महाराष्ट्र की जनता ने राष्ट्रवाद बनाम छद्म धर्मनिरपेक्षतावाद के बीच स्पष्ट अंतर करने वाला जनादेश देकर भाजपा को वहां की नगर पालिकाओं/महानगरपालिका में शानदार सफलता प्रदान की है। महाराष्ट्र की जनता के इस परिपक्व निर्णय से स्पष्ट हो गया है कि वह अपने राष्ट्रवादी नेतृत्व के साथ कई प्रकार के भौतिक और मानसिक कष्ट झेल सकती है पर उसे सर्वप्रथम राष्ट्र चाहिए। अब उसे किसी प्रकार की ओच्छी राजनीतिक संकीर्ण मानसिकता अपने किसी पथ से भ्रमित नहीं कर सकती।
हम सभी ने नवंबर 2016 में मोदी सरकार के नोटबंदी के निर्णय से उपजी परिस्थितियों को अपनी आंखों से देखा है। जब लोगों ने लंबी लंबी लाइनों में खड़े होकर नोट निकालने के लिए प्रतीक्षा की थी। हमें यह भी पता है कि देश के कई लोगों को अपनी बेटी के विवाह के लिए पैसे की व्यवस्था करने में भी भारी समस्याओं का सामना करना पड़ा था। पर सबने उन बातों को भुला दिया और मान लिया कि देश के लिए इससे भी अधिक कष्ट उठाना पड़े तो उठाएंगे। देश की लोकतंत्र प्रेमी जनता ने स्पष्ट कर दिया है कि यह देश है वीर जवानों का….। कौन से वीर जवान? वही वीर जवान जिन्होंने इस देश की उन्नति के लिए इसके जनजन के विकास के लिए और इसकी स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की भी चिंता नहीं की थी, ये वही वीर जवान थे जिनका यौवन जेल की सलाखों के पीछे बीत गया या फांसी के तख्ते पर झूल गया। ऐसे वीर जवानों ने अपनी गर्दन का मोल नहीं लिया। अब जिस देश में देश के लिए कष्ट उठाने वालों की एक सतत परंपरा रही हो, उसमें नोट निकालने के लिए लगी लंबी लाइनों में मिलने वाले कष्टों को लोग भला कैसे कष्ट मानेंगे? जो लोग उस समय देशवासियों की भावनाओं से खिलवाड़ कर उन्हें भ्रमित करने का प्रयास कर रहे थे-उन्हें भी सही स्थान महाराष्ट्र की जनता ने दिखा दिया है।
महाराष्ट्र के विषय में हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि-
ये है अपना देश मराठा जहां शिवाजी डोला था
मुगलों की ताकत को जिसने तलवारों से तोला था

जिस शिवाजी ने समग्र भारत के लिए अनवरत संघर्ष किया और विदेशी क्रूर सत्ताधीशों को इस देश की पावनभूमि से खदेडक़र बाहर निकालने के अथक प्रयास किये, उस शिवाजी की परंपरा को जिन लोगों ने ‘मराठी मानुस’ की संकीर्ण सोच से धुंधला करने का प्रयास किया-महाराष्ट्र की जनता ने उन्हें इन चुनावों में धोकर रख दिया है, और उन्हें अपना स्पष्ट संदेश दे दिया है कि शिवाजी का महाराष्ट्र संकीर्ण नहीं हो सकता, स्वार्थी नहीं हो सकता। वह समग्र भारत के  ओजस्वी चिंतन का प्रतिनिधि है और ऐसा ही बना रहेगा। महाराष्ट्र की सीमाओं को शिवाजी और उनकी परंपरा ने इस देश से विदेशी शासन को उखाडक़र आज के हिमाचल, पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना तक फैला दिया था। स्पष्ट है कि इतना बड़ा साम्राज्य तो बाबर, हुमायूं अकबर, जहांगीर का भी नहीं था। आज भी महाराष्ट्र की जनता यह जानती है कि उसकी वास्तविक चिंतनधारा कितनी विशाल है? जिन राजनीतिक दलों ने महाराष्ट्र को संकीर्ण बनाकर प्रांतवाद की घातक राजनीति का शिकार बनाने का प्रयास किया उन्हें पता चल गया कि इस प्रांत के महान राष्ट्रचितनशील लोगों को वह भ्रमित नहीं कर सकते।
इसी समय एक और महत्वपूर्ण घटना यह हुई है कि कांग्रेस की अनुभवी नेता और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने कहा है कि कांग्रेस के नेता राहुल गांधी अभी ‘मेच्यौर’ नहीं हुए हैं। उन्हें कुछ सीखने के लिए कुछ समय दिया जाए। महाराष्ट्र में कांग्रेस की जिस प्रकार फजीहत हुई है उसके दृष्टिगत श्रीमती दीक्षित का यह बयान बहुत महत्वपूर्ण है। वह अनुभवी नेता हैं और उन्होंने जो कुछ बोला है-वह अनुभव के आधार पर ही बोला है। उनके बोलने का अर्थ है कि यदि कांग्रेस के नेता राहुल गांधी परिपक्व होते तो वह पूरी कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में सपा की साईकिल के कैरियर पर लेकर नहीं बैठते। कांग्रेस के लिए उनका यह निर्णय आत्मघाती सिद्घ हो सकता है। यह एक दुखद बात है कि देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी का मुखिया अपनी पार्टी को कल परसों की सपा की मार्केट में जाकर नीलामी पर लगा दे और 403 सीटों पर लडऩे वाली कांग्रेस को 105 सीटों पर लडऩे तक सीमित कर ले। इससे प्रदेश की लगभग 300 सीटों पर कांग्रेसियों को उन्होंने सपा के लिए काम करने के लिए छोड़ दिया है। निश्चय ही ऐसी परिस्थितियों में आगे आने वाले चुनावों में कांग्रेस को अपने प्रत्याशी ढूंढऩे भी कठिन हो जाएंगे।
महाराष्ट्र में कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया है। इससे भाजपा को अपनी पीठ थपथपाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि कांग्रेस का सूपड़ा साफ होने में मोदी का जादू उतना काम नहीं कर रहा है, जितनी उसके नेता की अपरिपक्वता काम कर रही है। बिना किसी ठोस योजना के सभाएं करना और बिना किसी मुद्दे के बोलना या अस्पष्ट बोलना या अनर्गल (मैं बोलूंगा तो भूकंप आ जाएगा) बोलना जनता का मनोरंजन तो कर सकता है-पर उसे सही दिशा नहीं दे सकता। इसलिए सचमुच कांग्रेसी नेता को अभी कुछ सीखने के लिए कुछ समय मिलना चाहिए।
जहां तक भाजपा की बात है तो इस पार्टी को यह समझ लेना चाहिए कि उसके ‘अच्छे दिन’ इसलिए आये हैं कि आगे मैदान में राहुल गांधी हैं। काश! आज इंदिरा गांधी होती? तब पता चलता कि किसकी बाजुओं में कितना दम है?
फिर भी भाजपा ने राष्ट्रवाद की जिस बयार को चलाने का प्रयास पीएम मोदी की नेतृत्व में किया है-वह समयानुकूल है। देश की जनता इस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को समझ रही है, यह और भी अधिक प्रशंसनीय है। भाजपा को चाहिए कि भारत की समतामूलक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा को वह और भी  अधिक बलवती करे और देश के लोगों को सही रास्ता दिखाते हुए इस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को भारत के शासन के पंथनिरपेक्ष स्वरूप के साथ समायोजित करते हुए प्रस्तुत करे, जिससे हर भारतवासी को लगे कि वह उस लोकतांत्रिक भारत में रहता है जहां ‘सबका साथ सबका विकास’ उसके राष्ट्रवाद का मूलमंत्र है। महाराष्ट्र की जनता का एक बार पुन: अभिनंदन।

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