यज्ञ ही वैदिक संस्कृति का प्राण :: प्रो . शास्त्री

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मुजफ्फरपुर ,बिहार ।रविवार को घिरनीपोखर स्थित आर्यसमाज मन्दिर मुजफ्फरपुर के साप्ताहिक अधिवेशन के तहत वैदिक यज्ञ व सत्संग कार्यक्रम सविधि संचालित हुए। यज्ञ का आचार्यत्व करते हुए बिहार राज्य आर्य प्रतिनिधि सभा के मंत्री व ”भारत को समझो अभियान”” के राष्ट्रीय महामंत्री व महोपदेशक प्रो.डा.व्यासनन्दन शास्त्री वैदिक ने कहा कि यज्ञ जहां मानव जीवन का श्रेष्ठतम कर्म है, वैदिक संस्कृति का प्राण है, क्योंकि यज्ञकर्म के बिना कोई भी धार्मिक कार्य सिद्ध नहीं होता। चाहे गर्भाधान से अन्त्येष्टि पर्यन्त षोडश संस्कार हो, भूमिपूजन- शिलान्यास हो,गृह-प्रवेश हो व वाणिज्य -व्यापार व किसी भी मांगलिक कार्य की शुरुआत करनी हो ,सर्वत्र यज्ञ कार्य की प्रधानता है। यज्ञकुंड में मंत्रोच्चारण पूर्वक पड़ी आहुतियां जन -कण को पवित्र करती हुई विश्वकल्याण करती हैं और सामाजिक समरसता को बढ़ाती है , तथा पर्यावरण को परिमार्जित व शुद्ध -पवित्र कर सभी प्रकार के प्रदूषणों से मुक्त कराती हैं।


डॉ शास्त्री ने कहा कि हमारे यहां अश्वमेध यज्ञ की परंपरा
इसीलिए रही है कि व्यक्ति जब राष्ट्र, जाति और देश के लिए अपने आप से राष्ट्र को महान समझकर राष्ट्रहित में सर्वस्व समर्पण की भावना से भर जाए, ओत-प्रोत हो जाए तब वह अश्वमेध यज्ञ करने का पात्र बनता है। इसी लिए कहा गया है- ‘‘राष्ट्रं वै अश्वमेधः’’ इस प्रकार राष्ट्रीय होने का अभिप्राय है याज्ञिक होना और याज्ञिक होने का अर्थ है-यज्ञरूप प्रभु का उपासक होना। जैसे उस परमपिता-परमेश्वर के सारे भण्डार इस विशाल जगत के लिए हैं, इसके प्राणधारियों के लिए हैं, वैसे ही राष्ट्रीय व्यक्ति के पास या किसी यज्ञ पुरुष के पास जो कुछ भी होता है वह राष्ट्र के लिए होता है। भारत में कितने ही सम्राट हो गये हैं, जिन्होंने अश्वमेध यज्ञ किये और अपना सर्वस्व राष्ट्र के लिए समर्पित कर दिया।
इस प्रकार हमारे पूर्वजों ने यज्ञ को राष्ट्रीय बनाकर जीवन जिया। यज्ञ के अनुरूप अपनी भावनाएं बनायीं और अपने पास अपना कुछ न समझकर जो कुछ भी था उसे लोककल्याण के लिए समर्पित कर दिया। इसका कारण यही था कि हम यज्ञमय थे और अपना सर्वस्व प्राणिमात्र के लिए होम करने वाले प्रभो के उपासक थे। जैसा हमारा प्रभु था, या दाता था वैसी ही हमारी भावनाएं थीं। यह था हमारे यज्ञ का आधार और यह थी हमारी प्रार्थना की ऊंचाई।
इसी भावना व कामना से आर्य नर-नारियों व बच्चों ने गायत्री मंत्र, मृत्यंजय मंत्र , राष्ट्र समृद्धि मंत्र , मंगलाष्टक मंत्रों तथा पर्यावरण- परिशोधक हव्य -द्रव्यों से विश्व कल्याणार्थ आहुतियां दी गईं। कार्यक्रम की अध्यक्षता आर्यसमाज मुजफ्फरपुर के प्रधान श्री नन्द किशोर ठाकुर ने की । कार्यक्रम में भाग लेने वालों मुख्य उप प्रधान डॉ. महेश चंद्र प्रसाद, उप प्रधानों में सर्व श्री वेद प्रकाश आर्य, विमल किशोर उप्पल, राजीव रंजन आर्य, भागवत प्रसाद आर्य, कमलेश दिव्यदर्शी, मनोज कुमार चौधरी अधिवक्ता, डॉ.विमलेश्वर प्रसाद विमल, समरजीत कुमार, प्रदीप कुमार आर्य, सतीश चंद्र प्रसाद, ओमेंद्र कुमार सिंह कोषाध्यक्ष, डॉ . प्रदीप कुमार,राधारमण आर्य, श्यामसुंदर आर्य, कृष्ण चंद्र प्रसाद, अरुण कुमार आर्य , सुशीला देवी आर्या, ईश्वर चंद्र प्रसाद, अरुण कुमार आर्य (आमगोला )कृष्ण कुमार आर्य, संजय कुमार केजरीवाल, दीनबंधु आजाद अधिवक्ता, अनिल कुमार मेहता, वीरेन्द्र प्रसाद आर्य ,राजा वर्णवाल,प्रमोद कुमार सिंह, प्रमोद कुमार आर्य,अमरनाथ चटर्जी ,.पं.गोपाल जी आर्य , डॉ .ब्रजेन्द्र कुमार आदि अनेक गणमान्य आर्य महानुभाव उपस्थित हुए।

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