वैदिक सम्पत्ति : चतुर्थ खण्ड – वेद मंत्रों के उपदेश, गतांक से आगे….

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गतांक से आगे….

यजुर्वेद में लिखा है कि-

शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्रवका जरसं तनूनाम् ।
पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः ।। (यजु० 25/22)

अर्थात् है विद्वानो ! मनुष्य की आयु सौ वर्ष नियत है, अतः जब तक हमारे शरीरों की जरा अवस्था न हो जाय और हमारा पुत्र भी पिता न हो जाय तब तक हम जिएँ अर्थात् सौ वर्ष के अन्दर हमारी आयु क्षीण न हो। इतना ही नहीं कि हम किसी प्रकार सौ वर्ष तक जिएँ, प्रत्युत मारोग्यता और बल के साथ जिए, जैसा कि लिखा है कि-

तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रच्चरत् पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतश्रृगुयाम ।
शरदः शतं प्र ब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात् ॥ (यजुर्वेद 36/24)

अर्थात् ज्ञानियों का हित करनेवाला शुद्ध ज्ञाननेत्र उदित है। उससे हम सौ वर्ष देखें, सौ वर्ष जिएं, सो वर्ष सुर्वे, सौ वर्ष बोलें, सौ वर्ष तक दीन न हों और सौ वर्ष से भी अधिक दिन तक आनन्द से रहें । वेद में दीर्घजीवन की इस इच्छा के आगे काम की इच्छा का वर्णन इस प्रकार है-

कामस्तदग्रे समवर्तत मनसो रेतः प्रथमं यदासीत् ।
स काम कामेन बृहत्ता सयोनी रायस्पाषि यजमानाय धेहि । (अथवं० 19/ 52/1)

अर्थात् जो ‘काम’ मन में बीजरूप से है, वह पहिले हुआ। हे काम ! तूने बहुत बड़े काम का विस्तार कर दिया है, इसलिए अब घन दे ।

प्रियो देवानां भूयासम् । प्रियः प्रजानां भूयासम् ।

प्रियः पशूनां भूयासम् । प्रियः समाननां भूयासम् ।। (अथर्व० 17/1/2-5 )

अर्थात् देवों के लिए, प्रजा के लिए, पशुओं के लिए और समानों के लिए प्रिय होऊँ । कामना से सम्बन्ध रखनेवाले इन दोनों मन्त्रों में कहा गया है कि मन और रेत ही काम का मूल है। इस काम से ही धागे बड़ी बड़ी पुत्रादि की कामनाएँ उत्पन्न होती हैं और इसीसे बनाव चुनाव, शोभा शृङ्गार और ठाटबाट की आवश्यकता होती है। इन सबका मूल मन मौर रेत अर्थात् रति ही है। रति ही प्रजा, पशु और धन्नादि धन की घोर विशेष प्रवृत्ति उत्पन्न कराती है। क्योंकि दीर्घजीवन और कामजन्य स्त्रीपुत्रादिकों के लिए ही धन की इच्छा होती है । मनुष्य को इस धन की इच्छा किस प्रकार रहती है, उसका नमूना वेद ने निम्न मन्त्र में दिखलाया है-

एकपाद् भूयो द्विपदो वि चक्रमे द्विपास्त्रिपादमभ्येति पश्चात् । चतुष्पादेति द्विपदामभिस्वरे संपश्यम्पङ्क्तीरुपतिष्ठमानः ।। (ऋ०10/117/8)

अर्थात् एक गुणा धन रखनेवाला अपने से दुगुने धन रखनेवाले के मार्ग का आक्रमण करता है, दुगुने धनवाला तिगुने धनवाले के पीछे दौड़ता है और चौगुने धनवाला अपने से दूने धनवाले की महत्ता को प्राप्त होता है । अर्थात् मनुष्य धनवानों को देखकर स्पर्धा करते हुए अधिकाधिक धन प्राप्त करने की इच्छा रखता है। इस धन की इच्छा के आगे मान की इच्छा होती है। वेद में मान की इच्छा का नमूना इस प्रकार दिखलाया गया है-

यथा सूर्यो अतिभाति यथास्मिन् तेज आहितम् ।
एवा मे वरण मणिः कीर्ति भूर्ति नि यच्छतु
तेजसा मा समुक्षतु यशसा समनस्तु मा ।।17॥
यथा यशश्रवन्द्रमस्यादित्ये च नृचक्षसि । एवा० ।। 18 ।।
यथा यशः पृथिव्यां यथास्मिन् जातवेदसि । एवा० ।। 19 ।।
यथा यशः कन्यायां यथास्मिन् संभृते रथे । एवा० ।। 20 ।।
यथा यशः सोमपीथे मधुपर्के यथा यशः । एवा० ।। 21 ।।
यथा यशोऽग्निहोत्रे वषट्कारे यथा यशः । एवा० ।। 22 ।।
यथा यशो यजमाने यथास्मिन् यज्ञ अहितम् । एवा० ।। 23 ।।
यथा यशः प्रजापतौ यथास्मिन् परमेष्ठिनि । एवा० ।।24।।
यथा देवेष्वसृतं येथैषु सत्यमाहितम् । एवा० ।।25।। (अथर्व०10/3)

अर्थात् जिस प्रकार सूर्य, चन्द्रमा पृथिवी, ब्रह्मचारिणी कन्या, मधुपर्क और सोमपानप्राप्त विद्वान्, अग्निहोत्री, यज्ञ करनेवाला यजमान, परमेष्ठी और प्रजापति यश और कीर्ति को प्राप्त होते हैं, उसी प्रकार कीर्ति, तेज और यश मुझको भी प्राप्त हो। इन मन्त्रों में यश, कीर्ति और मान के लिए प्रार्थना की गई है। क्योंकि लिखा है कि ‘सर्वे नन्दन्ति यशसा’ अर्थात् सबको यश से आनन्द मिलता है।

इस मान की इच्छा के आगे वेद में ज्ञान की इच्छा का वर्णन इस प्रकार है-
यां मेधां देवगणाः पितरश्रवोपासते । तथा मामद्य मेधयाग्ने मेधाविनं कुरु स्वाहा।
मेघां मे वरुणो ददातु मेधामग्निः प्रजापतिः ।
मेधामिन्द्रश्रव वायुश्र्व मेषां धाता ददातु मे स्वाहा ( यजु० 32/14 -15 )

अर्थात् जिस मेघा (ज्ञान) की देवता और पितर उपासना करते हैं, उस मेधा से हे परमेश्वर ! मुझे शीघ्र ही मेधावी कीजिये । यह मेधा मुझको अरूण, अग्नि, प्रजापति, इन्द्र, वायु और परमात्मा देवे । अर्थात् इन सब पदार्थों का ज्ञान मुझे शीघ्र हो। इसलिए-
मनसे चेतसे धिय आकूतय उत चित्तये। मत्यै श्रुताय चक्षसे विधेम हविषा वयम् ॥
(अथर्व० 6/41/1 )

अर्थात् मन, अन्तःकरण, बुद्धि, विचारशक्ति, ज्ञानशक्ति, मति, श्रवणशक्ति और दृष्टिशक्ति की उन्नति के लिए हम सब यज्ञकर्म करें । ज्ञानेच्छा के आगे वेद में न्याय की इच्छा इस प्रकार बतलाई गई है-

देहि मे ददामि ते नि मे धेहि नि ते दधे निहारं च हरासि मे निहारं निहराणि ते स्वाहा ।।

अर्थात् मुझे दें और मैं तुझे दूँ” । तू उत्तम गुण मुझमें धारण कर और में तुझमें धारण करू” । यह मैं लेता हूँ और यह तू ले, अर्थात् परस्पर न्याययुक्त व्यवहार हो । कैसा सुन्दर न्याय का प्रादर्श है ! इसके धागे परमपद की इच्छा का वर्णन इस प्रकार है-

वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ।
तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ।। (यजु० 31/18 )
यत्रानन्दाश्व मोदाश्र्व मुदः प्रमुद आसते ।
कामस्य यत्राप्ताः कामास्तत्र माममृतं कृधि… ॥ ( ऋ० 9/113/11 )

अर्थात् मैं उस अन्धकार से परे महान् प्रकाशमय सूर्यस्य परमात्मा को जानता हूँ। उसी के जान लेने से अमृतत्व प्राप्त होता है इसके सिवा और कोई दूसरा मार्ग नहीं है। इसलिए जहाँ आनन्द ही आनन्द है और जहाँ सब कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं, उस मोक्षधाम में मुझे अमर कीजिये। इन मन्त्रों से दीर्घातिदीर्घ जीवन अर्थात् अमृतत्व को महान् इच्छा वर्तमान है। संसार में बहुत दिन जीने की जो इच्छा पाई जाती है, वह इसी अनन्त जीवन की अभिलाषा है। इस प्रकार से मनुष्य की ये सातों स्वाभाविक इच्छाओं को दर्शानेवाले मन्त्र वेद में मौजूद है। परन्तु ये इच्छाएँ बिना ग्रहस्थाश्रम के पूर्ण नहीं हो सकतीं।
क्रमशः

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