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आज का चिंतन

ईश्वर के नाम सिमरन से होता है भीतरी शत्रुओं का नाश

ऋषि राज नागर (एडवोकेट)

परमपिता परमेश्वर का मनन मनोयोग से करना चाहिए। मनोयोग से किए गए सुमिरन का लाभ मिलता है। जो मनुष्य मन से, एकाग्रता से प्रभु का जाप या भजन सुमिरन करता है, तो परमात्मा भजन का फल उसी को मिलता है, जो भजन सुमिरन या जाप करता है। ऐसा सन्त महात्मा फरमाते हैं। “कर्म काण्डी लोग कहते हैं कि ‘सूतक लगा है या सूतक का प्रभाव है।” इस विषय में सन्त महात्मा फरमाते हैं कि –

“जहां नाम नहीं वहां सूतक नहीं, अनेक प्रकार की गन्दगी, भ्रष्टता या ‘सूतक’ है, परन्तु जहां नाम है, वहां किसी प्रकार की अपवित्रता या, ‘सूतक’ के लिए कोई स्थान नही है।

सभी सूतक भरम है, दूजे लगे जाई॥
जमण मरणा हुकम है भाणै आवै जाई ।।
खाणा पीणा पवित्र है दितोन रिजक संबाहि॥
नानक जिनी गुरमुख बुझिया तिन्हा सूतक नाहि ॥

फिर आगे गुरू नानक देव जी फरमाते हैं-

घर – घर पढ़ – पढ़ पंड़ित थके सिध समाधि लगाई ॥
इहु मन बस न आवई, थके करम कमाइं॥
अत: प्रभु या परमात्मा को सर्वोपरि मानते हुए हमें कर्म काण्ड से बचना है।
ऐसे में हमें इसी जन्म में ही प्रभु या परमात्मा को याद करना है। हम दिन की शुरुवात काम या परमात्मा परमात्मा या मालिक या ख़ुदा या God उसे जैसा भी हम मानते हैं, उसके नाम या शब्द से शुरू करें। परमात्मा का ‘नाम’ सन्त- महात्माओं ने दो रूप में माना है, एक नाम वर्णनात्मक है जिसे जिव्हा से बोला पा पढ़ा जा सकता है जैसे राम, रहीम, खदा, राधास्वामी, स्वामी, God आदि-आदि। दूसरा परमात्मा का नाम धुनात्मक है जिसे बोला या पढ़ा नहीं जा सकता है, केवल अनुभव किया जा सकता है वैसे धुनात्मक नाम भजन- सुमिरन के द्वारा एकाग्र देने पर प्रगट होता है।
परमपिता परमेश्वर के नाम जपने से काम, क्रोध, मद ,मोह, लोभ, ईर्ष्या, घृणा, द्वेष जैसे भीतर बैठे शत्रुओं का नाश होता है। ओ३म का सुमरण करने से भीतर बैठे सारे शत्रु धीरे धीरे कर बोरिया बिस्तर उठा कर भागने लगते हैं । उस समय मन को शांति प्राप्त होती है और उसकी चंचलता का नाश होता है। जिससे भक्तों को आत्मिक प्रसन्नता होने लगती है।
जब हम परमपिता परमेश्वर की गोद में बैठें तो उससे अपना सीधा और सरल संवाद स्थापित करें। ऐसा अनुभव करें कि जैसे हम अपने पिता की शरण में आकर उससे उसका आश्रय या संरक्षण मांग रहे हैं और मां की गोद जैसी अविचल शांति का अनुभव कर रहे हैं। वहां कोई न हो, केवल मैं और मेरा पिता हो। कोई मध्यस्थ न हो, कोई बिचौलिया न हो। न कोई मूर्ति हो और न कोई अन्य ऐसा माध्यम हो जो मेरे और उनके बीच में किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न करे। सीधा हृदय से निकलने वाला संवाद हो, हृदय की बात हो। वेद, ज्ञान हमारे रोम-रोम में तू बसा हो पर वह भी प्यारे पिता और हमारे बीच में कोई दीवार न बन जाए।

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