पश्चिमी देशों ने भोग के रोग से मुक्ति पाने हेतु भारत के योग को अपनाना आरंभ कर दिया है-इस संकेत से हमें उत्साहित होना चाहिए। हमें मानना चाहिए कि हमारी ग्राहयता यदि कहीं बढ़ रही है, तो निश्चित रूप से कुछ ऐसा हमारे पास है जो उनकी दृष्टि में अनमोल है।
हमारी दृष्टि में यह अनमोल हमारे पास हमारा अतीत है, हमारी आध्यात्मिक विरासत है और हमारी संस्कृति है। समाज के पांच प्रतिशत सृजनशील लोग जमाने के रंग में रंगकर पिचानवें प्रतिशत लोगों का मार्गदर्शन करें, उन्हें अपने अतीत की महानता, ग्राहयता और गौरव का दिग्दर्शन करायें। आज राष्ट्रसेवा का यही आग्रह है।
संसार में अंग्रेजी दवाइयों अर्थात एलोपैथिक ट्रीटमेंट से लोगों का मन भर चुका है यह चिकित्सा पद्घति इस दृष्टिकोण का समर्थन करती है कि-‘बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है।’ दूसरे ‘सारी सृष्टि मानव के उपभोग के लिए बनी है।’ इससे मछली, सांप जैसे जहरीले जीव जंतुओं तक को मारकर उनसे मानव के लिए दवाई तैयार करना इस चिकित्सा पद्घति की विशेषता है।
जबकि भारतीय आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्घति के अनुसार हर प्राणी की स्वतंत्र सत्ता और अस्तित्व है यदि प्रकृति में कोई प्राणी किसी अन्य प्राणी का भक्षण कर भी रहा है तो इसका कारण उसकी योनि का भोग योनि होना है। जबकि मानव मननशील है, बुद्घि का स्वामी है, इसलिए वह इन सब जीवधारियों का भक्षक न होकर रक्षक है, संरक्षक है। इसलिए सब जीव उसके संरक्षण के लिए हैं, वह सबका संरक्षक है, स्वामी है, पति है और पिता है।
ईश्वर ने जंतु जगत का निर्माण इसी भावना से किया है जबकि वनस्पति जगत की रचना मानव के स्वस्थ, निरोग और चिरायुष्य की प्राप्ति की भावना से की है।
पश्चिम ने इस तथ्य को नकारा। परिणाम स्वरूप उसके दृष्टिकोण को आज भयंकर और असाध्य रोग देकर उसे ही नकार दिया है। सभी वैज्ञानिक और चिकित्सक हताश और निराश हैं। इसलिए वे दु:खी होकर पुन: भारतीय चिकित्सा पद्घति ‘आयुर्वेद’ की ओर लौट रहे हैं।
दूसरे शब्दों में कहें तो वे भारत की ओर नेतृत्व करने की आशा भरी दृष्टि से देख रहे हैं। ये सारे शुभ संकेत हमें प्रेरित कर रहे हैं कि लाख बाधाएं हमारे रास्ते में हों, हमारा राजनीतिक नेतृत्व भले ही इच्छाशक्ति से ही पथभ्रष्ट (धर्मनिरपेक्ष) और निकृष्ट हो-फिर भी हमें रास्ता मिलेगा। यदि यह कहा जाए कि लोग हमें रास्ता दे रहे हैं। परंतु हम स्वयं उठने में और उस रास्ते पर बढऩे में हिचकिचाहट दिखा रहे हैं तो भी कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।
हमारा उज्ज्वल भविष्य हमारे स्वागत के लिए बांहे पसारे हमारी प्रतीक्षा में खड़ा है। देखें हमारी दृष्टि इन परिस्थितियों की अनुकूलता का कितनी देर में आंकलन करती है?
(लेखक की पुस्तक ‘वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?’ से)

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