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बीजेपी कर्नाटक विधानसभा चुनाव जीतना क्यों समझती अपने लिए खास ?

प्रणब ढल सामंता

ऊपरी तौर पर कर्नाटक चुनाव बीजेपी के लिए ऐसे राज्य में सत्ता में वापसी की चुनौती जैसा लगता है, जिसने निकट भविष्य में किसी सत्तारूढ़ दल को दोबारा सत्ता नहीं सौंपी है। वहीं, कांग्रेस के लिए यह हिमाचल प्रदेश में मिली जीत के बाद ऐसा एक और मौका है, जब वह लगातार गिरावट का ट्रेंड पलट सकती है। लेकिन यह सिर्फ इतना ही नहीं है, इसमें और भी बहुत कुछ है जो दक्षिण के राजनीतिक परिदृश्य में हो रहे बड़े बदलावों की वजह से पहली नजर में नहीं दिखता।

संभावनाओं का खुला आसमान
विंध्य के दक्षिण का क्षेत्र बीजेपी के लिए शुरू से चुनौतीपूर्ण रहा है। इसीलिए अपने प्रभाव क्षेत्र को अखिल भारतीय स्वरूप देने का इरादा रखने वाली इस पार्टी के लिए यह राज्य बहुत खास है।

कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी की कुल 130 लोकसभा सीटों में से बीजेपी के पास महज 29 हैं जिनमें 25 सिर्फ कर्नाटक से हैं।
बीजेपी की 303 लोकसभा सीटों में दक्षिणी राज्यों की हिस्सेदारी 10 फीसदी से भी कम है।

कर्नाटक में धुआंधार रैलियां कर रहे हैं पीएम नरेंद्र मोदी

जाहिर है, बीजेपी के लिए यह दक्षिण में दखल बढ़ाने के प्रयासों के लिहाज से ऐतिहासिक मौका है। लेकिन इसके लिए भाषा की बाधा को पार करना ही काफी नहीं। उसे मतदाताओं की सोच और उनके सपनों को समझने की जरूरत है, कुछ वैसे ही जैसे उसने अन्य क्षेत्रों में समझा है।

बीजेपी को जाति आधारित रणनीति का पैटर्न तोड़ते हुए मतदाताओं के बड़े दायरे तक अपनी पहुंच बनाने के लिए नरेंद्र मोदी के विकास मॉडल पर केंद्रित एक प्रभावी प्रचार अभियान खड़ा करना होगा।
दिक्कत यह है कि नॉर्थ के विपरीत साउथ की जाति आधारित क्षेत्रीय पार्टियों का लोक कल्याण और विकास का मॉडल काफी प्रभावी साबित हुआ है।
टीडीपी और एआईएडीएमके जैसी पार्टियां इस मामले में ट्रेंड सेटर रही हैं चाहे बात सस्ते चावल की हो या अन्य मुफ्त चीजों और सेवाओं वाली योजनाओं की।
लेफ्ट ने भी पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा के मुकाबले केरल में अपने वेलफेयर मॉडल को ज्यादा असरदार ढंग से लागू किया।
ये राज्य पिछले दो-तीन दशकों में आर्थिक विकास के केंद्र बनने में भी काफी हद तक कामयाब रहे हैं।
बेंगलुरु, हैदराबाद और चेन्नै जैसे शहर नब्बे के दशक से ही विदेशी निवेशकों के पसंदीदा ठिकाने रहे हैं।
यही वजह है कि दक्षिण भारत की क्षेत्रीय पार्टियों ने राष्ट्रीय दलों को अर्थव्यवस्था और लोक कल्याण की राजनीति से जुड़ा अपना नजरिया बदलने को बाध्य कर दिया। लेकिन यह भी सच है कि पैसे के साथ भ्रष्टाचार का लेवल ऊंचा होता गया। व्यक्तित्व आधारित ऐसी राजनीति मजबूत हुई, जहां परिवार के वर्चस्व वाली पार्टियां उद्यमों में बदलती गईं और चुनाव जीतने के लिए जातीय निष्ठा और ज्यादा चुनावी खर्च पर निर्भरता बढ़ती गई। तथ्य यह है कि इन पार्टियों और इनके प्रथम परिवारों ने अपने वोट बेस के विस्तार पर ध्यान नहीं दिया। उनका पूरा फोकस सिर्फ अपने मुख्य समर्थक वर्ग को नहीं बंटने देने पर बना रहा।

कर्नाटक के हावेरी में बीजेपी का रोड शो

उत्तराधिकार की लड़ाई
लेकिन इन दलों में शुरू हो चुकी उत्तराधिकार की लड़ाई की रोशनी में देखें तो लगता है कि दक्षिण भारत की राजनीति का यह दौर अब अपने अंत के करीब है। नब्बे और दो हजार के दशक में बना इकॉनमिक प्रोफाइल हालांकि अभी भी प्रभावित करता है, लेकिन सिकुड़ते अर्बन स्ट्रक्चर और बढ़ते लोक कल्याण खर्च के मद्देनजर इसका जादू ढलता लग रहा है।

तो सवाल यह है कि क्या भारत का भावी ड्राइविंग इकॉनमिक इंजन दक्षिण भारत बड़े राजनीतिक बदलाव के मुहाने पर खड़ा है? आखिर अतीत को आकार देने वाले क्षेत्रीय क्षत्रपों की एक पूरा दौर या तो गुजर चुका है या कमान नई पीढ़ी को सौंपने की तैयारी कर रहा है। तमिलनाडु में एआईएडीएमके और केरल में लेफ्ट को छोड़ दें तो कमान भी परिवार की नई पीढ़ी को सौंपी जा रही है। देवेगौड़ा, बी एस येदियुरप्पा, वाईएसआर, केसीआर और चंद्रबाबू नायडू जैसे तमाम नाम इस सवाल से जूझ रहे हैं कि आगे क्या? ये सब उत्तराधिकार योजना का अपने वोटर बेस के साथ तालमेल बिठाने की कोशिशों में उलझे हैं।

इस पृष्ठभूमि में बीजेपी के लिए दक्षिण भारत में पैठ बनाने का अच्छा मौका है। खासकर इसलिए भी कि इस वक्त उसके पास अपेक्षाकृत मजबूत केंद्रीय नेतृत्व है। निश्चित रूप से वह दक्षिण में एक प्रमुख वैकल्पिक राष्ट्रीय पार्टी के रूप में उभरना चाहेगी। यही कारण है कि कर्नाटक चुनाव इस बार उसके लिए एक सामान्य विधानसभा चुनाव मात्र नहीं है। यह 2024 के लोकसभा चुनावों के मद्देनजर साउथ में एक बड़ी पहल की शुरुआत है।

बीजेपी येदियुरप्पा के लिंगायत वोटरों पर प्रभाव की अहमियत समझती है, लेकिन उसके सामने चुनौती मोदी की अखिल भारतीय छवि के आधार पर बीजेपी की पहुंच बढ़ाने को लेकर है।
लेकिन इसके साथ ही उसे भविष्य के लिए ऐसी आर्थिक योजना तैयार करनी होगी, जो दक्षिण भारत के जज्बे के अनुरूप हो और मौजूदा ईको सिस्टम को नए लेवल पर ले जा सके।
कैसे बने पकड़
साफ है कि अगर 2014 का चुनाव बीजेपी के लिए उत्तर प्रदेश को डीकोड करने और 2019 असम, पश्चिम बंगाल और नॉर्थ-ईस्ट के जरिए उसके सुदूर पूर्व में विस्तार करने का मौका था तो 2024 उसके दक्षिण पर पकड़ बनाने का अभियान साबित हो सकता है। इस लिहाज से कर्नाटक उसकी पहली परीक्षा है, जहां अच्छे प्रदर्शन की बदौलत वह 2024 लोकसभा चुनावों के मद्देनजर उतना ही मजबूत संदेश दक्षिण के तमाम राज्यों को दे सकती है।

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