अंतरिक्ष अनंत है, और जितना अंतरिक्ष अनंत है-उतना ही वेद ज्ञान अनंत है। अनंत ही अनंत का मित्र हो सकता है। जो सीमाओं से युक्त है, सीमाओं में बंधा है, ससीम है, वही सांत है, उसके ज्ञान की अपनी सीमाएं हैं, परंतु ईश्वर ने हमें ‘मन’ नाम का एक ऐसा कंप्यूटर दिया है, जिसकी शक्तियां अनंत को खोजने की सामथ्र्य रखती हैं। इसी को ‘मानसिक बल’ कहते हैं। अनंत को खोजने की सामथ्र्य से युक्त होने की प्रार्थना ही हर आर्य परिवार अपने यज्ञों में करता है कि हे अनंत ज्ञानैश्वर्य संपन्न, असीम प्रभो! मुझे अपनी अनंतता का दिग्दर्शन कराइए, बोध कराइए। हे दयानिधान! मुझे इतनी सामथ्र्य प्रदान कर कि मैं तेरे अनंत ज्ञानैश्वर्य का दर्शन कर सकूं। यह अलग बात है कि मनुष्य बहुत कुछ जानकर भी ‘नेति नेति’ कहकर अपनी हार मान लेता है-पर तब तक उसकी बुद्घि इतनी अहंकार शून्य हो चुकी होती है कि वह ईश्वर से तब उसका ज्ञानैश्वर्य न मांगकर अपनी मुक्ति मांगने लगता है। वह समझ जाता है कि उसको अनंतता की वास्तविक अनुभूति तो मोक्ष में ही हो सकती है, जिसमें दीर्घकाल तक आनंद लिया जा सकता है। मृत्यु से तो लौटा जाएगा और यह भी निश्चित है कि वहां से शीघ्र ही लौटा जाएगा-जिससे उस अनंत के अनंत ज्ञानैश्वर्य को समझने में बाधा आती रहेगी, पर यदि मुक्ति हो गयी या मोक्ष मिल गया तो ये बंधन और बाधा की सीमाएं या साम्राज्य दीर्घकाल तक के लिए समाप्त हो जाएगा।
भारतीय संस्कृति के इस मार्ग को लोग समझ नहीं पाये या समझकर भी उसे समझने का प्रयास उन्होंने नहीं किया। हम भारतीयों की अपनी सांस्कृतिक परंपराओं का विश्व ने उपहास उड़ाया और हमें अपने सनातन धर्म से दूर रहने का उपदेश करने लगा। पर अब समय बदल रहा है, आज भारत का ज्ञान पुन: विश्व का मार्गदर्शन कर रहा है। वेद की कहीं गयी बातें चरितार्थ हो रही हैं। अंग्रेजी के चाटुकार इसे अंग्रेजी का ज्ञान मानते हैं और सोचते हैं कि हमें जो कुछ भी मिल रहा है वह अंग्रेजी के कारण मिल रहा है। वस्तुत: यह उनकी भूल है।
विश्व के लिए प्रसन्नता की बात है कि नासा ने ऐसी अन्य सात पृथ्वियों की खोज की है जिनका अपना सूर्य है और जिन पर एक साथ दिन-रात होते हैं। ये सातों पृथ्वियां इस पृथ्वी से चालीस प्रकाश वर्ष दूर हैं। इन सातों पृथ्वियों में से तीन पर इस पृथ्वी की भांति जीवन संभव माना जा रहा है। इनका सूर्य इस सूर्य की अपेक्षा कम ठंडा है। इनकी दूरी को किलोमीटरों में 378 लाख करोड़ किलोमीटर माना गया है। सातों ग्रहों के बीच की दूरी इतनी कम है कि एक ग्रह पर खड़े होकर दूसरे ग्रह के बादलों को आसानी से देखा जा सकता है।
अज्ञानता वश कुछ लोग अंतरिक्ष के ऐसे रहस्यों को ‘कुदरत का करिश्मा’ मान लेते हैं, पर ऐसा नहीं है। वेद की भाषा में ये ईश्वर के चमत्कार नहीं हैं, अपितु उसके ज्ञानैश्वर्य का विस्तार हैं। इन्हें चमत्कार मानने वालों की दृष्टि में ईश्वर कोई जादूगर है जो छिप-छिपकर अपना खेल दिखाता है और मानव के नेत्रों पर  जादू की पट्टी बांधे रखता है। जबकि वेद की भाषा में ईश्वर मनुष्य को ‘अमृतपुत्र’ कहकर उसे अपने ज्ञानामृत को पिला पिलाकर इस योग्य बनाने की अपेक्षा करता है कि तू मेरी अंगुली पकड़ और आ चल मेरे साथ-मेरे बागों में या उद्यानों में (मेरे अनंत ज्ञानैश्वर्य में) भ्रमण कर। चिंतन का ही तो अंतर है-कोई उसे ‘बाजीगर’ मान रहा है तो कोई उसे अनंत ज्ञानैश्वर्य संपन्न साम्राज्य का विभु-प्रभु मान रहा है।
न खिजा में है कोई तीरगी न बहार में है कोई रोशनी
ये नजर-नजर के चिराग हैं कहीं जल गये कहीं बुझ गये

ऐतरेय ब्राह्मण में कहा गया है कि सूर्य न कभी अस्त होता है न उदय होता है, जो इसको अस्त होता हुआ जानता है-वह केवल अज्ञानी है। सूर्य तो हर क्षण उदित रहता है। ऋग्वेद (8-70-5) में कहा गया है कि ‘शतं सूर्या’ : अर्थात सूर्य तो सैकड़ों हैं। अन्यत्र वेद ‘नाना सूर्यास्ति’: कहकर अपनी बात को और भी विस्तार दे देता है कि ऐसे सूर्य तो अनेकों हैं। तो ऐसी पृथ्वी भी अनेकों हैं। वेद कहता है कि सूर्य ‘स्वधा शक्ति’ से अटका है। ऐसा ऋग्वेद 10-126-16 में आया है। यह ‘स्वधा शक्ति’ क्या है? निश्चित रूप से अपने आपको अपने आप ही धारण करने का नाम स्वधा शक्ति है। उसे अपने आपको धारने के लिए किसी अन्य की शक्ति का आश्रय नहीं लेना पड़ता। यजुर्वेद में (23/10) कहा गया है कि ‘सूर्य एकाकी चरति’ सूर्य अकेला घूमता है। वह किसी दूसरे के चारों ओर नहीं घूमता।
इस सूर्य को बने हुए हमारी मान्यता के अनुसार एक अरब सत्तानवें करोड़ वर्ष हो चुके हैं और अभी यह अगले दो अरब 35 करोड़ वर्ष के लगभग और रहेगा। इसकी एक किरण को पृथ्वी तक आने में सवा आठ मिनट का समय लगता है जबकि प्रकाश 3 लाख किलोमीटर प्रति सैकंड की गति से दौडक़र चलने की क्षमता रखता है। इस समय तक अर्थात सूर्य को बने हुए लगभग दो अरब वर्षों में सूर्य की कुल 10 प्रतिशत हाइड्रोजन का ही व्यय हो पाया है। हाइड्रोजन से हीलियम बनने की मात्रा 60 करोड़ टन प्रति सैकंड है। यदि 20 प्रतिशत हाइड्रोजन का व्यय और हो जाए तो सूर्य का ताप इस योग्य नहीं रहेगा कि प्राणियों को पूरा अन्न कोयला धातु आदि वस्तुएं मिल सकें और उनका जीवन निर्वाह हो सके। इसलिए चार अरब 32 करोड़ वर्षों के पश्चात ईश्वर को अपनी व्यवस्था को सुचारू रूप में चलाये रखने के लिए सूर्य को परमाणु रूप में लाना पड़ता है और नया विस्फोट करके हाइड्रोजन की सूर्य में पुन: स्थापना करनी पड़ती है। सृष्टि उत्पत्ति व प्रलय का यही रहस्य है। इसे कोई ‘अमृतपुत्र’ ही जान सकता है। ‘मूर्ख फलकामी’ तो इसे कुछ और ही समझेगा।
ईश्वर के अनंत ज्ञानैश्वर्य में व्याप्त अनेकों लोकों में ज्ञान विज्ञान फूल-फल रहा है। आज का वैज्ञानिक धीरे-धीरे इस रहस्य को भी समझ रहा है। इस रहस्य से पर्दा तब और भी अधिक स्पष्टता से उठ जाता है जब अज्ञात लोकों से आने वाली उडऩतश्तरियां देखी जाती हैं। उन अतिथियों (उडऩतश्तरियों) को हमारी तो जानकारी है पर हम उन्हें नहीं जानते लेकिन उनके आने से एक बात तो स्पष्ट है कि धरती की संतान मानव को अपने ज्ञान पर किसी प्रकार का गर्व करने की आवश्यकता नहीं है, धरती बहुत बड़ी है (सात धरती और मिल जाने को जोडक़र देखने की आवश्यकता है) अभी तो इस धरती के टुकड़ों को (अर्थात अपनी धरती को) भी तू पूरा नहीं समझ पाया है और तुझे दूसरे (उडऩतश्तरी वाले) समझ गये हैं। सच ही तो है-
”वेद की ज्योति जलाया करो
वेद पढ़ो और पढ़ाया करो।”

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