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भारत के 50 ऋषि वैज्ञानिक अध्याय 5, शल्य चिकित्सा के पितामह : सुश्रुत

शल्य चिकित्सा के पितामह : सुश्रुत

एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति ने अपनी पीठ अपने आप थपथपाते हुए संसार में यह भ्रम फैलाने का काम किया है कि शल्य चिकित्सा संसार को उसी की देन है। जबकि यह बात पूर्णतया गलत है। भारत में सुश्रुत जैसे महान चिकित्सा शास्त्री हुए हैं जो कि आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में पूर्णतया पारंगत थे।
मान्यता है कि आचार्य सुश्रुत का जन्म भारत की सुप्रसिद्ध नगरी काशी में छठी ( कहीं-कहीं आठवीं शताब्दी भी लिखा है, यद्यपि हम इनका काल इन दोनों को ही नहीं मानते। हमारे ऋषि पूर्वजों के काल का तिथि क्रम निश्चित करने के संबंध में अभी अनुसंधान होना शेष है। ) शताब्दी ईसा पूर्व हुआ था। स्पष्ट है कि उस समय संसार किसी अन्य चिकित्सा पद्धति के बारे में विशेष नहीं जानता था। भारत का आयुर्वेद ही समस्त भूमंडल पर शासन करता था अर्थात भारत के आयुर्वेद के माध्यम से ही लोग अपना उपचार कराते थे और स्वस्थ रहते थे ।
उस समय भारत के चक्रवर्ती सम्राट इस बात की व्यवस्था करते थे कि भारत के वैद्य संसार के कोने – कोने में जाकर लोगों के स्वास्थ्य का ध्यान रखें और उन्हें पूर्णतया निरोग रखें। उस समय हमारे वैद्य लोग जीवन को एक महात्मा की भांति संसार के कल्याण के लिए समर्पित करते थे। चिकित्सा पद्धति को वह सेवा मानते थे और इस प्रकार की सेवा को ही सबसे बड़ा धर्म मानते थे। संसार के उपकार के लिए और संसार के लोगों को निरोग रखने के लिए उनका जीवन साधना का प्रतीक होता था।यही कारण था कि चिकित्सा में उस समय व्यवसाय नहीं घुसा था। इस प्रकार की सोच से संसार में धर्म का शासन चलाने में बड़ी सुविधा होती थी।

धर्म का ही राज था तब चिकित्सा के क्षेत्र में।
सेवार्थ ही आते थे तब ऋषि चिकित्सा क्षेत्र में।।
तब हमारे ज्ञान का विस्तार था सर्वत्र ही,
हमारा नेतृत्व स्वीकार था, विश्व को हर क्षेत्र में।।

जब संसार एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति से परिचित हुआ तो भारत की प्राचीन आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रणाली धीरे-धीरे सिमटती चली गई। ऐसी परिस्थितियां बनाई गईं कि हमारे आयुर्वेद को लोगों ने उपेक्षा की दृष्टि से देखना आरंभ कर दिया। भारत में स्वाधीनता के पश्चात भी स्वस्थ रहने के लिए बड़ी संख्या में लोग अपने वैद्यों को ही पसंद करते थे, किसी एलोपैथिक डॉक्टर को नहीं। परंतु आज धीरे-धीरे हम देख रहे हैं कि वैद्य लोग हमारे देश से लगभग समाप्त कर दिए गए हैं। यद्यपि भारतीय संस्कृति के प्रति निष्ठावान लोग आज भी आयुर्वेद के माध्यम से ही अपना उपचार करना उचित मानते हैं। यद्यपि आज भी एलोपैथी के क्षेत्र में बहुत से ऐसे चिकित्सक हैं जो इस व्यवसाय को एक पेशे के रूप में ना लेकर सेवा के रूप में ही लेते हैं और उन्हें सेवा में ही धर्म और धर्म में ही आनंद दिखाई देता है, परंतु ऐसे लोगों की संख्या कम है । अधिकतर लोग ऐसे हो गए हैं जो इस पवित्र कर्म को व्यवसाय के रूप में अपना चुके हैं।
बाबा रामदेव जी ने इस दिशा में योग के माध्यम से क्रांति कर लोगों को विशेष सावधान किया है। इसके अतिरिक्त अन्य कई लोग भी भारत जागरण में अपना जीवन खपा रहे हैं । जिससे बड़ी संख्या में लोग अपनी आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
सुश्रुत को भारत में शल्य चिकित्सा के पितामह के रूप में जाना जाता है। इन्होंने आयुर्वेद की चिकित्सा की शिक्षा भारत के महान स्वास्थ्य विशेषज्ञ और वैद्य धन्वंतरि से प्राप्त की थी।
मानव स्वास्थ्य के संदर्भ में इनके द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘सुश्रुत संहिता’ भारत में ही नहीं, विश्व में भी अपना सम्मान पूर्ण स्थान रखती है। सुश्रुत जी से पूर्व काशी पति दिवोदास शल्य चिकित्सा के क्षेत्र में महान कार्य कर रहे थे। उनके महान कार्य की यश पताका उस समय सारे संसार में फहरा रही थी। उनके विशेष व्यक्तित्व से प्रभावित होकर सुश्रुत जी ने उनसे शल्य चिकित्सा का उपदेश प्राप्त किया था।

हैं पितामह सुश्रुत चिकित्सा विज्ञान के,
झुकता मस्तक आज भी उनके सम्मान में।
लोक के कल्याण हेतु कर्म सारे ही किए,
जीवन समर्पित कर दिया विश्व के कल्याण में।।

दिवोदास धन्वंतरि के सात शिष्यों में से एक आचार्य सुश्रुत को 'फादर आफ प्लास्टिक सर्जरी' यानी प्लास्टिक सर्जरी का पितामह भी कहते हैैं। उन्हें 2500 ( ? ) वर्ष पहले भी प्लास्टिक सर्जरी एवं इसमें प्रयोग होने वाले यंत्रों की जानकारी थी। आयुर्वेद के महत्वपूर्ण ग्रंथों में सम्मिलित 'सुश्रुत संहिता' में शल्य चिकित्सा के मूल सिद्धांतों की जानकारी मिलती है। 

‘सुश्रुत संहिता’ में शल्य चिकित्सा के बारे में जिस प्रकार गंभीर और महत्वपूर्ण जानकारी दी गई है उसे देखकर आज के चिकित्सा शास्त्री भी दांतो तले उंगली दबा जाते हैं। निश्चित रूप से इस संहिता को पढ़कर हमारे इस महान वैज्ञानिक शल्य चिकित्सा शास्त्री के प्रति हृदय श्रद्धा से भर जाता है और व्यक्ति स्वयं ही नतमस्तक हो जाता है। उनके पास ऐसे 125 प्रकार के उपकरण थे जो शल्य चिकित्सा के लिए उपयोग में लाए जाते थे।
उस समय इस प्रकार के उपकरणों का विशेष महत्व था क्योंकि उन उपकरणों को बनाना भी बड़ा कठिन था। उस समय उपकरणों को बनाने के लिए आजकल की भांति मशीनें नहीं थीं।
इसके उपरांत भी भारतवर्ष अपने सुश्रुत जैसे यशस्वी चिकित्सा शास्त्रियों के माध्यम से संपूर्ण संसार को निरोग रखने में सफल रहा और दीर्घकाल तक स्वास्थ्य के क्षेत्र में संपूर्ण भू-मंडल का कल्याण करता रहा।
शल्य चिकित्सा को सफलता के शीर्ष तक पहुंचाने वाले सुश्रुत ने उस समय 300 प्रकार की शल्य चिकित्सा प्रक्रियाओं की खोज की थी। जिनके माध्यम से मानव को स्वस्थ रखा जाना संभव हो सकता था। उस समय नेत्र चिकित्सा के लिए शल्य प्रक्रिया का सहारा लेना पड़ा जोखिम भरा था। पर सुश्रुत ने अपने विशेष बौद्धिक कौशल के माध्यम से इस क्रिया को भी सफलतापूर्वक साध लिया था। कहने का अभिप्राय है कि उन्होंने मोतियाबिंद जैसी आंखों की बीमारी को भी शल्य क्रिया से दूर करने में सफलता प्राप्त की थी।
आजकल की उन्नत चिकित्सा प्रणाली के उपरांत भी प्रसव के समय अनेक माताएं दम तोड़ जाती हैं। कई बार जच्चा और बच्चा दोनों के लिए ही खतरा पैदा हो जाता है। परंतु सुश्रुत ने इस क्षेत्र में भी विशेष योग्यता प्राप्त कर सफलतापूर्वक प्रसव कराने संबंधी शल्य क्रिया को भी अपनी साधना का लक्ष्य बनाया था। हड्डियों को जोड़ने के क्षेत्र में भी उन्होंने विशेष परिश्रम किया और उनके अनुसंधान से इस क्षेत्र में आगे आने वाले चिकित्सा शास्त्री अथवा वैद्य लोग संसार का कल्याण करते रहे। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि आयुर्वेद के इन वैद्यों के माध्यम से हड्डियों का उपचार कराते समय या उन्हें जुड़वाने के समय लोगों को बहुत कम खर्च करना पड़ता था।
इसके अतिरिक्त उन्हें आज के एलोपैथिक चिकित्सा प्रणाली की अपेक्षा दर्द भी कम होता था । साथ ही साथ उनके स्वास्थ्य पर इस प्रकार की किसी प्रक्रिया का कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता था। कहने का अभिप्राय है कि जिस प्रकार आजकल अंग्रेजी दवाई लेकर लोगों के हृदय ,किडनी ,फेफड़े, आंत आदि पर विपरीत प्रभाव पड़ते देखे जाते हैं वैसे प्रभाव आयुर्वेद के इन वैद्यों की चिकित्सा प्रणाली के माध्यम से नहीं पड़ते थे। संज्ञाहरण अर्थात सुन्न करने के लिए भी सुश्रुत ने विशेष प्रक्रिया का सहारा लिया था। उन्हें संज्ञाहरण का पितामह कहा जाता है, अर्थात संसार में सबसे पहले रोगी को सुन्न कर चिकित्सा करने का आविष्कार उन्होंने ही किया था। उन्हें मधुमेह जैसे रोगों का भी ज्ञान था और इसके लिए भी उन्होंने विशेष औषधियां तैयार की थीं।
उनके बारे में विद्वानों का स्पष्ट मानना है कि “सुश्रुत श्रेष्ठ शल्य चिकित्सक होने के साथ-साथ श्रेष्ठ शिक्षक भी थे। उन्होंने अपने शिष्यों को शल्य चिकित्सा के सिद्धांत बताये और शल्य क्रिया का अभ्यास कराया। प्रारंभिक अवस्था में शल्य क्रिया के अभ्यास के लिए फलों, सब्जियों और मोम के पुतलों का उपयोग करते थे। मानव शारीर की अंदरूनी रचना को समझाने के लिए सुश्रुत शव के ऊपर शल्य क्रिया करके अपने शिष्यों को समझाते थे। सुश्रुत ने शल्य चिकित्सा में अद्भुत कौशल अर्जित किया तथा इसका ज्ञान अन्य लोगों को कराया। इन्होंने शल्य चिकित्सा के साथ-साथ आयुर्वेद के अन्य पक्षों जैसे शरीर सरंचना, काय चिकित्सा, बाल रोग, स्त्री रोग, मनोरोग आदि की जानकारी भी दी।”

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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