वैदिक सम्पत्ति : इतिहास, पशुहिंसा और अश्लीलता

Devendra singh arya

गतांक से आगे…

क्योंकि परमात्मा जानता है। कि मनुष्य कितनी जल्दी भ्रम में पड़ जाता है। इसलिए उसको भ्रम से बचाने के लिए वेदों में स्थान- स्थान पर चेतावनी दे दी है। इस गुप्तेन्द्रिय प्रकरण में भी वेद कहते हैं कि-

मा शिश्रदेवा अपि गुॠ र्त नः (ऋग्वेद 7/21/5)
अर्थात् है मनुष्यो !! शिक्ष को देव मानकर और उसी में रत रहनेवाले उसके पुजारी मुझको प्राप्त नहीं होते । कितनी सुन्दर शिक्षा है ! इस शिक्षा को पाकर मनुष्य कभी भी शिवदेवोपासक नहीं हो सकता। जब वेद इस प्रकार की शिक्षा देते हैं, तब समझता चाहिये कि उनके वे वन जिनमें गुप्तेन्द्रियों के नाम आते हैं, केवल उपदेश के ही लिए आते हैं। जिस प्रकार डॉक्टरी की पुस्तकों में विशेष प्रयोजन से आये हुये गुप्तेन्द्रियसम्बन्धी वर्णन अश्लील नहीं हैं, उसी तरह विद्या की पुस्तक वेद में आये हुये ये वर्णन भी अशलील नहीं हो सकते। विशेषकर ऐसी दशा में जब वेद ने हो अपने विषय का स्पष्टीकरण भी स्थान स्थान में स्वयं कर दिया है। कुछ लोग कहते हैं कि वेदों में दो दो स्त्रियों के साथ रातदिन पड़े रहने का वर्णन है। यजुर्वेद के पुरुषसूक्त में आया है कि ‘श्रीच्श्र ते लक्ष्मीच्श्र परत्न्या अहोरात्रे पाश्र्वे’ अर्थात् श्री ओर लक्ष्मी दोनों स्त्रियाँ रातदिन बगल में पड़ी रहती है। इस वन में दो औरतों को लेकर रात दिन पड़े रहना कहा गया है, जो अश्लीलता और असभ्यता का नग्न चित्र है । परन्तु हम कहते हैं कि यह कोई असम्भव या अनहोनी बात नहीं है। संसार में हजारों आदमी इस प्रकार के हैं, जो दो दो नहीं, किन्तु चार चार स्त्रियों के साथ विवाह करना धर्म समझते हैं। यदि वेद में इस प्राकृतिक जड़ घटना को लेकर उन लोगों को दो दो विवाह के भयङ्कर परिणाम दिखलाये गये हैं, तो क्या बुरा किया गया है ? वेद में स्पष्ट रूप से दो स्त्रियों के साथ विवाह करने के दुष्परिणाम का वर्णन किया गया है। ऋग्वेद में लिखा है कि-

उभे धुरौ वह्निरापिब्दमानोऽन्तर्योनेव चरति द्विजानि: ।

वनस्पति वन आस्थापयध्वं नि षू दधिध्वमखनन्त उत्सम् ।। (ऋ० 10/101/11)

अर्थात् जिस प्रकार दोनों धुराओं के बीच में दबा हुआ और चिल्लाता हुआ रथ का घोड़ा चलता है, उसी तरह दो स्त्रियों का पति भी हर तरफ से दबा हुआ और वनस्पति लगाओ, तालाब खोदो और धनसंग्रह करो का आर्तनाद करता हुआ भागा भागा फिरता है। अनेक स्त्रियों वाले पुरुषों की दुर्दशा का इस प्रकार वर्णन करके वेदों ने यह प्राज्ञा दे दी है कि दो स्त्रियों के एक साथ विवाह करने में दुःख है, इसलिए वह पाप ही है। ऊपर जिस प्राकृतिक सूर्य की दो स्त्रियों का वर्णन किया गया है, वह भी अपनी दो स्त्रियों के कारण न सोता है और न आराम करता है, प्रत्युत रातदिन भागा भागा फिरता है, इसलिए दो स्त्रियों के साथ विवाह करना उचित नहीं है, वेद ने इस जड़ अलङ्कार से भी बतला दिया कि दो पत्नीवाला और रातदिन कामक्रीड़ा करनेवाला पुरुष उन स्त्रियों के बोझ से भागा भागा फिरता है और रातदिन चैन नहीं पाता ।

जिस प्रकार इन समस्त प्राकृतिक जड़ अलङ्कारों को बीभत्स रस के साथ वेदों ने वर्णन करके उनको पाप ठहरा दिया है और उनसे बचने के लिए जोरदार शब्दों के द्वारा हिदायत कर दी है, उसी तरह अन्यान्य ऐसे ही स्थलों को किसी विशेष घटना को प्रकट करने के लिए लिखा है और उसका निषेध भी कर दिया है। जो लोग अथर्ववेद के कतिपय मान- सिक उपचारों को टोटकाटंबर और जादूटोना समझते हैं, वे भी गलती पर हैं। जिस प्रकार माँस और पशुयज्ञ के सम्बन्ध में दूव्यर्थक शब्दों के कारण लोगों ने अनर्थ किया है, उसी प्रकार इस प्रकरण में भी कर रहे हैं। अथर्ववेद का उपचार- प्रकरण मैस्मरेजम, हिपनाटिज्म और सजेशन से सम्बन्ध रखता है, इसलिए उसमें भी अश्लीलता की गुञ्जायश नहीं है । जो वेद स्वयं कहते हैं कि ‘सभ्य सभां ते पाहि’ अर्थात् है सभ्य ! इस सभा की रक्षा कर, उनमें असभ्यता की बात और अश्लीलता का वर्णन हो ही नहीं सकता। अतएव वेदों में अश्लीलता और असभ्यता का लांछन लगाना बड़ी भारी भूल है । हमने यहाँ तक वेदों पर किए गए उन आक्षेपों का उत्तर दिया, जो वेदों की अपौरुषेयता में आड़े आते हैं । वेदों के अर्थों से सम्बन्ध रखनेवाली ऐसी अनेकों शंकाएँ और भी होंगी, पर उन सबका समाधान करना यहाँ अभीष्ट नहीं है । क्योंकि हम वेदों का भाष्य करने नहीं बैठे। हमने तो यहाँ उन्हीं शंकाओं का समाधान करना उचित समझा है, जो शंकाएँ वेदों के अपौरूषेय सिद्ध करने में रुकावट डालती है। व शंकाएँ इतिहास, पशुयज्ञ और अश्लीलता आदि हैं। हमने यहाँ उन्हीं का यथामति समाधान किया है। वेदों की अपौरुषेयता से सम्बन्ध रखनेवाली अब कोई शङ्का बाकी नहीं है । | वेदों की इयत्ता निर्धारित हो गई, शाखाओं और प्रक्षेप आदि का वर्णन हो गया, ऋषि, देवता, छन्द तथा मण्डल अध्याय भी ज्ञात हो गये और वेदों के भाष्य तथा मांसयज्ञ पौर अश्लीलता आदि का भी समाधान हो गया। इस प्रकार से वेदों की अन्तरङ्गपरीक्षा हो गई। अब आगे वेदों के मन्त्रों को लिखकर दिखलाना चाहते हैं कि उनकी क्या शिक्षा है।
क्रमशः
(……अगले अंक में “वेद मंत्रों के उपदेश” अध्याय आरम्भ होगा।)

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