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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से महत्वपूर्ण लेख

उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय का सराहनीय निर्णय

उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए गंगा-यमुना को एक जीवित व्यक्ति के से अधिकार प्रदान किये हैं। जिससे इन दोनों नदियों को ‘लीगल स्टेटस’ मिल गया है। उच्च न्यायालय ने अगले 8 सप्ताह में गंगा प्रबंधन बोर्ड बनाने का आदेश भी केन्द्र सरकार को दिया है। उच्च न्यायालय का मानना है कि यदि राज्य सरकार गंगा प्रबंधन बोर्ड बनाने में किसी प्रकार का असहयोग करती है तो केन्द्र सरकार को यह कार्य भारतीय संविधान की धारा 365 के अंतर्गत करना चाहिए जो उसे कुछ विशेष परिस्थितियों में विशेषाधिकार प्रदान करती है। इस प्रकार माननीय न्यायालय ने हर परिस्थिति में गंगा की निर्मलता को सुनिश्चित करने-कराने की भावना पर बल दिया है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात हमारे देश मेंं जिन लोगों ने एक काल्पनिक ‘गंगा-जमुनी संस्कृति’ का राग अलापना आरंभ किया उनकी यह काल्पनिक अवधारणा जितनी दोगली और अतार्किक थी उतने ही अनुपात में उन्होंने इन नदियों को दोगला गंदला और अतार्किक ढंग से इनके पानी को मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बनाने का प्रयास किया। ‘गंगा-जमुनी संस्कृति’ के ये अलम्बरदार गंगा-यमुना की पवित्रता के प्रति भारतीय लोगों की आस्था को एक कोरा धार्मिक आडम्बर या पाखण्ड मानते रहे और यदि कोई हिंदू मां गंगे कहकर गंगा को संबोधित करता था तो उसका ये लोग उपहास उड़ाते थे। हमारे पूर्वज गंगा-यमुना जैसे पवित्र नदियों के साथ-साथ अन्य नदियों या तालाबों के पानी में थूकना भी ‘पाप’ मानते थे। ‘गंगा-जमुनी संस्कृति’ के अलम्बरदारों ने इन नदियों में पहले तो शहरों-कस्बों का गंदा पानी लाकर डालना आरम्भ कर दिया। फिर पशु-कटान केन्द्रों का खून भी इन्हीं में लाकर डालना आरंभ कर दिया। ये पशुवध केन्द्र ‘गंगा-जमुनी संस्कृति’ के पुजारियों के पूजा स्थल थे, जिनसे निकलने वाला रक्त इनकी दृष्टि में शिवजी के जलाभिषेक से स्नान कराने से मिलने वाले जल से या जमजम के पवित्र जल से कम पवित्र नहीं रहा है। इस प्रकार यदि गंगा-यमुना में ये लोग पशुओं का रक्त लाकर डालते रहे तो वह इनकी दष्टि में रक्त न होकर पवित्र प्रसाद रहा, जिसे ये मां  गंगा और मां यमुना को देते जा रहे थे। सभ्य समाज के असभ्य लोगों ने अपनी असभ्यता का प्रदर्शन करते हुए इसी प्रकार इन नदियों की पवित्रता को भंग करते हुए सारे गंदे नालों को इन नदियों में लाकर डालना आरंभ किया। शहरों के इन तथाकथित सभ्य लोगों ने अन्य लोगों को मारने के लिए इस प्रदूषित पानी को उनके घर व खेत तक पहुंचाना भी पुण्य समझा। जिससे सारी व्यवस्था ही चरमरा गयी और इन नदियों को चाहे लोग परम्परागत आस्था के चलते सम्मान देते रहे पर वास्तव में इनका जल इतना अपवित्र और प्रदूषित कर दिया गया कि वह हमारे लिए प्राण लेवा बन गया। हमारा राष्ट्रीय चरित्र दोगला हो गया और धुंधला होते-होते विद्रूपित भी हो गया।
पवित्र गंगा नदी को हमारे संवेदनशील लोगों ने प्राचीन काल से ही भारत की अमृत रेखा माना है। यह नदी 2510 से 2525 किलोमीटर लंबी है। स्पष्ट है कि भारत का बहुत बड़ा भाग इस नदी के कारण ही उपजाऊ है। इसका मीठा जल करोड़ों लोगों और असंख्य प्राणियों की प्यास बुझाता है। इसके इस लोककल्याणकारी स्वरूप के कारण ही लोगों ने इसे कृतज्ञता वश मां कहकर पुकारा। यदि हमारी जननी मां ना होती तो जैसे हमारा अस्तित्व नहीं होता वैसे ही यदि पवित्र गंगा नहीं होती तो उत्तर भारत में बहुत बड़ा क्षेत्र अनुपजाऊ होता। हमने इस वैज्ञानिक सत्य और तथ्य को स्वीकार किया और इस नदी को सम्मानवश मां कहा तो ‘गंगा-जमुनी संस्कृति’ के उपासकों ने हमारा उपहास उड़ाया। आज उनकी सोच ने 70 वर्ष में ही इस पवित्र नदी को मानव के लिए विनाशकारी बना दिया है, जबकि हम इसे मां कहकर हजारों, लाखों वर्ष से प्रदूषण मुक्त रखते चले आ रहे थे, यह था गंगा को मां कहने का चमत्कार। जिन लोगों ने गंगा को हमारे लिए विनाशकारी बनाया यह नास्तिकता की पराकाष्ठा का परिणाम है और अपने ऊपर हंसने का आत्मघाती परिणाम भी है।
गंगा पर भारत की 43 प्रतिशत जनसंख्या की आजीविका आश्रित है और यह भारत के 26.4 प्रतिशत भूभाग को हराभरा रखती है। इसके साथ यमुना को और जोड़ दें तो भारत की लगभग आधी जनसंख्या ऐसी हो जाएगी जो इन दोनों नदियों के ऊपर आश्रित है। इन दोनों नदियों की पवित्रता और निर्मलता को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए अभी तक केन्द्र सरकार ने पिछले तीस वर्षों में विभिन्न योजनाओं के माध्यम से अरबों रूपया व्यय किया है। परंतु नेता और अधिकारियों के भ्रष्टाचार के चलते और योजनाओं को पूर्ण मनोयोग से लागू करने की इच्छाशक्ति के अभाव के कारण जनता का यह अरबों रूपया व्यर्थ ही गया है। कारण कि सरकारें कभी भी उन गंदे नालों का मुंह इन नदियों की ओर से मोड़ नहीं पायीं जो इन्हें आ आकर गंदा करते हैं। वे गंदे नाले इन नदियों में आकर पड़ते रहे और इनका प्रदूषण बढ़ाते गये। इसी प्रकार सरकारों ने बूचड़खानों या कट्टीघरों के खून को जारी रखने के लिए निरंतर लाईसेंस जारी करने की नीति भी जारी रखी। जबकि होना ये चाहिए था कि कट्टीघर बंद होते। भारत अपार संभावनाओं का देश है। अत: इसी देश में यह संभव था कि नदियों का अस्तित्व मिटाने के प्रयास करते-करते उन्हें बचाने का भी नाटक किया जाता। फलस्वरूप ये नाटक होते रहे और देश में कट्टीघरों को पूजा स्थल मानने की ‘गंगा-जमुनी संस्कृति’ अपने गुल खिलाती रही।
हमारा मानना है कि ट्यूबवैलों व नलकूपों के माध्यम से हम जितना भूगर्भीय जल का दोहन कर रहे हैं वह सब हमारी मूर्खता है। बड़े-बड़े शहरों, कस्बों में पानी की टंकियां खड़ी की जा रही हैं और भूगर्भीय जल को निकाल-निकाल कर उसे प्रदूषित दूषित कर नदियों को दिया जा रहा है। यह सारी प्रक्रिया ही उल्टी है। जिस पानी को हिमालय से लाकर नदियां भूगर्भ में भरती रही हैं-उसे हम भूगर्भ से निकालकर प्रदूषित कर उल्टा नदियों को दे रहे हैं-यह कैसी सभ्यता है? ऐसे में अपने न्यायालयों को एक आदेश यह भी करना पड़ेगा कि भूगर्भीय जल का दोहन बंद करो और नदियों में गंदे नाले मत डालो। वैसे सही उपाय तो वैदिक याज्ञिक विधान और विज्ञान में निहित है। समय रहते हमें अपने ऋषियों के इस पुण्य वरदान को समझना होगा।

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