महानगरों को ट्रैफिक जाम से कब मिलेगी मुक्ति ?

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डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा ।

चौराहों पर जाम की समस्या कोई हमारे यहां की ही समस्या नहीं हैं अपितु दुनिया के अधिकांश देश इस तरह के हालातों से दो चार हो रहे हैं। अमेरिका और यूरोपीय देश भी इस गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं और अपने तरीके से इसका हल निकालने की कोशिश में लगे हुए हैं।

अमेरिकी प्रबंधन कंपनी बॉस्टन कंसलटिंग ग्रुप की मानें तो 2030 तक हमारे देश में चौराहों पर जाम की भेंट यही कोई 3700 करोड़ अमेरिकी डॉलर चढ़ने लगेंगे यानी कि 3 लाख करोड़ रुपए से अधिक का नुकसान केवल जाम और जाम के कारण ही होने लगेगा। 2019 के प्राप्त आंकड़ों के अनुसार देश में जाम के कारण 2200 करोड़ अमेरिकी डॉलर का नुकसान हो रहा था। यदि विकास के आइने में देखें तो यह बहुत बड़ी रकम होती है। यह तो केवल धनराशि के रूप में होने वाला नुकसान है जबकि समय, पर्यावरण, रोड़रेज और अन्य कारणों से होने वाला नुकसान तो इसके अलावा है। ऐसे में देखा जाए तो यातायात जाम की समस्या अपने आप में गंभीर हो जाती है।

दरअसल शहरीकरण के चलते देश के किसी भी कोने में किसी भी शहर में निकल जाओ, चौराहों पर जाम आम होता जा रहा है। फिर राजधानी दिल्ली सहित देश के बड़े शहरों में तो हालात और भी गंभीर हो जाते हैं। देश के अनेक शहरों में अच्छी खासी संख्या में ऐसे सिग्नल रोड़ आसानी से मिल जाएंगे जिनमें यातायात के पीक समय में तीन से चार बार सिग्नल बदलने के बाद जाकर कहीं आपको निकलने का मौका मिल पाता है। यातायात को लेकर यह अपने आप में विकट और गंभीर समस्या है। चौराहों पर जाम के चलते जहां लाखों करोड़ रुपए की ईंधन बरबाद होता है वहीं प्रदूषण का स्तर भी बढ़ता है। इसके अलावा गलती से किसी के वाहन से टच हो जाएं तो मारपीट या गाली-गलौच भी सुनने को मिलता है। लगातार जाम में फंसने के कारण मानसिक तनाव के हालातों से भी गुजरना पड़ता है।

चौराहों पर जाम की समस्या कोई हमारे यहां की ही समस्या नहीं है अपितु दुनिया के अधिकांश देश इस तरह के हालातों से दो चार हो रहे हैं। अमेरिका और यूरोपीय देश भी इस गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं और अपने तरीके से इसका हल निकालने की कोशिश में लगे हुए हैं। अमेरिका व यूरोप के कई देशों में रोड कंजेशन चार्ज वसूलते हुए भीड-भाड़ वाले या यों कहें कि जाम से अत्यधिक प्रभावित रास्तों पर वाहनों की आवाजाही को निरुत्साहित किए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं। इसके साथ ही वाहनों की रेलमपेल को भी कम करने की दिशा में मंथन हो रहा है तो सार्वजनिक परिवहन सेवाओं को सुदृढ़ करने की दिशा में सार्थक कदम उठाये जा रहे हैं। यह एक तरह से लोगों को निरुत्साहित करने का प्रयास ही है।

हमारे यहां तो जाम की समस्या और भी अधिक गंभीर है। इसमें भी पुराने शहरों और नई विकसित कालोनियों के बीच आवागमन के लिए मजबूत सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था नहीं होने से हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। शहरी नियोजकों द्वारा समय-समय पर चौराहों विशेष को सिग्नल फ्री करने की बात तो की जाती रही है पर ढाक के वही तीन पात देखने को मिल रहे हैं। दरअसल गगनचुंबी इमारतों के साथ ही तेजी से बढ़ते शहरीकरण के बीच आने वाले समय में यातायात की होने वाली समस्याओं को लेकर कोई ठोस नीति देखने को नहीं मिल रही है। एक ओर लोगों का छोटे चौपहिया वाहनों से मोह भंग होता जा रहा है वहीं घरों में एक से अधिक चौपहिया वाहन होना भी आम होता जा रहा है। हालात यहां तक हैं कि वाहनों को घर में पार्क करने के लिए जगह नहीं है और ढंग की कॉलोनियों में निकल जाओगे तो घरों के बाहर वाहन पार्क किए हुए देखे जा सकते हैं।

कुछ इसी तरह से घनी आबादी के बीच बहुमंजिला इमारतें खड़ी करने से भी जनसंख्या का दबाव बढ़ता जा रहा है। लोग पानी, बिजली, स्वास्थ्य सेवाओं की बात करते हैं वहीं मेरा मानना है कि इनके साथ ही ट्रैफिक की समस्या विकराल रूप लेती जा रही है। रहवास में बनी हुई सड़कों को तो आप एक सीमा तक ही चौड़ी कर सकते हैं। ऐसे में ठोस नीति बनाना जरूरी हो जाता है। देखा जाए तो शहरों पर यातायात के दबाव को देखते हुए उपनगर विकसित किया जाना आज की आवश्यकता बनते जा रहे हैं। फिर उपनगरीय व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए एक प्रभावी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था का होना भी आवश्यक हो जाता है। यदि हम हमारी पुरानी व्यवस्था पर गौर करें तो उस जमाने में बीस-तीस गांवों के पास कोई बड़ा बिजनस सेंटर विकसित किया जाता रहा है जिससे आवश्यक जरूरतों को वहां आसानी से पूरा किया जाता रहा है। इन छोटे-छोटे बिजनस सेंटरों की अपनी पहचान होती थी और दैनिक जरूरतों के साथ ही शादी-विवाह या अन्य बड़े आयोजनों के लिए जरूरी सभी वस्तुएं यहां आसानी से उपलब्ध हो जाती थीं। कालांतर में इसे निरुत्साहित किया गया और कस्बों का स्थान शहरों द्वारा लिए जाने से सीधे बड़े शहरों की ओर पलायन होने लगा और इसका सीधा असर शहरी यातायात व्यवस्था पर पड़ा है। ऐसे में टाउन प्लानर्स को भविष्य की सोच के साथ नए इलाकें या उपनगर विकसित करने होंगे ताकि बढ़ते यातायात को संतुलित किया जा सके। नियोजित विकास और आए दिन की परेशानी से मुक्ति के लिए ठोस व्यावहारिक कार्ययोजना बनानी होगी।

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