीवन को जीने के पश्चात ढ़लती हुई उम्र में जाकर नीरस समझ कर त्यागने की बार-बार चेष्ठा करते हैं, पर त्याग नहीं पाते, उस जीवन को स्वामी दयानंद जी ने बिना भोगे ही नीरस मान लिया और अनेक प्रकार के व्यंजन जीवन रूपी थाली में होने के उपरांत भी उनसे मुंह फेरकर सत्य मार्ग के पथिक बनकर घर से निकल पड़े। एक वीतराग योगी बनकर वह सत्य की खोज के लिए चल पड़े। पर पिता ने घर छोड़ गए मूलशंकर को फिर खोज निकाला और घर में लाकर कड़े पहरे में डाल दिया।
पिता ने प्रयास किया कि पुत्र को विवाह के बंधन में बांध दिया जाए ,पर जो पुत्र भीतर से सारे बंधनों को शिथिल कर चुका था और उन्हें पूर्णतया नष्ट करने की प्रतिज्ञा ले चुका था, उस पर विवाह जैसे बंधन में पड़ने के प्रलोभन का अब क्या प्रभाव पड़ने वाला था ? विवाह संबंधी प्रस्ताव को उन्होंने बड़ी सहजता से अस्वीकार कर दिया। जिसे लेकर पिता-पुत्र में कई बार विवाद भी हुआ, पर उन्होंने जिस रास्ते पर चलने का संकल्प ले लिया था उसके समक्ष पिता को झुकना पड़ा। स्वामी जी महाराज अंतरात्मा की आवाज पर चलते थे। अतः पिता के प्रस्ताव के समक्ष भी वह अडिग बनकर डटे रहे। यही कारण था कि आगे चलकर ब्रिटिश साम्राज्य जैसी विशाल चट्टान से लड़ने का साहस कर सके।

लग गए राष्ट्रवासियों की मुक्ति की साधना में

स्वामी दयानन्द जी महाराज महान व्यक्तित्व के धनी थे। वे उस समय अपनी मुक्ति के साथ-साथ राष्ट्रवासियों की मुक्ति की साधना में भी लगे हुए थे। उन्हें अपने देशवासियों की गुलामी की स्थिति को देखकर बड़ी पीड़ा होती है। उनकी आत्मा उन्हे कचोटती थी, और कहती थी कि दयानंद! अपने लिए तो सब जीते हैं ,संसार के लिए जो जीता है वही ‘मुकद्दर का सिकंदर’ होता है । स्वामी जी महाराज अंतरात्मा की आवाज को सुनकर जहां अपनी मुक्ति साधना में लगे रहते थे, वहीं वे राष्ट्र के मोक्ष अर्थात स्वाधीनता प्राप्ति की साधना में भी लगे रहते थे। उन्होंने इस बात को गहराई से समझ लिया था कि भारतवर्ष में वेद की बात करना और मनवाना तभी संभव है जब विदेशी शासक से मेरा देश मुक्त हो।
यही कारण था कि जब 1846 में उन्होंने घर- बार छोड़ा तो 21 वर्ष की चढ़ती हुई जवानी के दौर में उन्होंने अंग्रेजों को चुनौती देना आरंभ किया। जहां भी वह नवयुवक पहुंचता था वहीं लोगों को ब्रिटिश साम्राज्य से मुक्ति के लिए जागरूक करता था। स्वामी दयानंद जी की लहलहाती जवानी जिस प्रकार देश के काम आ रही थी उससे प्रेरणा लेकर आगे चलकर इसी अवस्था के और इससे भी छोटी अवस्था के कितने ही क्रांतिकारी युवा भारत की स्वाधीनता के लिए मैदान में कूद पड़े थे। इस प्रकार के क्रांतिकारी आंदोलन के रक्तबीज को संपूर्ण भारत वर्ष में बिखेरने वाले सबसे पहले व्यक्ति स्वामी दयानंद जी महाराज ही थे। भारत की उर्वरा भूमि ने स्वामी दयानंद जी के इस रक्तबीज को बड़ी शीघ्रता से पकड़ा और मां भारती की कोख से इसके पश्चात इतने क्रांतिकारी उत्पन्न हुए कि अंग्रेजों को उन्हें गिनना तक कठिन हो गया । अंग्रेज हमारे क्रांतिकारी आंदोलन को जितना ही अधिक दबाने का प्रयास करते थे वह उतना ही अधिक भड़कता था। हमारा मानना है कि भारत की पवित्र और वीरभूमि पहले दिन से ही विदेशी आक्रमणकारियों और शासकों को भारत से खदेड़ने के लिए सचेष्ट और सक्रिय रही, पर स्वामी जी महाराज जैसे कुशल हलधर ने जब यहां आकर क्रांति का हल चलाया तो उसके बाद तो इस वीरभूमि ने अनेक वीर रत्न उत्पन्न किए। स्वामी जी से प्रभावित होकर और उनसे प्रेरणा लेकर तात्या टोपे,रानी लक्ष्मीबाई, धन सिंह कोतवाल, नाना साहब पेशवा, अजीमुल्ला खां, बालासाहेब आदि ने मां भारती की स्वाधीनता के लिए कठोर परिश्रम किया और अपने बलिदान दिए।

1857 की क्रांति के जनक

1855 ईस्वी में स्वामी दयानंद जी महाराज ने माउंट आबू से लेकर हरिद्वार तक की यात्रा की। इस दौरान वह जितने भी लोगों से मिले उन सबको क्रांति के लिए तैयार रहने का आवाहन करते चले गए। अपनी योजनाओं को सिरे चढ़ाने के लिए स्वामी जी महाराज ने रोटी तथा कमल की योजना बनाई और सभी को देश की आजादी के लिए जोड़ना प्रारंभ किया। कुशल रणनीतिकार की भांति कार्य करते हुए स्वामी जी महाराज ने इस कार्य के लिए सबसे पहले साधु-संतों को जोड़ा। इसके पीछे कारण यह था कि साधु-संतों के साथ अनेक अनुयायी और उनके शिष्य होते हैं। इसके साथ-साथ मंदिरों की सुरक्षा के लिए उनके पास एक सादे कपड़ों में रहने वाली सेना भी होती थी। स्वामी जी महाराज जी की मान्यता थी कि यदि साधु संत अपने शिष्यों, अनुयायियों, सैनिकों को संकेत कर देंगे तो निश्चय ही उसके शुभ परिणाम होंगे। 

3 फरवरी 1835 को ब्रिटेन की पार्लियामेंट ने लॉर्ड मैकाले को भारत में शिक्षा के क्षेत्र में विशेष कार्य करके भारत की गुरुकुल शिक्षा प्राणी को नष्ट करने का अधिकार और प्रमाण पत्र देकर अधिकृत किया था। स्वामी दयानंद जी महाराज ने जब लॉर्ड मैकाले की इस भारत विरोधी मानसिकता को समझा तो उन्होंने 21 वर्ष की अवस्था में ही लोगों को लॉर्ड मैकाले की शिक्षा नीति का बहिष्कार करने की प्रेरणा देना आरंभ किया। इसके पश्चात उन्होंने लोगों को गुरुकुल में जाकर वैदिक शिक्षा संस्कार लेने के लिए आंदोलित करना आरंभ किया। गुरुकुल शिक्षा पर अधिक जोर देकर स्वामी दयानंद जी महाराज ने लॉर्ड मैकाले की शिक्षा नीति का विरोध इसलिए किया कि नई शिक्षा नीति से हमारी युवा पीढ़ी का बिगड़ना निश्चित था । जबकि भारत की गुरुकुल शिक्षा प्रणाली उन्हें देशभक्त बनाती ।

लॉर्ड मैकाले की नीति का विरोध

लॉर्ड मैकाले की शिक्षा नीति का स्वामी दयानंद जी महाराज और उनके पश्चात उनके उत्तराधिकारी आर्य समाज और आर्य समाज के क्रांतिकारी नेताओं ने जिस प्रकार विरोध किया उसी का परिणाम था कि 1931 की जनगणना के समय 30 करोड़ की भारत की जनसंख्या में से मात्र 3 लाख लोग ही ऐसे निकले थे जिनको अंग्रेजी शिक्षा संस्कार मिले थे या कहिए कि जो अंग्रेजी कान्वेंट स्कूलों से पढ़कर बाहर आए थे। अंग्रेजों ने इन 3 लाख लोगों को इस प्रकार प्रस्तुत किया था कि जैसे ये ही ज्ञानी पुरुष हैं और शेष भारत अज्ञानी और जंगली जानवरों का देश है। देश का प्रचलित इतिहास भी हमें यही बताता है कि अंग्रेजों से पहले हमारे देश में जंगली और अज्ञानी लोग रहते थे।
जिस देश में कणाद जैसे ऋषि ने कभी परमाणु की खोज की थी, ऋषि भारद्वाज ने विमानों को बनाने की तकनीकी की खोज की थी और अगस्त्य ऋषि ने विद्युत के तारों का आविष्कार किया था, उसका सारा ज्ञान विज्ञान इतिहास के इस भ्रम चक्र में दबकर रह गया।लोगों ने स्वामी जी की बात को स्वीकार किया और उन्होंने अपनी परंपरागत गुरुकुल शिक्षा प्रणाली को छोड़ा नहीं। इस प्रकार स्वामी दयानंद जी महाराज ने लॉर्ड मैकाले का जनाजा उसके जीते जी ही निकाल दिया था।
1937 में जाकर कांग्रेस ने अपनी वर्धा स्कीम के द्वारा लॉर्ड मैकाले को फिर से जीवित कर लिया था। जब कांग्रेस ने लॉर्ड मैकाले की शिक्षा से भी भंयकर शिक्षा नीति स्वाधीन भारत के लिए तय की थी। काश! कांग्रेस की उस शिक्षा नीति को लागू होने से रोकने के लिए भी हमें उस समय कोई दयानंद मिल गया होता ?

स्वामी दयानंद जी की क्रांतिकारी विचारधारा

1857 की क्रांति के लिए स्वामी दयानंद जी महाराज के गुरु रहे स्वामी विरजानंद जी महाराज और उनके गुरु पूर्णानंद और पूर्णानंद जी के भी गुरु आत्मानंद जी उस समय विशेष कार्य कर रहे थे । स्वामी विरजानंद जी महाराज ने उस समय मथुरा में एक विशेष कार्यक्रम में अपने ओजस्वी वक्तव्य के माध्यम से देश के लिए काम करने हेतु प्रेरित किया था। उस समय हमारी खाप पंचायतों के पास 75000 लोगों की एक विशाल सेना हुआ करती थी । खाप पंचायतों के लोगों ने स्वामी ब्रजानन्द जी को 75000 की उस समय की आजाद हिंद फौज का नेतृत्व सौंप दिया। स्वामी जी महाराज ने अपने जोशीले राष्ट्रवादी भाषण से लोगों को हिला कर रख दिया था। इसी परंपरा को लेकर स्वामी दयानंद जी महाराज ने आगे चलकर देश की आजादी के लिए लोगों को खड़ा होने की प्रेरणा दी थी। इस घटना से और तथ्य से हमें यह शिक्षा लेनी चाहिए कि स्वामी दयानंद जी महाराज जिस अलख को जगाने का कार्य कर रहे थे उसमें वह अकेले नहीं थे। आग तो थी ,बस उसे तेज करने की आवश्यकता थी। जिसके लिए स्वामी दयानंद जी जैसे ओजस्वी नायक की आवश्यकता थी।
1857 की क्रांति अंग्रेजों द्वारा की गई प्रति क्रांति के पश्चात जब क्रांति की लौ कुछ मद्धम पड़ी तो भी स्वामी जी महाराज लार्ड मैकाले की शिक्षा नीति के प्रति लोगों को जागरूक करते रहे। इतना ही नहीं, जब अंग्रेजों ने 1857 की क्रांति को प्रति क्रांति के माध्यम से तात्कालिक आधार पर असफल करने में सफलता प्राप्त कर ली। उन्होंने भारतवर्ष में अपने न्यायालय भी स्थापित कर दिए तो भी स्वामी जी महाराज ने लोगों को उनके न्यायालयों का बहिष्कार करने की प्रेरणा दी। स्वामी जी महाराज का कहना था कि अंग्रेज न्यायशील नहीं हैं, क्योंकि वह अन्याय करते हुए भारत के लोगों के अधिकारों का दमन कर रहे हैं । ऐसा कहकर स्वामी जी महाराज ने अंग्रेजों के न्यायशील होने की हवा निकाल दी। स्वामी जी महाराज ने लोगों को बताया कि इन अत्याचारी और अन्याय प्रिय लोगों के न्यायालयों से हमें न्याय नहीं मिल सकता। इनके दमनकारी कानून अत्याचार तो कर सकते हैं पर किसी भी न्याय मांगने वाले को न्याय नहीं दे सकते। स्वामी दयानंद जी महाराज की क्रांतिकारी परंपरा और भावना को स्वामी श्रद्धानंद जी महाराज ने गुरुकुल कांगड़ी के ब्रह्मचारियों को राष्ट्रभक्ति का पाठ पढ़ाकर जारी रखा।

आजादी को लेकर स्वामी जी की घोषणा

स्वामी जी की इस प्रकार की प्रेरणा का ही परिणाम था कि इसके पश्चात लोगों ने अंग्रेजों के न्यायालयों का भी बहिष्कार कर दिया था।  स्वामी जी महाराज ने 1857 की क्रांति के पश्चात ही लोगों को यह कह दिया था कि अभी आजादी को प्राप्त करने में 100 वर्ष का भी समय लग सकता है। स्वामी जी महाराज की यह भविष्यवाणी सही साबित हुई , क्योंकि क्रांति के लगभग 90 वर्ष पश्चात जाकर देश को आजादी मिली।

स्वामी दयानंद जी महाराज के गुरु विरजानंद जी ने उन्हें जहां वैदिक शिक्षा दी, वहीं उन्हें राष्ट्र जागरण के लिए भी एक योद्धा के रूप में तैयार किया । उनके गुरु जी ने उनके भीतर की प्रतिभा को पहचान लिया था और वह समझ गए थे कि जिस उद्देश्य को लेकर वे जीवन भर कार्य करते रहे उसे भारत की स्वाधीनता के रूप में केवल दयानंद ही प्राप्त कर सकता है । यही कारण था कि स्वामी जी महाराज जब अपने गुरु विरजानंद जी से दीक्षा लेकर विदा हो रहे थे तो गुरु जी ने अपने शिष्य द्वारा गुरु दक्षिणा में दी जा रही लौंग को लेने से यह कहकर इंकार कर दिया कि दयानंद तुझसे मैं और कुछ लेना चाहता हूं और वह ‘और कुछ’ यही है कि लोगों को अज्ञान और पाखंड के अंधकार से बाहर निकालो । जिससे उनके भीतर वेदभक्ति और देशभक्ति के साथ-साथ ईश भक्ति का भी संचार हो।

गुरु की आज्ञा को किया शिरोधार्य

       स्वामी जी महाराज ने अपने गुरु जी की आज्ञा को शिरोधार्य कर सारे राष्ट्र का भ्रमण किया और वैदिक शास्त्रों के ज्ञान का प्रचार प्रसार किया। इस काल में ऋषि दयानंद को अनेक प्रकार के कष्टों, अपमानजनक टिप्पणियों और अपमानजनक व्यवहार का सामना करना पड़ा । पर वह तनिक भी विचलित नहीं हुए। क्योंकि उनका आदर्श यही था :-

निन्दन्तु नीतिनिपुणाः यदि वा स्तुवन्तु लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम् । अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा , न्याय्यात् पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः ।।

अर्थात नीति में निपुण मनुष्य निंदा करें या प्रशंसा करें, लक्ष्मी आए या चली जाए, आज ही मृत्यु हो जाए या युग युगों के बाद हो ,परंतु धैर्यवान मनुष्य कभी भी न्याय के मार्ग से अपना कदम पीछे नहीं हटाते।
कहने का भाव है कि संसारी लोग चाहे गाली दें या स्तुति करें। धन आए या जाए , वे आज मरें या 100 वर्ष जिएं, लेकिन धैर्यवान मनुष्य न्याय के मार्ग से कभी नहीं हटते।

ऋषि का अमृत मंथन

अपने आप को विकल्पविहीन संकल्प के प्रति समर्पित कर स्वामी दयानंद जी महाराज निरंतर आगे बढ़ते रहे। स्वामी जी महाराज ने अपने संकल्प की पूर्ति के लिए अनेक संप्रदायों व मतों के ग्रंथों को पढ़ा। उनका सत्य सार निकाला और जितना जितना जिसमें कूड़ा कबाड़ भरा हुआ था उस सबको साफ करने का महत्वपूर्ण और भागीरथ प्रयास किया । उनके इसी अमृत मंथन का परिणाम उनका अमर ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश बना। उनके इस अमृत मंथन के कार्य से उस समय के ईसाई समाज के साथ-साथ मुस्लिम और सनातन अर्थात पौराणिक मान्यताओं में विश्वास रखने वाले लोग बड़ी संख्या में उनके विरोधी हो गए ।
स्वामी दयानंद जी महाराज ने सामाजिक आधार पर अपने विरोधियों से लोहा लिया और सांप्रदायिक आधार पर भी लिया। इसके साथ-साथ उन्होंने राजनीतिक स्तर पर जाकर उस समय की सबसे बड़ी शक्ति ब्रिटिश साम्राज्य को ललकार कर उसे भी अपना विरोधी बनाया। इसके उपरांत भी वे निर्भीकता के साथ अपना कार्य करते रहे। स्वामी जी महाराज ने अपने अमृत मंथन के पश्चात यह सिद्ध किया कि इस संसार के सभी ग्रंथ खोखले हैं और वे सभी वेदों के आगे कभी नहीं टिक सकते। इस प्रकार एक वेदोद्धारक ऋषि के रूप में उन्होंने संसार को वेदों का मार्ग बताया।
1855 में आबू पर्वत से जगह-जगह प्रवचन करते हुए वे हरिद्वार कुम्भ में पहुंचे थे। हरिद्वार में ही एक पहाड़ी के एकान्त में उन्होंने पांच ऐसे व्यक्तियों से वार्ता की थी जो 1857 की क्रांति के कर्णधार बने। ये पांच व्यक्ति थे नाना साहब, अजीमुल्लाखान, बाला साहब, तात्यां टोपे व बाबू कुंवर सिंह। क्रांति को जन-जन तक पहुंचाने के लिए ‘रोटी व कमल’ की इतिहास प्रसिद्घ योजना यहीं बैठकर तैयार की गयी थी। क्रांति के समय स्वामी जी लगातार सभी क्रांतिकारियों के संपर्क में रहे। स्वामीजी के मार्गदर्शन में पूरे देश में साधु संतों ने राष्ट्रवाद का संदेश दिया। वे क्रांति की असफलता से कभी निराश नही हुए। उन्होंने 1857 की क्रांति के पश्चात कहा था कि अब हमें स्वतंत्रता के लिए सौ वर्ष का संघर्ष करना पड़ सकता है, और 1947 में जब देश आजाद हुआ तो उस समय महर्षि दयानंद की भविष्यवाणी को 90 वर्ष पूर्ण हो चुके थे। इस प्रकार देश की आजादी की मशाल को 1947 में सौंपने वाले अदृश्य हाथ स्वामी दयानंद के ही थे।
आज हमारा देश पुन: कई चुनौतियों से जूझ रहा है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, (हिंदुस्तान) आर्यभाषा, (हिंदी) आर्यसंस्कृति (हिंदू, हिंदुत्व) सभी को अभूतपूर्व संकट है। जिनके लिए आज पुन: महर्षि दयानन्द जैसे दिव्य पुरूष की हमें आवश्यकता है। उनके जन्म के द्विशताब्दी समारोह के अवसर पर हमें उनके जीवन से प्रेरणा लेकर राष्ट्र के सम्मुख उपस्थित समस्याओं का समाधान करने की दिशा में ठोस कार्य करने की आवश्यकता है।
1857 की क्रांति के पश्चात देश में जितना भी क्रांतिकारी आंदोलन चला उस सबके क्रांतिकारी नेता स्वामी दयानंद जी से ही प्रभावित थे। यहां तक कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने भी महाशय कृष्ण से लाहौर आर्य समाज में कहा था कि आर्य समाज तो उनकी मां है। आर्य समाज में जो भी व्यक्ति भाग ले रहा है उसका किसी न किसी रूप में आर्य समाज से संबंध अवश्य है, भले ही वह किसी भी मत पंथ से संबंध रखता हो परंतु दयानंद जी के स्वदेशी के आवाहन का उस पर प्रभाव है ही। क्योंकि स्वामी जी ने ही सबसे पहले कहा था कि स्वदेशी राज्य ही सर्वोपरि उत्तम होता है। (भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में आर्य समाज का विशेष ( 80%) योगदान’, पृष्ठ – 195)
नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने वीर सावरकर, श्यामजी कृष्ण वर्मा जैसे विदेश में सक्रिय आर्य नेताओं के सहयोग से ही आजाद हिंद फौज का निर्माण किया था। आचार्य सत्यप्रिय जी ने तो उन्हें राजाराम जैसा बताया था कि जैसे लाखों वर्ष पहले यह कार्य राजा राम ने बाहर ही बाहर अपनी वानरी सेना बनाकर लंकापति रावण का वध किया था और लंका पर विजय प्राप्त की थी वैसे ही भारत मां की आजादी के लिए बाहर के देशों में जाकर आजाद हिंद फौज बनाई। जिससे अंग्रेजों से लड़ने में बड़ी भारी सहायता और सफलता प्राप्त हुई।
वास्तव में यह सब स्वामी दयानंद जी महाराज जी के अमृत मंथन और उनकी पुण्य प्रेरणा का ही प्रताप था।आज जबकि सारा देश अमृत महोत्सव मना रहा है, तब स्वामी दयानंद जी महाराज के अमृत मंथन की ओर भी सरकार लोगों का ध्यान दिलाए।

डॉ राकेश कुमार आर्य

( लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार एवं भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं।)

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