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पर्यावरण

एटमी संयंत्रों की सुरक्षा का सवाल

अरविंद कुमार सिंह

पिछले दिनों परमाणु ऊर्जा
विभाग द्वारा मुंबई
स्थित भाभा परमाणु
अनुसंधान केंद्र (बार्क) में
आयोजित पांच दिवसीय
कार्यशाला में भारत
के परमाणु वैज्ञानिकों
के इस दावे
परकि हमारे
यहां किसी भी
परमाणु हादसे की आशंका
बेहद कम है
और देश के
परमाणु रिएक्टर बेहद सुरक्षित
हैंभरोसा करना
इसलिए कठिन है
कि सिर्फ
दिल्ली के मायापुरी
में हुई विकिरण
की घटना में
एक व्यक्ति की
मौत हुई बल्कि
बेहद सुरक्षित समझे
जाने वाले देश
के एक परमाणु
रिएक्टर में चेचक
जैसी संक्रमण की
खामियां भी उजागर
हुर्इं। अब भी
भारतीय वैज्ञानिक गुजरात के
काकरापार परमाणु ऊर्जा संयंत्र
में रिसाव की
गुत्थी नहीं सुलझा
पाए हैं। गौरतलब
है कि 11 मार्च
2016 की सुबह काकरापार
में 220 मेगावाट की यूनिट
में भारी जल
रिसाव शुरू हो
गया था और
उसे आपातस्थिति में
बंद करना पड़ा।
परमाणु विशेषज्ञों की मानें
तो एक दुर्लभ
मिश्रधातु से निर्मित
पाइपों पर चेचक
जैसा संक्रमण देखने
को मिला।यही नहीं,
विफल हुए प्रशीतन
चैनल में तीन
दरारें भी पाई
गई हैं।

यहां ध्यान देना होगा
कि जिस किस्म
के रिएक्टर में
काकरापार में रिसाव
हुआ है, उस
किस्म के कुल
सत्रह रिएक्टर भारत
संचालित करता है
और कुल मिलाकर
ऐसे पांच हजार
प्रशीतन चैनल हैं।
चूंकि काकरापार रिएक्टर
से स्वीकार्यता के
स्तर से ज्यादा
विकिरण का रिसाव
नहीं हुआ इसलिए
यह ज्यादा खतरनाक
साबित नहीं हुआ।
पर अहम सवाल
है कि परमाणु
रिएक्टरों के पास
रहने वाले लोगों
का जीवन किस
तरह सुरक्षित माना
जाए और कैसे
आश्वस्त हुआ जाए
कि अगर रिसाव
होता है तो
वे कैंसर जैसी
घातक बीमारियों की
चपेट में नहीं
आएंगे?

यह तथ्य है
कि परमाणु रिएक्टरों
के रिसाव या
विस्फोट से इलेक्ट्रान,
प्रोट्रॉन के साथ
न्यूट्रान तथा अल्फा,
बीटा, गामा किरणें
प्रवाहित होती हैं,
जिनके कारण उस
क्षेत्र का तथा
उसके आसपास के
क्षेत्रों का समस्त
पर्यावरण नष्ट हो
जाता है। विभिन्न
प्रक्रमों में प्रयुक्त
होने वाली परमाणु
_ियों तथा
इनमें प्रयुक्त र्इंधन
में रेडियोधर्मी तत्त्व
होते हैं।

इनके रिसाव या विस्फोट
के कारण तापक्रम
इतना अधिक बड़
जाता है कि
धातु तक पिघल
जाती है। सोलह
किलोमीटर तक चारों
ओर के स्थान
में विस्फोट से
सारी लकड़ी जल
जाती है। ऐसे
रिसाव से नएनए रेडियोधर्मी
पदार्थ पर्यावरण में मिल
जाते हैं जो
अपने विकिरणीय प्रभाव
द्वारा समस्त जैव मंडल
के घटकों को
प्रभावित करते हैं।
मौजूदा समय में
विश्व में चार
सौ से अधिक
परमाणु संयंत्र कार्यरत हैं
जिनमें कई बार
भयंकर दुर्घटनाएं भी
हो चुकी हैं
जिनके कारण पर्यावरण
में रेडियोधर्मी पदार्थ
फैले हैं। पच्चीस
वर्ष पहले यूक्रेन
में हुए चेरनोबिल
एटमी हादसे से
दुनिया हिल गई
थी। इस घटना
के बाद यूरोप
में एक भी
परमाणु रिएक्टर नहीं लगा।
जापान के फुकुशिमा
रिएक्टर में भी
विस्फोट हो चुका
है। हालांकि इस
विस्फोट में किसी
की जान नहीं
गई, लेकिन इसका
विकिरण सैकड़ों किलोमीटर तक
फैला। भारत खुद
परमाणु दुर्घटना का शिकार
हो चुका है।
1987 में कलपक्कम रिएक्टर का
हादसा, 1989 में तारापुर
में रेडियोधर्मी आयोडीन
का रिसाव, 1993 मेंनरौरा
के रिएक्टर में
आग, 1994 में कैगा
रिएक्टर और 11 मार्च, 2016 को
काकरापार यूनिट से भारी
जल रिसाव की
घटना सामने
चुकी है।

इस समय भारत
में तकरीबन बाईस
रिएक्टर हैं जिनकी
क्षमता 6780 मेगावाट है। अंतरराष्ट्रीय
परमाणु ऊर्जा एजेंसी यानी
आईएईए के मुताबिक
विश्व में परमाणु
ऊर्जा संयंत्रों की
संख्या 774 है। 243 परमाणु संयंत्रों
में बिजली का
उत्पादन हो रहा
है। चौबीस देशों
के पास परमाणु
पदार्थ हथियार के लिए
उपलब्ध हैं। अगर
इन परमाणु रिएक्टरों
की सुरक्षा का
पुख्ता इंतजाम नहीं हुआ
तो रिसाव से
लाखों लोगों की
जिंदगी काल की
भेंट चड़ सकती
है। यहां सवाल
सिर्फ रिएक्टरों में
होने वाले रिसाव
तक सीमित नहीं
है। अब परमाणु
रिएक्टर आतंकियों के निशाने
पर भी हैं।
ब्रसेल्स में आतंकी
हमले के बाद
संयुक्त राष्ट्र और आईएईए
ने आशंका जताई
है कि आतंकी
अब परमाणु बिजलीघरों
को भी निशाना
बना सकते हैं।
पूर्व में ब्रिटिश
थिंक टैंक चाथम
हाउस ने भी
इन परमाणु ऊर्जा
संयंत्रों पर साइबर
हमले का अंदेशा
जताया था।

अमेरिकी संस्था न्यूक्लियर थे्रट
इनीशिएटिव
द्वारा पिछले वर्ष
जनवरी में जारी
परमाणु सुरक्षा सूचकांक में
भी कुछ ऐसी
ही आशंका जताई
गई है।

इस सूचकांक के मुताबिक
भारत परमाणु सुरक्षा
के लिहाज से
फिलहाल बेहतर स्थिति में
है। चौबीस देशों
की सूची में
उसे इक्कीसवां स्थान
हासिल है। भारत
को सौ में
छियालीस अंक मिले
हैं। सूचकांक में
पहले स्थान पर
आस्ट्रेलिया और दूसरे
तथा तीसरे स्थान
पर क्रमश: स्विट्जरलैंड
कनाडा हैं।
भारत अंतरराष्ट्रीय सहयोग
की ओर भी
अग्रसर है, हालांकि
देश में परमाणु
सुरक्षा के लिए
एक स्वतंत्र नियामक
संस्था की कमी
है। ऐसा माना
जा रहा है
कि अगर आतंकी
परमाणु रिएक्टरों को निशाना
बनाते हैं तो
उस स्थिति में
संयंत्र से बेहद
खतरनाक रेडियोधर्मी विकिरण होगा
और वातावरण में
इनके मिलन�

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