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🌻(1) अजन्मा:- ईश्वर को वेद में अजन्मा कहा गया है।यथा ऋग्वेद में कहा है कि-
अजो न क्षां दाधारं पृथिवीं तस्तम्भ द्यां मन्त्रेभिः सत्यैः ।
अर्थात् ‘वह अजन्मा परमेश्वर अपने अबाधित विचारों से समस्त पृथिवी आदि को धारण करता है।’
इसी प्रकार यजुर्वेद में कहा है कि ईश्वर कभी भी नस-नाड़ियों के बन्धन में नहीं आता अर्थात् अजन्मा है।
ईश्वर को अजन्मा मानने में सबसे अधिक प्रबल युक्ति यह है कि जन्म के साथ अनेक ऐसी बातें जुड़ी हुई हैं जो ईश्वर के गुण,कर्म,स्वभाव के विपरित है।जैसे जो जन्मता है वह मृत्यु को भी अवश्य प्राप्त होता है तथा जन्म के साथ ही शरीर आदि में होने वाले दुःखों को सहना पड़ता है जिससे ईश्वर को आनन्दस्वरुप नहीं माना जा सकेगा और जो इस प्रकार से जन्म-मरण के चक्र में पड़ने वाला होगा उसे न तो सर्वव्यापक ही कहा जा सकता है और न सर्वशक्तिमान।
और वेदों में वर्णित ईश्वर के स्वरुप में उसके एक गुण का दूसरे गुण से ऐसा मेल है कि एक गुण से दूसरा गुण स्वतः ध्वनित होने लगता है यथा-सच्चिदानन्द होने से वह निराकार है क्योंकि आकार का तात्पर्य है सावयव होना और सावयव कभी भी सर्वशक्तिमान नहीं हो सकता क्योंकि अवयवों का संयोग बिना दूसरे के किए नहीं हो सकता।अतः ईश्वर निराकार है और निराकार होने से वह सर्वशक्तिमान है।सर्वशक्तिमान होने से वह न्यायकारी है और न्यायकारी होने से दयालु तथा अजन्मा है।क्योंकि जो जन्म-मरण वाला हो वह सर्वशक्तिमान नहीं हो सकता न आनन्द स्वरुप ही होता।
🌻(2) ईश्वर अनन्त है:-
अजन्मा होने से ईश्वर अनन्त है क्योंकि जन्म मृत्यु की अपेक्षा रखता है,मृत्यु अर्थात् अन्त और जन्म एक दूसरे की पूर्वापर स्थितियाँ हैं अतः ईश्वर अनन्त अर्थात् अन्त से रहित है।वेद में ईश्वर को अनन्त बताते हुए कहा है-
अनन्त विततं पुरुत्रानन्तम् अनन्तवच्चा समन्ते।
अर्थात् ‘अनन्त ईश्वर सर्वत्र फैला हुआ है।’
🌻(3) ईश्वर निर्विकार है:-
अजन्मादि गुणों की पुष्टि के लिए वेद में ईश्वर को निर्विकार कहा है क्योंकि विकारादि जन्म की अपेक्षा रखते हैं और ईश्वर को ‘अज’ अर्थात् अजन्मा कहा है।अतः वह निर्विकार अर्थात् शुद्धस्वरुप है।वेद की इसी मान्यता के आधार पर महर्षि पातञ्जलि ने योग दर्शन में लिखा है-
‘क्लेशकर्म विपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविषेश ईश्वरः’
अर्थात् जो अविद्यादि क्लेश,कुशल-अकुशल,इष्ट-अनिष्ट और मिश्रफल दायक कर्मों की वासना से रहित है वह सब जीवों से विषेश ईश्वर कहाता है।
🌻(4) ईश्वर अनादि है:-
ईश्वर का कोई आदि नहीं है इसलिए वह अनादि है क्योंकि आदि के साथ अन्त भी लगा होता है अर्थात् जिसका जन्म होता है उसकी मृत्यु भी अवश्य होती है और जिसकी उत्पत्ति होती है उसका विनाश भी अवश्य होता है।इस विषय में यह विचार करना भी आवश्यक है कि आदि और अन्त क्या है?वास्तव में किसी तत्व के प्रकट होने को उत्पन्न होना कहा जाता है अर्थात् उसका अप्रकट हो जाना अन्त कहलाता है अर्थात् जब परमाणुओं के विशेष संयोग से कोई विशिष्ट वस्तु प्रकट होती है तब उस वस्तु की उत्पत्ति मानी जाती है और परमाणुओं के विखण्डित हो जाने को ही उस वस्तु का नष्ट होना कहा जाता है।
सामवेद में ईश्वर के अनादि स्वरुप को निरुपित करते हुए कहा है-
“जजुषा सनादसि” अर्थात् ईश्वर सनातन(अनादि) है।
🌻(5) ईश्वर अनुपम है:-
वेद के अनेक मन्त्रों में ईश्वर को अनुपम कहा है अर्थात् उसके समान शक्ति सम्पन्न अन्य कोई नहीं इसलिए वह अनुपम है। जैसा कि सामवेद में कहा है कि-
न कि इन्द्र त्वदुत्तरं न ज्यायो अस्ति वृत्रहन् ।न क्येवं यथा त्वम् ।।
अर्थात् ईश्वर के समान न ही तो कोई श्रेष्ठ है और न ही उससे ज्येष्ठ है।अथर्ववेद में कहा है ‘तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे’ अर्थात् संसार में कुछ भी ऐसा नहीं है जिससे ईश्वर की उपमा दी जा सके इसलिए वह अनुपम है।
🌻(6) सर्वाधार:-
वेद की चारों मन्त्र संहिताओं में ईश्वर को समस्त चराचर जगत एवं जीवों का आधार कहा गया है अर्थात् समस्त पृथ्वी आदि लोक-लोकान्तर उसी के आधार पर टिके हैं इसलिए वह सर्वाधार है।परमात्मा की शक्ति का वर्णन करता हुआ उपनिषद कहता है-“सूर्य,चन्द्रमा,तारे,बिजली और अग्नि ये सब ईश्वर में प्रकाश नहीं कर सकते किन्तु इन सबको प्रकाशित करने वाला एक वही ईश्वर है।”
ऋग्वेद में कहा है-
स दाधार पृथ्वीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम। अर्थात् ईश्वर पृथ्वी और द्युलोक दोनों का आधार है,वही सबका आधार है।
प्रश्न:-जब ईश्वर सबका आधार है तब ईश्वर का आधार क्या है?
उत्तर:-ईश्वर सबका आधार होने के साथ-साथ स्वयं अपना भी आधार है क्योंकि आधार उसको कहा जाता है जो सर्वशक्तिमान है इसलिए वह सबका आधार है और उसका अन्य कोई आधार नहीं हो सकता क्योंकि किसी का आधार उससे अधिक शक्तिशाली ही होता है, लोक में भी हम देखते हैं कि प्रत्येक निर्बल अपने से सबल के आश्रय में ही रहता है और कोई भी अपने से निर्बल के आश्रय में नहीं रहता इसी प्रकार क्योंकि ईश्वर से अधिक शक्ति सम्पन्न अन्य जीवादि कोई नहीं इसलिए उसका कोई आधार नहीं।
उदाहरणार्थ-एक राज्य में सब राजा के आश्रित होते हैं किन्तु राजा किसी के आश्रित नहीं होता इसी प्रकार ईश्वर भी सर्वाधार है।
आईये वेद विदित ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना एवं उपासना सब मिलकर करें।
– सुभाषिनी आर्य

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