स्वामी नारायण संप्रदाय का सच* भाग 1

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डॉ डी के गर्ग
भाग -१

खूबसूरत और विशाल मंदिर इस बात का प्रमाण नहीं हो सकते है की ये वास्तविक धर्म स्थल है । धन के बल पर अनेको पंथ /गुरु सम्प्रदाय पैदा हो रहे है और ये सभी संप्रदाय हिन्दू धर्म की पूछ पकड़कर पोषित हुए है और हिन्दू धर्म से बिलकुल अलग इसकी दुनिआ है ,मान्यताये है। कृष्ण ,राधा ,शिव ,ब्रह्मा आदि कुछ नाम ऐसे है जिनका कोई भी अवतार पैदा हो जाता है और अपनी नयी दुनिया सुरु कर देता ह। इनके कार्यकलाप इतनी चालाकी से तैयार किये जाते है की भोले भाले सज्जन पुरुष इस मकड़ जाल में उलझ जाते है और बहार नहीं निकल पाते। इनकी आँखों पर अंधविस्वास का चश्मा लग जाता है। ये दुःख का विषय है। इसलिए पहले ईसाई ,मुस्लिम आदि संप्रदाय बने और पिछले ७ दशक में इनकी बढ़ से आ गयी है।
बिना कर्म के मुक्ति और कष्ट निवारण के लालच देने वाले नए नए गुरु और पंथ हिन्दू समाज को छिन्न भिन्न करने में लगे हुए है। जिसका मुख्य कारण अवतारवाद , मूर्ति पूजा और यज्ञ कर्म , स्वाध्याय से दूरी है। यही कारण है की पहले सिख पंथ, जैन , बौद्ध आदि हिन्दू धर्म से अलग हुए है और जल्दी ही इस्कॉन ,डेरा सच्चा सौदा, आशुतोष महाराज, साई बाबा ,सत्य साई , निरंकारी , जय गुरु जी ,राम कृष्ण मिशन ,स्वामी नारायण संप्रदाय ,गायत्री परिवार आदि अपनी अपनी ढपली अपना अपना राग गए रहे है और अपने गुरु को ईश्वर का स्वरूप बताकर उसको स्थापित कर रहे है। ये सब पंथ अलग कॉर्पोरेट कम्पनीज के हिस्सा है , जिसकी कमाई पर गुरु के बाद उसके दामाद, बच्चो , बेटी का एकाधिकार होता है। ध्यान से देखा जाये तो हिन्दू असली हिन्दू धर्म जिसकी कल्पना शंकराचार्य ने की थी ,वैष्णव् संप्रदाय सुरु किया लेकिन ये भक्ति काल गुरुघंटालों के कारण विलुप्त सा हो गया।
स्वामीनारायण संप्रदाय के प्रवर्तक नीलकंठ वर्णी या सहजानंद : इस सम्प्रदाय को पहले उद्धव संप्रदाय के नाम से जाना जाता था। स्वामीनारायण संप्रदाय के प्रवर्तक नीलकंठ वर्णी या सहजानंद जी का जन्म उत्तरप्रदेश के गोंडा जिले के छपिया नामक गाँव में हुआ था।कहते हैं कि भाई से किसी बात को लेकर झगड़ा हो गया और भाई से प्रेम भाव नहीं हो पाया तो घर छोड़कर चले गए और घनश्याम पांडे से सहजानंद स्वामी बन गए.
स्वामीनारायण अर्थात् घनश्याम पांडे ने स्वामीनारायण संप्रदाय की स्थापना की थी। इनका जन्म १७८१ अयोध्या के पास गोंडा जिले के छपिया ग्राम में, उत्तरप्रदेश में हुआ और मृत्यु जून १८३० को लम्बी बीमारी के कारण लगभग ४९ वर्ष की आयु में हुई।
स्वामीनारायण ने छः मन्दिर बनाए थे। अक्षरधाम मंदिर अपनी आश्चर्यजनक वास्तुकला के लिए जाना जाता है। इसमें आठ अस्थिर नक्काशीदार मंडपम हैं जबकि कालातीत हिंदू शिक्षाएं और प्रफुल्लित भक्ति परंपराएं मंदिर की दीवारों पर अपना स्थान पाती हैं।
शिक्षापतरी और वचनमृत स्वामीनारायण सम्प्रदाय की मूल सीखें हैं। इन दोनो विभाग के मुख्या, स्वामीनारायण ने आपने दो भांजो को एक पत्र, देश विभाग लेख के शक्ति से बनाया, जिसे बम्बई उच्च न्यायालय ने स्वामीनारायण की वसीयत माना हैं। इन दोनो की पीढ़ी इन दोनो विभागों के आचार्या के रूप में चलते हैं .
स्वामीनारायण अपनी यात्रा खत्म करके फनेनी नामक गांव में आए और स्वयं को एक असाध्य रोग से ग्रसित कर लिया जो उनकी का कारण बन सके। और अपने अनुयायियों को उन्होंने आश्वासन दिया और साथ ही विश्वास बंधाया कि दिव्य पुरुष कभी धरती छोड़कर नहीं जाते है।
स्वामीनारायण संप्रदाय ब्राह्मणों और जैनों के प्रभुत्व को चुनौती देता रहा है और इन्होने वल्लभाचार्य परंपरा को भी कटघरे में खड़ा किया।
मान्यताये:
• स्वामीनारायण भगवान विष्णु के अवतार हैं।
• ब्रह्मा के, हजारों शिव, हजारों ब्रह्मांडों में, वे सभी केवल एक और एक श्रीजी महाराज (भगवान स्वामीनारायण) के नियंत्रण में हैं।
• भवन स्वामीनारायण की मूर्ति में कृष्ण, राम, विष्णु आदि के सभी अवतार विलीन हो जाते हैं..लेकिन भवन स्वामीनारायण किसी भी कृष्ण, राम, विष्णु आदि मूर्ति में विलीन नहीं होते हैं।
• जो स्वामीनारायण (अक्षरधाम) भवन के निवास को प्राप्त करते हैं, वे कभी भी भौतिक दुनिया में नहीं लौटते हैं, लेकिन जो लोग भगवान कृष्ण (गोलोकधाम) और भगवान राम (वैकुठधाम) के निवास को प्राप्त करते हैं, उन्हें पृथ्वी पर आना पड़ता है और वे कभी भी जन्म और मृत्यु से मुक्त नहीं होते हैं।
• जब भगवान स्वामीनारायण का भक्त मृत्यु के निकट हो तब स्वामीनारायण स्वयं अपने प्रिय भक्त को अक्षरधाम (भगवान का निवास) लेने के लिए आते हैं और आज भी भवन स्वामीनारायण अपने भक्तों को लेने आते हैं .जबकि कोई भी कृष्ण, राम अपने भक्तों को अपने निवास पर लेने नहीं आता है।

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