Categories
पर्यावरण

क्या हो सकते हैं नदियों की नागरिकता के मायने

हमारा तो पूरा प्राचीन संस्कृत साहित्य वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत और पुराण, सभी नदियों की बहती संगीतमयी स्वरलहरियों की गूंज में ऋषि-मुनियों ने रचे। आज हमारे नीति और प्रकृति को बचाने के जितने भी उपाय हैं, उनके संस्कार हमने इन्हीं ग्रंथों से लिए हैं। इनके प्रति समाज का जो भी सम्मान भाव है, वह इसी विरासत की देन है। इसीलिए हरेक संस्कारवान भारतीय के मानस में नदी का स्वरूप माता के तुल्य है। इसी इनसानी रिश्ते में मां से स्नेह पाने और देने की तरल भाव अंतरनिहित है.
न्यूजीलैंड की संसद द्वारा वांगानुई नदी को इनसानी अधिकार देने के फैसले से प्रेरित होकर उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने भी गंगा और यमुना नदियों को जीवित व्यक्तियों जैसे अधिकार देने का ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। इन अधिकारों को सुरक्षित बनाए रखने के लिए गंगा प्रबंधन बोर्ड बनाया जाएगा। इससे नदियों के जलग्रहण क्षेत्र से अतिक्रमण हटाने व गंदगी बहाने वालों को प्रतिबंधित करना आसान होगा। फिलहाल यह कहना मुश्किल है कि इस फैसले का असर कितना होगा। क्योंकि इसके पहले हमारी नदियों को प्रदूषण मुक्त बनाए रखने की दृष्टि से सर्वोच्च व उच्च न्यायालय कई निर्णय सुना व निर्देश दे चुके हैं, लेकिन ज्यादातर निर्देश व निर्णय निष्प्रभावी रहे। गंगा का कल्याण राष्ट्रीय नदी घोषित कर देने के पश्चात भी संभव नहीं हुआ। राष्ट्रीय हरित अधिकरण के सचेत बने रहने के बावजूद नदियों में कूड़ा-कचरा बहाए जाने का सिलसिला निरंतर बना हुआ है। सबसे पहले किसी नदी को मानवीय अधिकार देने की कानूनी पहल होनी तो हमारे देश में चाहिए थी, लेकिन हुई न्यूजीलैंड में है। औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और बढ़ती आबादी के चलते दुनिया भर की नदियां ही नहीं, वे सब प्राकृतिक संपदाएं जबरदस्त दोहन का शिकार हैं, जिनके गर्भ में मनुष्य के लिए सुख व वैभव के संसाधन समाए हैं।
लेकिन यह पहली मर्तबा हुआ है कि किसी प्राकृतिक संसाधन को जीवंत इनसानी संरचना मानते हुए नागरिक अधिकार प्रदान किए गए हैं। इसी का अनुकरण नैनीताल उच्च न्यायालय ने किया है। न्यूजीलैंड में वांगानुई नदी को इनसानी दर्जा मिला है। लेकिन इस अजीब आस्था को मूर्त रूप में बदलने के लिए इन लोगों ने 147 साल लंबी लड़ाई लड़ी। तब कहीं जाकर न्यूजीलैंड संसद विधेयक पारित करके नदी को नागरिक अधिकार व दायित्व सौंपने को मजबूर हुआ। भूमंडलीय व आर्थिक उदारवाद के बाद दुनिया भर में नदियों को समुद्र में गिरने से बहुत पहले ही निचोड़ लेने की व्यावसायिक मानसिकता तेजी से पनपी है। हमारी न केवल लोक परंपरा में, बल्कि धर्म ग्रंथों में भी गंगा समेत ज्यादातर नदियों को मानवीय रिश्तों से जोड़ते हुए मां का दर्जा दिया गया है। इसीलिए लिखा भी गया है, ‘मानो तो मैं गंगा मां हूं, न मानो तो बहता पानी।’ यही नदियां हैं, जो जीवनदायी अमृत रूपी जल पिला रही हैं। लेकिन हमारी नदियां गंदगी और प्रदूषण की किस लाचारी से गुजर रही हैं, किसी से छिपा नहीं है। वांगानुई नदी के तटों पर जिस तरह से मोआरी समुदाय का जनजीवन व सभ्यता पनपे और विकसित हुए, उसी तरह समूची दुनिया की महान और ज्ञात व अज्ञात सभ्यताएं नदियों के किनारों पर ही पनपी हैं। हमारा तो पूरा प्राचीन संस्कृत साहित्य वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत और पुराण, सभी नदियों की बहती संगीतमय स्वरलहरियों की गूंज में ऋषि-मुनियों ने रचे। आज हमारे नीति और प्रकृति को बचाने के जितने भी उपाय हैं, उनके संस्कार हमने इन्हीं ग्रंथों से लिए हैं। इनके प्रति समाज का जो भी सम्मान भाव है, वह इसी विरासत की देन है। इसीलिए हरेक संस्कारवान भारतीय के मानस में नदी का स्वरूप माता के तुल्य है। इसी इनसानी रिश्ते में मां से स्नेह पाने और देने की तरल भाव अंतरनिहित है। वांगानुई न्यूजीलैंड की तीसरी बड़ी नदी है। यह देश के उत्तरी द्वीप में बहती है। धार्मिक व आध्यात्मिक महत्त्व भी है।
यहां का माओरी समुदाय इस नदी के अलावा पहाड़, समुद्र और पेड़ों की वैसे ही पूजा-अर्चना करता है, जैसे हम गंगा व अन्य नदियों के साथ पर्वत, पेड़ और समुद्र की पूजा करते हैं। पर्वतराज हिमालय को तो हम पिता की श्रेणी में रखते हैं। 1870 से ही माओरी समुदाय के लोगों के अलग-अलग समूह नदी और मनुष्य के संबंधों को संवैधानिक रूप देने की मांग करते रहे हैं। उनकी यह लड़ाई अब जाकर फलीभूत हुई है। न्यूजीलैंड की संसद में वांगानुई नदी से जुड़ा जो विधेयक बहुमत से पारित हुआ है, उसके चलते इस नदी को अब एक व्यक्ति के तौर पर अपना प्रतिनिधित्व करने का नागरिक अधिकार दे दिया है। इसके दो प्रतिनिधि होंगे। पहला माओरी समुदाय से नियुक्त किया जाएगा, जबकि दूसरा सरकार तय करेगी। साफ है, वांगानुई की अब कानूनी पहचान निर्धारित हो गई है। इस संवैधानिक अधिकार को पाने के लिए माओरी जनजाति के जागरूक नागरिक क्रिस फिनालिसन ने निर्णायक भूमिका निभाई है। विधेयक में नदी को प्रदूषण मुक्त करने व प्रभावितों को मुआवजा देने के लिए आठ करोड़ डालर का प्रावधान भी किया गया है। नदी को इनसानी दर्जा मिलने के बाद से भविष्य में वह अपने अधिकारों को संरक्षित कर सकती है। यदि कोई व्यक्ति नदी को प्रदूषित करता है, उसके तटवर्ती क्षेत्र में अतिक्रमण करता है या अन्य किसी प्रकार से नुकसान पहुंचाता है तो माओरी जनजाति का नियुक्त प्रतिनिधि हानि पहुंचाने वाले व्यक्ति पर अदालत में मुकदमा दर्ज कर सकता है। 290 किलोमीटर लंबी इस नदी का जलग्रहण क्षेत्रफल 7380 वर्ग किलोमीटर है। कहने को तो भारत नदियों का देश है, लेकिन विडंबना यह है कि 70 प्रतिशत नदियां जानलेवा स्तर तक प्रदूषित हैं। कई नदियों का अस्तित्व बचाना मुश्किल हो रहा है। 
हम गंगा समेत सभी नदियों में पाप धोने जाते हैं। इन नदियों में इतने पाप धो चुके हैं कि अब इनकी पाप-शोधन की क्षमता लगभग खत्म हो गई है, क्योंकि ये स्वयं हमारे पाप ढोते-ढोते गंदगी से नालों में तबदील हो गई है। वैसे तो हमारे यहां सभी नदियां पुण्य-सलिलाएं हैं, लेकिन गंगा और यमुना को सबसे ज्यादा पवित्र माना जाता है। गंगा अपने उद्गम स्रोत गंगोत्री (गोमुख) से 2525 किलोमीटर की यात्रा करती हुई गंगासागर में समाती है। इस बीच इसमें छोटी-बड़ी करीब एक हजार नदियां विलय होती है, परंतु गंगा है कि औद्योगिक व शहरी कचरा बहाए जाने के कारण कन्नौज से वाराणसी के बीच ही दम तोड़ देती है। गंगा को मैला करने के लिए 20 फीसदी उद्योग और 80 फीसदी सीवेज लाइनें दोषी हैं। पिछले तीन दशक में करीब डेढ़ हजार करोड़ रुपए सफाई अभियानों में खर्च कर दिए जाने के बावजूद गंगा एक इंच भी साफ नहीं की जा सकी है। उत्तराखंड में गंगा की अनेक जलधाराओं पर 1.30 हजार करोड़ की जलविद्युत परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं। स्वाभाविक है, ये परियोजनाएं गंगा की जलधाराओं को बाधित कर रही हैं, जबकि किसी भी नदी की अविरल धारा उसकी निर्मलता व स्वच्छता बनाए रखने की पहली शर्त है। करीब 1376 किलोमीटर लंबी यमुना नदी के लिए राजधानी दिल्ली अभिशाप बनी हुई है। इस महानगर में प्रवेश करने के बाद जब यमुना 22 किलोमीटर की यात्रा के बाद दिल्ली की सीमा से बाहर आती है तो एक गंदे नाले में बदल जाती है। दिल्ली के कचरे का नदी में विसर्जन होने से 80 प्रतिशत यमुना इस क्षेत्र में ही प्रदूषित होती है। पिछले दो दशकों में यमुना पर करीब छह हजार करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन यमुना है कि दिल्ली से लेकर मथुरा तक पैर धोने के लायक भी नहीं रह गई है। 
सुश्री सुनीता नारायण और राजेंद्र सिंह जैसे पर्यावरणविदों का तो यहां तक कहना है कि यह नदी मर चुकी है, बस अंतिम संस्कार बाकी है। हमारे मनीषियों और कवियों ने हजारों साल पहले नदियों, पहाड़ों और वृक्षों से मिथकीय कथाएं जोडक़र उनका मानवीकरण किया था। इसी से सह-अस्तित्व की विशिष्ट आवधारणा लोक परंपरा बनी, लेकिन आधुनिक ज्ञान और कथित विकास ने इस अवधारणा को पलीता लगा दिया। गोया, इस अवधारणा को बदलने की जरूरत है।

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
betpark güncel giriş
betgaranti güncel giriş
kolaybet güncel giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark güncel giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
meritking giriş
virüsbet giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
meritking giriş
marsbahis giriş
meritking giriş
realbahis giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark 2026
bets10 giriş
casinoroyal
casinoroyal
hititbet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
supertotobet giriş
supertotobet giriş
supertotobet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
supertotobet giriş
supertotobet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
betnano giriş
vaycasino giriş
Betpark Giriş
Betpark Giriş
vaycasino giriş
trendbet
trendbet
betnano giriş
betnano giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
betorder giriş
betorder giriş
betorder giriş
betorder giriş
trendbet
trendbet
trendbet
trendbet
hitbet
betnano giriş
restbet giriş
restbet giriş
casinoroyal giriş
casinoroyal giriş
padişahbet giriş
padişahbet giriş
betlike giriş
betlike giriş
casinoroyal
casinoroyal
trendbet
trendbet
betnano giriş
setrabet
setrabet
timebet
timebet