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भारत के 50 ऋषि वैज्ञानिक अध्याय – 20 संसार के महान मनोचिकित्सक : पतंजलि

संसार के महान मनोचिकित्सक : पतंजलि

तन के साथ-साथ मन की चिकित्सा करना सचमुच बहुत बड़ी साधना का परिणाम होता है। भारतीय ऋषियों ने इस सत्य को बड़ी गहराई से समझा कि तन तभी रोग ग्रस्त होता है जब मन रोग ग्रस्त हो चुका होता है। ‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत’ – इस सूक्ति के बड़े गहरे अर्थ हैं। मन की प्रसन्नता से तन मुखरित होता है, प्रफुल्लित और हर्षित होता है और मन में भरे हुए अनेक प्रकार के क्लेशों के कारण तन मुरझा मुरझा सा रहता है। मन की पीड़ा या मन का हर्ष चेहरे पर दिखाई दे जाता है। यही कारण है कि हमारे देश के पतंजलि जैसे महान ऋषियों ने तन से पहले मन को स्वस्थ रखने और उसे कभी रोग ग्रस्त ना होने देने की दिशा में इतना बड़ा पुरुषार्थ किया कि उसकी ऊंचाई को संसार का कोई दूसरा ‘पतंजलि’ आज तक लांघ नहीं पाया है। यही कारण है कि राजा भोज जैसे परम विद्वान राजा ने महर्षि पतंजलि को तन के साथ-साथ मनो चिकित्सक की उपाधि से सम्मानित किया था।

मनोचिकित्सक पहले थे, ऋषि पतंजलि भारत के।
दुनिया के कोने कोने में परचम लहराए भारत के।।

अष्टांग योग के जनक महर्षि पतंजलि एक प्रख्यात चिकित्सक और रसायन शास्त्र के आचार्य थे। रसायन विज्ञान के क्षेत्र में अभ्रक, धातुयोग और लौह्शास्त्र का परिचय कराने का श्रेय पतंजलि को जाता है। महर्षि पतंजलि का योग दर्शन 6 दर्शनों में से एक है। जिसे हिंदू समाज का प्रत्येक व्यक्ति बड़ी श्रद्धा से देखता है। मुसलमानों और अंग्रेजों के शासनकाल में भारतीय दर्शनों की घोर उपेक्षा की गई। यही कारण है कि देश की बहुत बड़ी जनसंख्या अपने दर्शनों के अद्भुत ज्ञान विज्ञान से दूर हो गई। यद्यपि इस सबके उपरांत भी भारतीय जनमानस का विश्वास और श्रद्धा दर्शनों में निरंतर बनी रही। योग के जिन सूत्रों को महर्षि पतंजलि ने स्थापित किया है ,वह सारे के सारे योग दर्शन के आधार स्तंभ हैं। मन की आंखों को खोलने और उन्हें तरोताजा रखने के लिए महर्षि पतंजलि का योग दर्शन बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यही कारण है कि बड़े-बड़े विद्वानों ने मोक्ष की प्राप्ति के लिए महर्षि पतंजलि द्वारा निर्धारित योग दर्शन के अष्टांग योग को अपनाने पर बल दिया है। योग दर्शन के अष्टांग योग को अपनाने से जीवन स्वस्थ रहता है। व्यक्ति की दिनचर्या और जीवनचर्या सात्विक बनी रहती है और उसके मन में सात्विकता के भाव चौबीसों घंटे प्रवाहित होते रहते हैं। उन सात्विक भावों की सात्विक ऊर्जा से मनुष्य सतत ऊर्जावान बना रहता है।
महर्षि पतंजलि ने अष्टांग योग को मानव जीवन की उन्नति व प्रगति के लिए आवश्यक माना है। उसमें यम,नियम,आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान,धारणा, समाधि का नाम सम्मिलित है। यह बहुत ही दु:खद है कि वर्तमान समाज में अष्टांग योग की इस प्रक्रिया की प्रारंभिक सीढ़ी अर्थात यम और नियम को लोगों ने पूर्णतया भुला दिया है। उसी का परिणाम है कि संसार में सर्वत्र अस्त व्यस्तता फैली हुई है। महर्षि पतंजलि के इस अष्टांग योग के मार्ग में से वर्तमान संसार ने आसन और प्राणायाम को कुछ सीमा तक ग्रहण किया है। कुछ लोग ध्यान को भी अपना रहे हैं। इसका परिणाम यह हुआ है कि संसार के लगभग 200 देशों में महर्षि पतंजलि के योग के माध्यम से लोग स्वास्थ्य लाभ ले रहे हैं। इसी से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यदि केवल योगासन और थोड़ा सा प्राणायाम को अपनाकर ही विश्व के लोग इतना बड़ा लाभ ले रहे हैं तो अष्टांग योग को पूर्णतया अंगीकृत करने से विश्व को कितना लाभ हो सकता है ? योग के क्षेत्र में भारत की यह बहुत बड़ी क्रांति है। जिसका बहुत अधिक श्रेय बाबा रामदेव जी को जाता है। यह और भी सुखद बात है कि लोगों ने महर्षि पतंजलि के योग को अपने-अपने संप्रदायों की सीमाओं को तोड़कर अपनाया है। इससे पता चलता है कि हमारे ऋषि मनीषियों का चिंतन कितना सार्वकालिक और किस प्रकार सबको लाभ पहुंचाने वाला था ?

योग क्षेत्र में क्रांति करके भारत ने लहराया परचम।
सर्वत्र धूम मची भारत की आभारी हुआ सारा जग।।

महर्षि पतंजलि ने जिन ग्रंथों की रचना की उनमें योग दर्शन विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इसके अतिरिक्त उन्होंने महर्षि पाणिनि की 'अष्टाध्यायी' पर भी विशेष कार्य किया और उस पर टीका लिखी। जिसे महाभाष्य के नाम से जाना जाता है। पतंजलि का यह ग्रंथ व्याकरण से संबंधित है। इसे वर्तमान समाज का विश्वकोश कहकर भी संबोधित किया जाता है। इस ग्रंथ के माध्यम से व्याकरण की जटिलताओं को समझने और उनके रहस्यों को सुलझाने में बड़ी सहायता मिलती है। महर्षि पतंजलि के योगसूत्र का अनुवाद भारत से बाहर भी कई भाषाओं में किया जा चुका है। 
 विश्वभर के लोग महामेधासंपन्न और अध्यात्म शक्ति के महानायक महर्षि पतंजलि की शिक्षाओं का लाभ उठा रहे हैं, निश्चय ही इससे हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। हिंसा तनाव और मानसिक स्तर पर बीमारी को झेल रहे विश्व समाज के लिए भारत के महान ऋषि पतंजलि के योग सूत्र पर आज के संपूर्ण भूमंडल पर सर्वाधिक शोध कार्य हो रहे हैं। लोगों ने मजहब के बंधन ढीले किए हैं और ऋषि पतंजलि की शरण में जाकर स्वास्थ्य लाभ लेते हुए वे भारतीयता की ओर मुड़ने के लिए प्रेरित हुए हैं। भौतिकवाद में डूब कर लोगों ने देख लिया है और इस डूबने का स्वाभाविक परिणाम अर्थात रोग शोक को भी उन्होंने गहराई से अनुभव कर लिया है। अब उन्हें अपने बिगड़े दिमागों को सुधारने की आवश्यकता अनुभव हो रही है। इन बिगड़े दिमागों को सुधारने की क्रिया प्रक्रिया यदि किसी व्यक्ति ने बताई है तो वह भारत के महर्षि पतंजलि ही हैं।

चित्त की वृत्तियों के निरोध करने से मानव मन प्रसन्नता अनुभव कर सकता है। इस संबंध में महर्षि पतंजलि योगसूत्र के समाधिपाद में कहते है-

अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोध:    (योगसूत्र- 1/12) 

अर्थात- “अभ्यास और वैराग्य के द्वारा उन चित्तवृत्तियों का निरोध होता है।” चित्तवृत्तियों का प्रवाह यद्यपि संसार के भूगोल से विपरीत दिशा में होना चाहिए अर्थात मनुष्य की आध्यात्मिक उन्नति की ओर होना चाहिए। पर संसार का सच यह है कि चित्त वृत्तियों का प्रवाह सांसारिक भोगों की ओर चल रहा है। इसी का परिणाम है कि संसार में सर्वत्र अशांति और कोलाहल है। इस प्रकार की भीतरी अशांति को और चित्त की वृत्तियों के इस प्रवाह को रोकने का नाम महर्षि पतंजलि की भाषा में ‘ वैराग्य’ है। इसके लिए अभ्यास की आवश्यकता है। निरंतर अभ्यास करने से चित्त शांत होने लगता है। उसमें स्थिरता आने लगती है और मन एकाग्र होने लगता है। असंभव को भी संभव बनाने की शक्ति इसी अभ्यास में है। महर्षि पतंजलि कहते है- 

तत्रस्थितौ यत्नोऽभ्यास:   (योगसूत्र- 1/13)  

“चित्त की स्थिरता के लिए जो प्रयत्न करना है वह अभ्यास है।” चित्त (मन) जो स्वभाव से ही चंचल है उस चित्त को किसी एक ध्येय में स्थिर करने के लिये बारम्बार प्रयत्न करते रहने का नाम अभ्यास है।
कई उतावले लोग अभ्यास को 10 – 5 दिन की बात समझते हैं। 10 – 5 दिन में जब उन्हें कोई लाभ नहीं होता तो मन के पीछे भागते ऐसे लोग ध्यान को करने से पहले ही छोड़ देते हैं। हर व्यक्ति को आजकल एलोपैथिक ट्रीटमेंट चाहिए। अर्थात इस हाथ दवा लेना और उस हाथ सुधार होते देखना। इसके विपरीत आयुर्वेद और अष्टांग योग की साधना मन की बिगड़ी हुई दशा को धीरे-धीरे सुधारते हैं। जिसके लिए धैर्य की आवश्यकता होती है । कहने का अभिप्राय है कि अभ्यास में निरंतर श्रद्धा बनी रहनी चाहिए और धीरे-धीरे मन को शांत करने का यत्न करना चाहिए।
महर्षि पतंजलि ने कहा है- 
स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्काराऽसेवितो दृढ़भूमि:  (योगसूत्र- 1/14) 
अर्थात वह अभ्यास दीर्घकाल तक निरन्तर।श्रद्धा पूर्वक सेवन अर्थात अभ्यास करते रहने पर ही दृढ़ अवस्था वाला होता है।  
अभ्यास के विषय में हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि अभ्यास मानव के अंतः करण में पड़े करोड़ों जन्मों के संस्कारों को धोने की प्रक्रिया का नाम है। जहां करोड़ों करोड़ों जन्मों का कीचड़ जमा हो, वहां कुछ दिनों में सफाई अभियान पूर्ण हो जाए,यह संभव नहीं है। इसके लिए दीर्घकालिक तैयारी करनी चाहिए और पूर्ण मनोयोग से श्रद्धा के साथ इस सफाई अभियान में जुट जाना चाहिए। नए संस्कार ना बनें अर्थात नई गंदगी जाकर इस हमारे अंत:करण को मलीन ना करे, इस बात का पूरा ध्यान रखना चाहिए। यही कारण है कि हमारे ऋषि मनीषियों ने इस साधना के काल में ब्रह्मचर्य का पालन करने पर भी विशेष रूप से ध्यान दिया जोड़ दिया है।
यदि बात वैराग्य की करें तो महर्षि पतंजलि इस विषय में हमारा मार्गदर्शन करते हुए कहते है- 

दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम्   (योगसूत्र- 1/15) 

अर्थात- “देखे गये और सुने हुए विषयों में सर्वथा तृष्णारहित चित्त की जो वशीकार नामक अवस्था है वह वैराग्य है।”  
जब हम अपनी आँखों से इस संसार की भौतिक वस्तुओं जैसे धन, वैभव, एश्वर्य,  कार, मकान, जमीन, राज, नौकरी इत्यादि के प्रति आसक्ति रहित हो जाते हैं और इसी प्रकार जब हम
वेदों, उपनिषदों, प्राचीन आर्ष ग्रन्थों से स्वर्ग प्राप्ति, मोक्ष प्राप्ति, दिव्य लोकों का सुख इत्यादि सुने गए विषयों के प्रति कोई आसक्ति नहीं रखते हैं तब वैराग्य की स्थिति मुखरित होती है।
कहने का अभिप्राय है कि महर्षि पतंजलि ने वैराग्य और अभ्यास के माध्यम से मानव को जितेंद्रिय बनने की प्रेरणा दी है। यही वह अवस्था है जो भारत की सांस्कृतिक विरासत की सबसे मूल्यवान वस्तु है। यदि आज का संसार भारत की सांस्कृतिक विरासत की इस मूल्यवान वस्तु को अपना ले तो भारत के इस अनुपम ज्ञान को पाकर संपूर्ण संसार शांति प्राप्त कर सकता है।
हम कितने सौभाग्यशाली हैं कि जहां हमारे महर्षि पतंजलि ने इस आत्मिक विज्ञान को बहुत पहले समझ लिया था, वहीं उसे शेष संसार आज भी भारत से ही सीखने को लालायित है ?

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक उगता भारत

 

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