लोकतंत्र में विपक्ष का होना अनिवार्य है। इसका कारण ये है कि लोकतंत्र लोकहित के लिए तभी स्वस्थ कार्य कर सकता है जब शासक वर्ग की नीतियों में कमी निकालने वाला भी उसी के साथ बैठा हो। राजतंत्र में कभी चाटुकार राजदरबारी हुआ करते थे, जो अपने राजा की हां में हां मिलाने वाले होते थे, उससे राजा स्वेच्छाचारी होता चला जाता था और उसे लगता था कि वह जो कुछ भी कर रहा है-वह उचित ही है, क्योंकि उसका कहीं से विरोध नहीं है। जब लोकतंत्र ने इस दूषित राजतंत्रीय व्यवस्था को चलता किया तो उसने अपने यहां विरोध को स्थान दिया। इसका अभिप्राय था कि राजा को स्वेच्छाचारी बनने से रोकने के लिए उसके निर्णयों पर टीका टिप्पणी करने वाला और उन पर अपना सकारात्मक प्रजाहितकारी विरोध व्यक्त करने वाला विपक्ष भी हो। भारत ने प्राचीनकाल में अत्यंत उच्चकोटि के विद्वानों से संसद का निर्माण कर सीख लिया था, जिससे पक्ष विपक्ष की बात वहां थी ही नहीं, वहां तो केवल राष्ट्रहित था और दरबार की गरिमा इसीलिए महान होती थी कि उस दरबार का उद्देश्य राष्ट्रहितचिंतन होता था। वास्तव में ऐसी अवस्था लोकतंत्र की वास्तविक और सर्वोत्तम अवस्था होती है, जिसमें पक्ष-विपक्ष भी ना हो केवल राष्ट्रहित अनिवार्य हो। आधुनिक लोकतंत्र ने पक्ष-विपक्ष की अवधारणा का विकास कर लोकतंत्र को मजबूती तो दी है पर यह अवधारणा राजतंत्र के उस निकृष्टतम स्वरूप के कारण ही विकसित हुर्ई है, जिसमें राजा स्वेच्छाचारी होने लगा था। पक्ष-विपक्ष की इस अवधारणा को राजतंत्र के इस निकृष्टतम स्वरूप की अपेक्षा तो उत्तम माना जा सकता है, पर यह भारत की पक्ष-विपक्षविहीन राष्ट्रहित चिंतनकारी लोकतंत्रीय व्यवस्था से भी उत्तम हो, यह नहीं कहा जा सकता। इसमें दलीय भावना और दलीय हित टकराते हैं और हमारे जनप्रतिनिधि राष्ट्रहित को लेकर नहीं, अपितु दलीय हितों को लेकर पक्ष-विपक्ष में बंट जाते हैं।
वर्तमान में भारतीय लोकतंत्र के ऊपर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। इसका कारण यही है कि हमारे जनप्रतिनिधियों का आचरण संसद के भीतर जाकर भी दलीय हितों से ऊपर नहीं जा पाता। यह भी एक दुखद तथ्य है कि हमारे कितने ही जनप्रतिनिधियों को उनकी पार्टी के राष्ट्रीय नेता अपने लिए ‘हाथ उठाने वाले’ बनाकर ले जाकर बैठाते हैं-उनका मानना होता है कि यदि कोई असहज स्थिति संसद या विधानमंडल में बने तो उस समय ये हाथ उठाने वाली कठपुतलियां इशारा पाकर सही से नाचना आरंभ कर दें। बात 1987 की है, जब चौधरी देवीलाल हरियाणा में अपनी लोकप्रियता के चरम पर थे, तब उन्होंने अपने रसोइये तक को भी हरियाणा विधानसभा के चुनावों में टिकट देकर विधायक बनवा लिया था। तब वह कहते थे कि यदि एक धान के पुआल को भी टिकट दे दिया जाता तो वह भी जीत जाता। उनकी बात गलत नहीं थी हरियाणा की जीत ने तब चौधरी देवीलाल को विधानसभा की 90 सीटों में 85 सीट देकर प्रचण्ड बहुमत उन्हें दे दिया था। हमने यह उदाहरण इसलिए दिया है कि चौधरी देवीलाल को हरियाणा विधानसभा के लिए अपने रसोइये या नौकर चाकर ही टिकट देने के लिए इसलिए मिले थे कि वे विधानसभा को अपनी मुट्ठी में रखना चाहते थे और यह तभी संभव था जब विधानसभा में नौकर-चाकर या रसोइयों की मानसिकता वाले लोगों को भेजा जाता। चौधरी देवीलाल को विधानसभा के लिए एक से बढक़र एक योग्य उम्मीदवार मिल सकता था पर उन्हें योग्य उम्मीदवारों की या जनप्रतिनिधियों की आवश्यकता नहीं थी-उन्हें तो ऐसे लोगों की आवश्यकता थी जिनका खून मर चुका हो या ठंडा पड़ चुका हो। जिनमें स्वाभिमान नाम की कोई चीज ना हो और जो जैसे चाहें समय पर प्रयोग किये जा सकें। जिस देश की संसद या विधानमंडल के लिए ‘मरे हुए खून’ के प्रतिनिधियों की खोज की जाने लगती है उस देश में लोकतंत्र भी मर जाता है।
इस सत्य को समझकर नेहरूजी ने देश में लोकतंत्र की नींव को मजबूत करने के लिए पहले दिन से प्रयास करना आरंभ किया था। उनकी दूरदृष्टि का ही परिणाम था कि जब देश में विपक्ष या तो था नहीं या अत्यंत कमजोर था-तब भी उन्होंने पक्ष के भीतर ही विपक्ष को उबारने का लोकतांत्रिक प्रयास किया था। यही कारण था कि उनके समय में राष्ट्रहित पर सरकार की खिंचाई कांग्रेस के लोग भी कर लिया करते थे। नेहरू अपनी मंत्रिपरिषद के सदस्यों को चुनते थे और उन्हें राष्ट्रपति से पद व गोपनीयता की शपथ भी दिलाते थे। परंतु उनके कार्यों में कोई हस्तक्षेप नहीं करते थे। जबकि मायावती जैसी नेताओं पर यह आरोप भी लगे कि उन्होंने अपने मंत्रियों के कार्यों में इतना हस्तक्षेप किया कि मंत्री मंत्री होकर भी मंत्री नहीं रहे। ऐसे आरोप कई नेताओं पर लगे हैं। इससे लोकतंत्र अपमानित हुआ है। नेहरूकाल में विपक्ष आज की तरह गैर जिम्मेदार नहीं था। उस समय यह कल्पना भी नहीं की जाती थी कि इस देश में नेहरू के बाद कांग्रेस और इस देश का लोकतंत्र एक परिवार की जागीर बनकर रह जाएगा, उस समय तो यह माना जाता था कि नेहरू जी जिस लोकतंत्र की भव्य इमारत का निर्माण देश में कर रहे हैं यह निश्चय ही आने वाली पीढिय़ों के लिए गौरवप्रद होगा।
अब समय का खेल देखिये कि देश के विपक्ष की भूमिका कांग्रेस निभा रही है और विपक्ष का नेता चाहे कोई भी हो पर वास्तव में राहुल गांधी हैं-जो अपने आपको नेहरू गांधी वंश की विरासत का वारिस मानते हैं। उनके नेतृत्व में संसद में दलीयहित टकरा रहे हैं और राष्ट्रहित गौण हो गये हैं। कहने का अभिप्राय है कि राहुल गांधी ने नेहरू की लोकतंत्र के प्रति निष्ठा का ही उपहास उड़ाना आरंभ कर दिया है। इसके साथ ही एक बात पीएम मोदी की भी ध्यान में रखनी चाहिए कि वे अपनी कटाक्ष वाली भाषा पर नियंत्रण रखें। लोकतंत्र में व्यंग्यबाण चलते हैं पर कटाक्ष नहीं। भाषा में कटाक्ष का आना लोकतंत्र के लिए घातक है, क्योंकि कटाक्ष वाली भाषा शत्रु बढ़ाती है और मित्रों को भी हमसे दूर करती जाती है। पीएम अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व पीएम अटल जी से कुछ सीखें-जो बड़े व्यंग्य को भी मुस्कुराते हुए संसद में कह दिया करते थे। वह झुकते नहीं थे पर उनके व्यंग्यबाणों की तार्किकता के सामने विरोधी को झुकना पड़ता था। इसी प्रकार हम चाहेंगे कि राहुल भी अपने आदर्श पंडित नेहरू जी से कुछ सीखें। देशहित सर्वोपरि है उसके, लिए काम करना होगा-अन्यथा लोकतंत्र मर जाएगा।

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