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मेवाड़ के महाराणा और उनकी गौरव गाथा अध्याय – 29 महाराणा कर्ण सिंह और महाराणा जगत सिंह प्रथम

महाराणा कर्ण सिंह और महाराणा जगत सिंह प्रथम

महाराणा अमर सिंह की मृत्यु के पश्चात 26 जनवरी 1620 ई0 को उनके पुत्र महाराणा कर्ण सिंह ने मेवाड़ का सत्ता भार संभाला। महाराणा कर्ण सिंह का जन्म 7 जनवरी 1584 ई0 को हुआ था। हम पूर्व में ही यह स्पष्ट कर चुके हैं कि महाराणा अमर सिंह ने जब 1615 ई0 में चित्तौड़ को लेकर तत्कालीन मुगल शासक जहांगीर के साथ संधि की तो उस समय उन्होंने अपने पुत्र कर्ण सिंह को बादशाह जहांगीर के दरबार में भेज दिया था।
महाराणा अमर सिंह का यह पुत्र जब मेवाड़ का शासक बना तो उसने चित्तौड़ को मुगलों के आधिपत्य से मुक्त करने और एक स्वतंत्र शासक की भांति शासन करने की दिशा में कोई विशेष कार्य नहीं किया।
उसने लगभग यथास्थितिवाद से समझौता कर लिया। जहांगीर ने मेवाड़ पर अपनी विजय का बहुत बड़ा उत्सव मनाया था। उसे इस बात की बहुत प्रसन्नता थी कि जिस काम को उसका पिता अकबर नहीं कर पाया उस काम को उसने पूरा कर दिखाया। अपनी प्रसन्नता को अभिव्यक्ति देने के लिए जहांगीर ने कर्ण सिंह और उसके पिता अमर सिंह की मूर्तियां आगरा के महल में स्थापित करवाई थीं। जब महाराणा अमर सिंह ने अपने बेटे कर्ण सिंह को जहांगीर के दरबार में भेज दिया तो वहां पर जहांगीर ने कर्ण सिंह का भव्य स्वागत करवाया था। ऐसा स्वागत जहांगीर ने राणा कर्णसिंह को स्थायी रूप से अपना गुलाम बनाए रखने के लिए करवाया था।

जहांगीर की कूटनीति

अपने दरबार में पहुंचे कर्ण सिंह का जहांगीर ने अपने सिंहासन से उठकर स्वागत किया था और उसे अपनी बांहों में भर लिया था। इसके अतिरिक्त कर्ण सिंह को अनेक प्रकार के उपहार आदि देकर भी संतुष्ट करने का प्रयास किया गया था। जहांगीर ने उस समय महाराणा अमर सिंह को हर प्रकार से यह दिखाने का प्रयास किया था कि वह उनका सम्मान करता है और बराबरी के आधार पर ही उन्हें सम्मान देता रहेगा। यही कारण था कि जहांगीर ने उस समय महाराणा अमर सिंह को व्यक्तिगत रूप से अपने दरबार में उपस्थित होने के लिए आदेशित नहीं किया। वह जानता था कि महाराणा अमर सिंह जिस वंश परंपरा से है उसे अपने अधीन करना और अधिक बनाए रखना दोनों में बड़ा अंतर है।
वास्तव में उस समय जहांगीर दूर की कौड़ी चल रहा था। उस समय जहांगीर ने महाराणा अमर सिंह को शाही सेवा में आने के लिए भी नहीं कहा। महाराणा के प्रति अपने आप को और भी अधिक विनम्र दिखाने के लिए जहांगीर ने युवराज कर्ण सिंह को पांच हजारी का मनसबदार भी बनाया था । युवराज कर्ण सिंह से पूर्व यह पद जोधपुर, बीकानेर और आमेर के राजाओं को दिया गया था। इस प्रकार कूटनीतिक दृष्टिकोण से मेवाड़ के महाराणा अमर सिंह को प्रसन्न करने का हर उपाय जहांगीर ने अपनाया।
कर्ण सिंह को 1500 सवारों की टुकड़ी के साथ मुग़ल सम्राट की सेवा में रहने को कहा गया। महाराणा अमर सिंह की मृत्यु हुई तो उसके पश्चात कर्ण सिंह ने मुगलों के अधीनस्थ राजा के रूप में ही मेवाड़ पर शासन करना उचित समझा।
महाराणा कर्ण सिंह ने मेवाड़ के शासक के रूप में कोई विशेष और उल्लेखनीय कार्य नहीं किया। अपने आलस्य और प्रमाद के कारण वह मुगलों की सेवा में लगा रहा। कुछ प्रशासनिक सुधारों के साथ-साथ राज भवनों का विस्तार करने और रक्षा व्यवस्था को पुनरीक्षित करने के अतिरिक्त महाराणा कर्ण सिंह के शासन की कोई विशेष घटना नहीं है। वास्तव में उनका शासन शांतिपूर्ण अवधि का शासन था। उन्होंने 1621 ई0 में रणकपुर जैन मंदिर का जीर्णोद्धार अवश्य कराया था।
  महाराणा कर्ण सिंह ने पिछोला झील की दीवारों के साथ-साथ चलने वाली पानी की खाई का निर्माण करवाया था। इन गड्ढों में पिछोला झील से झंझावात और अतिप्रवाह होता था और इसे उदय सागर झील तक पहुँचाया जाता था, जहाँ से पानी का उपयोग सिंचाई के लिए किया जाता था। उदयपुर शहर में निर्माण के बीच उन्होंने जगमंदिर द्वीप पैलेस में गोल महल और गुंबद, कृष्णा निवास में एक टैंक के साथ बनाया। 
इस सबके उपरांत भी राणा कर्ण सिंह ने मुगल शासकों से संबंध बनाए रखे और उनकी अधीनता को छोड़कर एक स्वतंत्र शासक के रूप में शासन करने के लिए किसी प्रकार का भी कोई प्रयास नहीं किया। कुल मिलाकर ऐसी स्थिति से चित्तौड़ की गरिमा को ठेस लगी। यही कारण है कि चित्तौड़ के गौरवशाली इतिहास में महाराणा कर्ण सिंह का कोई विशेष स्थान नहीं है। महत्वपूर्ण यह नहीं है कि उन्होंने 8 वर्ष तक चित्तौड़ पर शासन किया। महत्वपूर्ण यह है कि इतने समय में भी उन्होंने ऐसा कोई प्रयास नहीं किया जिससे मेवाड़ के सम्मान को पुनः स्थापित करने में सफलता मिलती।
44 वर्ष की अवस्था में मार्च 1628 में महाराणा कर्ण सिंह द्वितीय की मृत्यु हो गई। लगभग इसी समय जहांगीर की भी मृत्यु हो गई थी।

महाराणा जगतसिंह प्रथम

महाराणा कर्ण सिंह के पश्चात उसका पुत्र जगत सिंह प्रथम मेवाड़ के राजसिंहासन पर बैठा। उसके राज्याभिषेक की तिथि 28 अप्रैल 1628 बताई जाती है। इस महाराणा के शासनकाल में भी कोई विशेष कार्य नहीं हुआ। अपने शासनकाल में इसने भी लगभग अकर्मण्य , आलसी और प्रमादी बने रहकर ही शासन किया। बताया जाता है कि इसके शासनकाल में देवलिया प्रतापगढ़ के शासक जसवंत सिंह ने मेवाड़ के प्रभाव को अपने राज्य से हटाने का एक बार प्रयास किया था। तब इस महाराणा ने क्षत्रिय परंपरा के विरुद्ध कार्य करते हुए प्रतापगढ़ के शासक जसवंत सिंह और उसके पुत्र मानसिंह को उदयपुर बुलवाकर गुप्त रीति से पिता पुत्र दोनों को ही मरवा दिया था।
वास्तव में, महाराणा का यह कार्य महाराणा परिवार की वंश परंपरा के भी प्रतिकूल था। यह कोई वीरता का कार्य नहीं था। ऐसे कार्य को कायरतापूर्ण ही माना जाना चाहिए। इस राजवंश के महाराणा अबसे पूर्व अपने शत्रु को खुले मैदान में चुनौती देना अच्छा मानते थे, यही भारत की आर्य परंपरा रही है। इस परंपरा से अलग हटकर मुसलमानी परंपरा को अपनाकर अपने शत्रु की गुप्त रीति से हत्या करवाना पूर्णतया अमान्य है। इस दृष्टिकोण से महाराणा का यह कार्य निंदनीय ही माना जाएगा।
उस समय दिल्ली पर मुगल शासक शाहजहां का शासन था। शाहजहां ने प्रतापगढ़ को मेवाड़ से अलग कर दिया था। महाराणा जगत सिंह के शासनकाल में डूंगरपुर , सिरोही और बांसवाड़ा पर भी हमला किया गया था। इस हमला का भी महाराणा जगत सिंह की ओर से कोई उचित प्रतिकार नहीं किया गया था।
महाराणा जगत सिंह का स्वर्गवास 10 अप्रैल 1652 को हो गया था। महाराणा ने अपने समय में चित्तौड़ की मरम्मत करवाने का कार्य भी किया था। उसके द्वारा दिए गए बड़े दानों में कल्पवृक्ष, सप्तसागर , रत्न धेनु और विश्व चक्र बड़े प्रसिद्ध हैं। उसने काशी के ब्राह्मणों के लिए सोना भेजकर और कृष्ण भट्ट को भैंसड़ा गांव देकर अपनी उदार दानशीलता का प्रमाण दिया था। महाराणा जगत सिंह के द्वारा जगन्नाथ राय का उदयपुर में मंदिर निर्माण करवाने का कार्य भी उल्लेखनीय है।
उसने उदय सागर के भवनों को बनवाकर भी विशेष सम्मान प्राप्त किया। कुल मिलाकर उसके द्वारा जो भी कार्य किए गए वह कुछ इस प्रकार के थे जैसे कोई सेठ अपने यश के लिए या आत्मिक प्रसन्नता के लिए दान आदि देकर भवन आदि का निर्माण करवाता है। एक राजा की भांति अपने गौरव और वंश परंपरा के निर्वाह की दिशा में महाराणा जगतसिंह की ओर से कोई महत्वपूर्ण कार्य नहीं किया गया।
महाराणा जगत सिंह के कई पुत्र थे। उसकी मृत्यु के उपरांत राज सिंह नाम का उसका पुत्र उसका उत्तराधिकारी बना।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

(हमारी यह लेख माला आप आर्य संदेश यूट्यूब चैनल और “जियो” पर शाम 8:00 बजे और सुबह 9:00 बजे प्रति दिन रविवार को छोड़कर सुन सकते हैं।
अब तक रूप में मेवाड़ के महाराणा और उनकी गौरव गाथा नामक हमारी है पुस्तक अभी हाल ही में डायमंड पॉकेट बुक्स से प्रकाशित हो चुकी है । जिसका मूल्य ₹350 है। खरीदने के इच्छुक सज्जन 8920613273 पर संपर्क कर सकते हैं।)

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