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योगी आदित्यनाथ का चिंतन सरदार पटेल की याद दिलाता है

योगी आदित्यनाथ इस समय भारत की राजनीति के एक जाने माने चेहरे हैं। उत्तर प्रदेश में वह जहां-जहां भी चुनावी सभाएं कर रहे हैं, वहीं-वहीं बड़ी संख्या में लोग उन्हें सुनने आ रहे हैं। लोग उन्हें इसलिए भी सुनना  पसंद करते हैं कि वे जो कहते हैं उसे करके दिखाते हैं। लोगों को बरगलाकर या बहका कर या झूठे आश्वासन देकर या तुष्टिकरण की या आरक्षण की बात कहकर उनसे ताली बजवाकर सस्ती लोकप्रियता प्राप्त करना योगी आदित्यनाथ के स्वभाव में नहीं है। वह अपनी ही पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमितशाह की आदत के विपरीत अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं से मिलने में या उन्हें समय देने में देरी नहीं करते हैं। इसलिए लोगों को उनके साथ काम करने में अच्छा लगता है।
योगी आदित्यनाथ गोरखपुर से भाजपा के सांसद हैं। उनका जन्म 5 जून 1972 को गढ़वाल-उत्तराखण्ड में हुआ था। वह 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा की टिकट पर गोरखपुर से सांसद चुने गये। 1998 से योगी आदित्यनाथ निरंतर इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते आ रहे हैं। वह गोरखनाथ मंदिर के पूर्व महंत अवैद्यनाथ के उत्तराधिकारी हैं। वह हिंदू युवावाहिनी चलाते हैं। जिसके संस्थापक होने का गौरव भी उन्हें ही प्राप्त है। हिंदू युवावाहिनी में देश प्रदेश के अनेकों हिंदू युवा सम्मिलित हैं। जब वह पहली बार 1998 में सांसद चुने गये थे तो उस समय उनकी अवस्था 26 वर्ष थी अर्थात 12वीं लोकसभा के वह सबसे अधिक युवा सांसद थे। उन्होंने गढ़वाल विश्वविद्यालय से गणित से बी.एससी. किया है। वह अपने प्रशंसकों के बीच इसलिए भी अधिक लोकप्रिय हैं कि उन्होंने निम्न वर्ग के हिंदुओं का धर्मांतरण कराने वाले संगठनों के विरूद्घ जोरदार आवाज बुलंद किये हैं। उनकी जोरदार आवाज को देश के हर कोने में सुना गया है, यही कारण है कि उन्हें देश के हर कोने में सम्मान मिलता है। साथ ही जो लोग देश में धर्मांतरण जैसी राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में लगे रहकर इस देश के जनसांख्यिकी आंकड़े को बिगाडक़र भारत की संस्कृति का विनाश करने में लगे हैं, उन्हें योगी आदित्यनाथ के नाम से ही पसीना आ जाता है। उन्हें सोचना पड़ता है कि भारत में अब इन गतिविधियों को चलाना उतना सरल नहीं है जितना सरल वह मानते हैं।
धर्मांतरण की भांति ही गोवध निषेध को भी योगी आदित्यनाथ ने अपना जीवन ध्येय बनाया हुआ है। उनका स्पष्ट चिंतन है कि गाय के बिना भारत रूपी शरीर में आत्मा का निवास नहीं माना जा सकता। यह गाय को जीवित रखने और उसे राष्ट्रीय सम्मान दिलाकर उसी पर आधारित भारत की अर्थव्यवस्था को सृजित करने के पक्षधर राजनीतिज्ञ हैं। उनके जीवन में उनकी वाणी में उनके कृतित्व में और उनके व्यक्तित्व में हिंदुत्व बोलता है और उनके हिन्दुत्व को लोग उनका पाखण्ड ना मानकर सर्वाधिक विश्वसनीय मानते हैं। आजकल जब राजनीतिज्ञों पर लोगों ने विश्वास करना छोड़ दिया है और उन्हें सब्जबाग दिखाकर वोट हथियाने वाले मिथ्याचारी या पाखण्डी मानने लगे हैं-तब योगी आदित्यनाथ पर इतना विश्वास दिखाना सचमुच उनके व्यक्तित्व को निरालापन प्रदान करता है। 
आज भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश में चुनाव जीतना अति आवश्यक है। यह तब और भी अधिक आवश्यक है जब इस प्रदेश में पिछले लंबे समय से ऐसी सरकारें रही हैं जिन पर जातिवादी राजनीति करने और प्रदेश में साम्प्रदायिक दंगे कराने के गंभीर आरोप बार-बार लगते रहे हैं। भाजपा को ऐसी परिस्थितियों में उत्तर प्रदेश के लिए एक चेहरा देना आवश्यक था। परंतु अमितशाह की भाजपा में एक गलत परंपरा डाल दी गयी है कि यहां चेहरा न देकर चुनाव के उपरांत ‘खट्टर’ दिये जाते हैं। ‘खट्टर’ का अभिप्राय है कि राजनीति से निरपेक्ष एक ऐसा चेहरा जिसके ‘माई बाप’ अमितशाह व मोदी हों, उसे जनता के लिए दे दो। क्योंकि उससे जब चाहें उठक-बैठक लगवायी जा सकती हैं। वास्तव में लोकतंत्र में यह जनता के साथ एक छल है। क्योंकि जनता को चुनाव पूर्व अपना नेता चुनने का अधिकार है। संविधान भले ही चाहे विधानसभा में बहुमत दल के नेता को मुख्यमंत्री बनाने की बात कहे पर सच यही है कि संविधान की इस व्यवस्था का अर्थ भी यही है कि जिसे विधानसभा में बहुमत दल का नेता आप बनाने जा रहे हैं वह पहले जनता का नेता बने, जनता का नेता ही विधानसभा का नेता होता है। संविधान के प्राविधान के इस निहित अर्थ को अमितशाह की भाजपा जितना ही उपेक्षित करेगी-उतनी ही तीव्रगति से उसका सूर्य अस्ताचल की ओर जाएगा। अहंकारी प्रवृत्ति से व्यक्ति के बने बनाये खेल बिगड़ जाते हैं। योगी आदित्यनाथ जमीन से जुड़े हुए नेता हैं। वह समाज की नब्ज पर हाथ रखकर बोलते हैं। उन्हें पता है कि दर्द कहां है, कैसा है और उसका उपचार क्या है? उनके यहां समन्वय तो है परंतु तुष्टिकरण नहीं है। उनका यह स्वरूप ही उनके विरोधियों को उनके विरूद्घ दुष्प्रचार करने का अवसर देता है। उनके भीतर का यह गुण सरदार वल्लभ भाई पटेल के राजनीतिक चिंतन की याद दिलाता है, जिसमें समन्वय तो था परंतु किसी का तुष्टिकरण नहीं था। उनके इस गुण को लोगों ने उस समय एक अवगुण माना और सरदार पटेल की आलोचना करने में कोई कमी नहीं छोड़ी थी, पर बाद की घटनाओं ने स्पष्ट किया कि सरदार पटेल ही अपनी जगह ठीक थे। यदि उनके राजनीतिक चिंतन को भारत की राजनीति का एक संस्कार मानकर अपना लिया जाता तो इस देश की अनेकों साम्प्रदायिक समस्याओं का निराकरण हो सकता था। पर हुआ यह कि सरदार पटेल के राजनीतिक चिंतन को गांधीवाद और नेहरूवाद की कूड़ी के ढेर में दबा दिया गया।
अब भाजपा अपने भीतर के उन मुखर चेहरों को गांधी नेहरू की तरह की दबाने का कार्य कर रही है जिनका अपना चिंतन है और जो केवल राष्ट्र के लिए समर्पित है। योगी आदित्यनाथ इसी प्रकार का एक चेहरा हैं। 
अच्छा हो कि भाजपा उन्हें अब भी उत्तर प्रदेश का भावी मुख्यमंत्री घोषित कर दे। प्रदेश को साम्प्रदायिकता के तांडव नृत्य से मुक्त कर यहां कानून का सर्व समन्वयी शासन स्थापित करने के लिए भाजपा के लिए ऐसा करना नितांत आवश्यक है।
(लेखक ‘उगता भारत’ के कार्यकारी संपादक हैं।)

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